“कोठली बाहर मोहर” क्यों ?

कोठली बाहर मोहर” क्यों

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गीत डाउनलोड करें ♫ 🎹 गीत ♫ 🎹: कोठली बाहर मोहर मारु मिता यौ, आंदोलन जारी राखु। कृपया इस गीत को हरेक मोबाइल में डाउनलोड करें और हरेक गांव में लाउडस्पीकर पर बजाएँ। गीत सीधे डाउनलोड करने क्लीक करें: 3GP विडियो goo.gl/vdgTTN ; MP3 अडियो goo.gl/9vj3gV

अगर हम ५०% से ज्यादा मत “कोठली के बाहर” पाने में सफल रहे, तो समझो मधेश में नेपाल का संविधान और निर्वाचन खारिज हो गया, और मधेशियों को स्थायी रुप से सारे अधिकार मिलने का द्वार खुल गया ! #NOTA #RightToReject #IndirectReferendum

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  1. यह हमारे लिए अप्रत्यक्ष जनमतसंग्रह है, कि नेपाल के काला संविधान को मधेशियों ने स्वीकारा कर लिया है या मधेशी जनता आजादी चाहती है, वह जनमतसंग्रह अन्तरराष्ट्रिय स्तर पर काफी सशक्त संदेश देगा।
  2. यह मधेशी शहिदों के प्रति सम्मान है, क्योंकि उनकी सपनों को पूरा किए बिना पार्टियों के द्वारा निर्वाचन में भाग लेना और उसको मत देना सर्वथा अनुचित है।
  3. यह मधेश आन्दोलन के प्रति एकबद्धता है, क्योंकि मधेश आंदोलन की ११ बूँदे मांगो में से कोई माँग को पूरा किए बिना पार्टी के रुप में निर्वाचन में भाग लेना अनुचित है, और ऐसे पार्टियों को मत देना सर्वथा अनुचित है।
  4. यह मधेशी एकता का आधार है, क्योंकि टूटेफुटे पार्टियों के बीच में जनमत विभाजन करने के बदले सभी मधेशियों द्वारा “कोठली के बाहर” मोहर मारकर मधेशी एकता का सशक्त संदेश दिया जा सकता है। यह टूटेफूटे पार्टी तथा मधेशी जनमत को तोडने के षडयन्त्र का बहिष्कार है।
  5. यह नेपाल के काला संविधान को अस्वीकृत करने का माध्यम है।
  6. यह मधेश आंदोलन को जारी रखने की प्रक्रिया है। चाहे नेपाली शासक जो भी करे, हम उसे आन्दोलन का स्वरुप देंगे, यह हमारा स्टेटमेन्ट है।
  7. निर्वाचन के क्रम में चूप रहने से जो भ्याकूम (सूनापन) और शिथिलता मधेशी आन्दोलनकारी और जनता में देखी जाी, उसको हटाने का जरिया है।
  8. यह नेपाली सेना पुलिस लगाकर जबरजस्ती मधेशियों पर संविधान लादने और निर्वाचन करानेवाले नेपाली शासकों के मुँह पर जोडदार तमाचा है।
  9. यह मधेशी एकता और स्वतन्त्रता के लिए विजय यात्रा भी है क्योंकि जो चिन्ह सबसे ज्यादा मत लाएगी उससे ज्यादा मोहर अगर “कोठली बाहर” लगती है, तो वह मधेशी एकता और स्वतन्त्रता का विजय है।
  10. यह अन्तरराष्ट्रिय समुदाय को स्वतन्त्र मधेश के पक्ष में संदेश देने का बहुत ही कंक्रिट तरीका है। कोठली के बाहर मत / मतबदर प्रतिशत पूरे अन्तरराष्ट्रिय समुदाय देखेगा, और वह १५% से ऊपर भी हो तो भी बहुत ही कड़ा संदेश देने में हम सफल होंगे।
  11. मधेश के जो नेता, पार्टी, संघ संगठन मधेश आंदोलन, मधेशी जनता और मधेशी शहिद प्रति इमान्दार नहीं होकर फिर वही १-२ सीटें जीतकर सत्ता भत्ता  की राजनीति करना चाहते हैं, उनके लिए मधेशी जनता के पक्ष में खड़ा रखे रहने के लिए यह दबाब देने का बहुत ही प्रभावकारी जरिया है।
  12. यह जारी मधेश आन्दोलन को निष्कर्ष में पहुँचाने का सशक्त माध्यम है।
  13. यह ५-१० वर्ष में एक ही बार आनेवाले अवसर का सदुपयोग है, जो अवसर बार-बार नहीं मिल सकता।
  14. यह नेपाल की ही पुलिस, सेना, उसी की कर्मचारी, उसी का बैलट पेपर, उसी की मतगणना प्रयोग करके अपना “मेसेज” देने का और विरोध प्रदर्शन करने का उच्चतम और प्रभावकारी शांतिपूर्ण आन्दोलन है।
  15. यह मधेशी जनता अभी सोई नहीं है, थकी नहीं है, अभी भी जागी और ऊर्जाशील है, संदेश देने का सशक्त माध्यम है। यह नेपाली शासकों को चेतावनी है।
  16. मधेशियों का अधिकार छीननेवाला और मधेशी पर गुलामी लादने वाला नेपाल के काला संविधान को लागू होने से रोकने या खारिज करने का जो काम  डेढ-दो वर्ष से जारी सडक आन्दोलन नहीं कर सका, घनघोर नाकेबन्दी नहीं कर सकी, ६० शहिदों की बलिदानी नहीं कर सकी, हजारों जुलुस और सभा नहीं कर सकी, वह काम “कोठली के बाहर मोहर” मारकर आसानी से, शांतिपूर्ण तरीका से किया जा सकता है, यह ऐसा मास्टर स्ट्रोक है। इसलिए…

 

मन में हैं, पर मजबूरी है ?

तो यह बहुत अच्छा अवसर है, क्योंकि यह गोप्य मतदान है, कोई देखेगा भी नहीं। कोठली बाहर मोहर मारें, मधेशी एकता को विजय बनाएँ

दूसरे तरीके के बहिष्कार के तुलना में “कोठली बाहर मोहर” के और भी फायदे:

(१) पार्टी ह्वीप वाले: पार्टी ह्वीप के कारण बहुत लोग खुलकर बहिष्कार या मधेश आन्दोलन/स्वराज आन्दोलन का समर्थन नहीं कर पाते, पर उनकी हमदर्दी और समर्थन रहता है। ऐसे लोगों के लिए “कोठली बाहर मोहर” बहुत ही अच्छा अवसर है अपना समर्थन व्यक्त करने के लिए, क्योंकि यह गोप्य मतदान है, कोई लोग देखता नहीं। इस कारण से दूसरे पार्टियों में लगे लोग भी आसानी से “कोठली बाहर मोहर” लगा पाएंगे।

(२) बागी कार्यकर्ता: चुनाव में अपने अनुसार के आदमियों को टिकट नहीं मिलने के कारण बागी कार्यकर्ता बहुत सारे रहेंगे, जो “कोठली बाहर मोहर” लगाकर अपनी पार्टियों का विरोध जता सकेंगे, निर्वाचन को बहिष्कार कर सकेंगे। (उनके लिए पार्टी की निगरानी होने के कारण मतदान करने ही नहीं जाने का विकल्प रहता ही नहीं।

(३) भय-त्रास के कारण दूर रहनेवाला: बहुत सारे लोग मधेश आंदोलन / स्वराज आन्दोलन से भय-त्रास के कारण दूर ही रहते हैं, खुलकर समर्थन जताना नहीं चाहते। ऐसे लोगों के लिए भी यह बहुत अच्छा अवसर होगा, कि वे गोप्य मतदान में “कोठली बाहर मोहर” लगाकर मधेश आन्दोलन और शहीद का सम्मान कर सकें, मधेशी एकता को जीता सके।

(४) हारनेवाले: स्थानीय चुनाव में भी हरेक वार्ड से जितेंगे ~५, पर हारेंगे सैकडौं (अगर २५ पार्टी से ५ सीट पर खडे हो तो ऐसे ही उम्मीदवार हो जाता है १२५, जिसमें से जितेगा वही ५)। और हारनेवालों का अक्सर यही ध्येय रहेगा कि यह चुनाव खारिज हो जाता, अमान्य हो जाता। और इसलिए जिसका हारना लगभग निश्चित है, वे लोग भी “मतबदर” पर ज्यादा जोड देंगें और कोठली बाहर मोहर मार सकते हैं।

 

यह शुद्धिकरण अभियान भी है  !

चुनाव की बेला है,
वारिस का मौसम है,
अभी बहुत सियार का रंग उघरेगा,
बहुत बहुरुपिया का भेष खुलेगा,
जो पद पर ललचाएँगे, पैसों पर बिक जाएंगे, रिश्तो पर खो जाएंगे
जो अनेकों बहाने बनाएंगे, जनता को भरमाएंगे
उसे पहचान करते चलो, अपने पथ पर बढते चलो

क्योंकि बारिस के बाद का जो साफ-सुथरा सबेरा है,
वह सिर्फ आजादी का होगा।
क्या विजय के इतने करीब होकर भी तुम्हे एहसास नहीं कि
भविष्य सिर्फ मधेश स्वराज का है।
सभी नेता, पार्टी को तो देख ही चुके
उसमें जुडना या उससे कोई सम्बन्ध रखना बस एक कलंक है,
जिसपर सदैव तुम पछताओगे।

 

रिश्तेदारों को वोट क्यों ? मतबदर करो।

शहीद पूछे :-
क्या सिर्फ तुम्हारा ही रिश्ता-नाता है कि मेरा भी था ?
तो रिश्तेदारों को वोट क्यों ? मतबदर करो।

तुम्हारे कहने पर
जलती हुई सडक पर उतर कर
हमने अपनी बीबी और छोटेछोटे बच्चों को भूलकर
तुम्हारे लिए अपना जीवन ही बदर कर दिया ।

पर आज तुम कहते हो
कि तुम्हारा चाचा खडा होने वाला है
तुम बूथ तक जाकर
मेरे लिए एक साधारण मत-बदर नहीं कर सकते ?

मैनें तेरे लिए अपना जीवन ही बदर कर दिया
तू मेरे लिए साधारण मतबदर नहीं कर सकते ?

यह मधेश का महाभारत है, इसमें रिश्ता नाता कैसा ?

यह मधेश का महाभारत है, इसमें रिश्ता नाता कैसा ? कौरव पाण्डव क्या रिश्तेदार नहीं थे ? क्या अर्जुन को भीष्म पितामह और आचार्य द्रोण के प्रति प्रेम और आदर नहीं था ? परन्तु सत्य के लिए उन्हीं पर वाण चलाए…इसलिए

वोट सत्य को दो, मधेशी जनता को दो, मधेशी शहीद को दो
कोठली बाहर मोहर मारके मधेशी एकता को भारी बहुतमत से विजय बनाएँ और सत्ता भत्ता के लोभ से मधेशी शहिदों का अपमान करते हुए मधेशी जनमत को छिन्नभिन्न करने चले नेताओं को मुँहतोड जवाब दें.

यह लोगों के लिए एक परीक्षा भी है कि वे किस तरफ खडे होते हैं – सत्ताधारी कौरव के पक्ष या सत्यधारी पाण्डव के पक्ष।

 

क्या शहिदों का सपना पूरा हो गया, जो मुखिया, मेयर, सांसद् और मंत्री बनने चले ?

इसलिए मधेशियों को पूर्ण मुक्ति और अधिकार नहीं मिलने तक, अवसरवादी नेताओं को जिम्मेवार बनाने के लिए और मधेश के मुद्दों पर अडिग रखने के लिए, मतबदर करें।

 

मुँह छुपाकर नहीं, बूथ पर जाकर मतबदर करो

 

सिर्फ घर बैठ बहिष्कार नहीं, सक्रिय मतबदर

मधेशी शहीद बोले :-
मैंने तेरे लिए जलती हुई सडक पर जाकर अपना जीवन ही बदर कर दिया,
और तू घर में बैठकर अपना काम करता है और बहिष्कार का ढोंग रचता है,
बूथ पर जाके मतबदर कर ।

घर में मुँह छुपाकर नहीं,
बूथ पर जाकर मतबदर करके शासकों को मुँहतोड़ जवाब दो


कोठली के बाहर छाप, गुलामी अंत करो आप
मधेश आंदोलन जारी है, मत-बदर की बारी है
अब की बार, मत-बदर करके आरपार
चुनाव में हिस्सा, हैं गुलामी का किस्सा

नेपाली उपनिवेश अंत हो, मधेश देश स्वतंत्र हो
अब की बार एक ही मांग, जनमतसंग्रह का हो ऐलान
जनमत-संग्रह ऐलान हो, मधेश देश आजाद हो

 

आखिर विकल्प क्या है ?

जो चुनाव होने से पूर्णत: रोक नहीं सकते, उसमें “कोठली बाहर मोहर” मारके मुँहतोड जवाब देना ही सबसे बेहतर रणनीति है

क्योंकि विरोधियों द्वारा भ्रम फैलाने के लिए कुछ प्रश्न उठाए गए हैं, इसलिए हम रणनैतिक मार्ग के विषय में थोडा बहस यहाँ पर प्रस्तुत करते हैं। अभी निर्वाचन सम्बन्ध में रणनैतिक रूप में निम्न मार्ग उपलब्ध है।

विकल्प:

(A) निर्वाचन को स्वीकार करना
(B) निर्वाचन को बहिष्कार करना: उसमें भी निर्वाचन को बहिष्कार करने के अनेकों तरीके हैं :-
____(क) हिंसात्मक बहिष्कार (तोडफोड, बमबारी, गोलीगठ्ठा)
____(ख) निष्क्रिय बहिष्कार – निर्वाचन में मतदान करने नहीं जाना
____(ग) सक्रिय बहिष्कार – निर्वाचन में भाग लेकर “मतबदर” करना / “Right to Reject” का प्रयोग करना

अब हम एक-एक चर्चा करें।

रास्ता (A) अर्थात् निर्वाचन को स्वीकार करना अभी की परिस्थिति में मधेश के लिए बिलकुल ठीक नहीं है। क्योंकि यह एक घोर षडयन्त्र है यह दिखाने के लिए कि मधेशी जनता ने नेपाल के काला संविधान को स्वीकार्य कर लिया, वहाँ पर तो उसी संविधान अनुसार, उनके अनुसार दिए गए सीमांकन और स्थानीय संरचना अनुसार मधेशी जनता ने अपना प्रतिनिधि चुनकर उसे पूर्णत: स्वीकार कर लिया है। इसलिए संशोधन या सीमांकन पुनर्वलोक किस लिए ? अर्थात् यह चुनाव को स्वीकारना अधिकारविहिन काला संविधान को स्वीकार करना है, मधेशियों को पहले से ज्यादा अधिकारविहिनता और कठोर गुलामी को स्वीकार करना है। इसलिए किसी भी हालत में निर्वाचन को स्वीकार नहीं किया जा सकता अर्थात् रास्ता A=not acceptable

रास्ता (क) अर्थात् हिंसात्मक बहिष्कार (तोडफोड, बमबारी, गोलीगठ्ठा)। क्या इस रास्ते से पहले कभी निर्वाचन रूका है ? क्या हिंसात्मक रास्ता, किसी के द्वारा ही सही, मधेश के लिए ठीक है? इससे पहले वैद्य माओवादी, विप्लव माओवादी, गोईत समूह आदि द्वारा भी इस तरह से बहिष्कार किया गया था, तो क्या वे निर्वाचन को होने से रोक सके ? उसकी उपलब्धि क्या रही ? उसी तरह, इससे पहले मधेशी पार्टियाँ द्वारा ही संविधान सुझाव संकलन के समय में इसी तरह का वहिष्कार किया गया था, तो सुझाव संकलन नहीं हुआ ? क्या संविधान जारी नहीं हुआ ? तो साफ है, यह रास्ता न तो मधेश के हित में हैं, न तो निर्वाचन को पूर्णत: रोक ही सकता है। दूसरी बात, यह इस बात का संकेत है कि लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर नहीं, हिंसा और बलप्रयोग में ऐसे समूह विश्वास करते हैं, जिसके चलते अन्तर्राष्ट्रिय स्तर पर भी ऐसे प्रतिरोध को कोई समर्थन नहीं मिलेगा। तीसरी बात, ऐसे प्रतिरोध का कोई आँकडा नहीं होता कि कितने प्रतिशत जनता ने विरोध किया। इसलिए रास्ता (क) = not effective, harmful

रास्ता (ख) अर्थात् निष्क्रिय बहिष्कार – निर्वाचन में मतदान करने ही नहीं जाना । इस मार्ग में सबसे बडी बात है प्रभावकारिता। क्या आपके नहीं जाने से निर्वाचन रूक जाएगा ? परिणाम नहीं आएगी ? क्या आपकी मौनता या तटस्थता से “मौन सम्मति लक्षणम्” अर्था्त काला संविधान और निर्वाचन के प्रति आपकी सहमति होना नहीं माना जाएगा ? क्या अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय यह नहीं आरोप लगाएंगे कि अल्पमत में है, ज्यादा समर्थन नहीं है, इसलिए निर्वाचन में भाग नहीं लिया ? क्या अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय यह नहीं आरोप लगाएंगे कि ऐसे समूह लोकतान्त्रिक पद्धति पर विश्वास नहीं रखते ? दुसरी बात, निर्वाचन के समय में ऐसा माहौल बनता है, रिश्तेनाते इस तरह वोट खसाने के लिए पकडकर ले जाते हैं, कि उस समय जो आदमी चल भी नहीं सकते, बिमार रहते हैं, वे भी मतदान करने के लिए जाते ही हैं। अभी जो पार्टियां कह रही हैं, कि हम निर्वाचन बहिष्कार करेंगें, वह भी अन्तत: भाग लेगी ही, देखते रहिए। इसलिए मतदान करने के मनोभाव को रोकना आसान नहीं, इसलिए यह तरीका निष्प्रभावी हो जाता है। इसलिए रास्ता (ख) अर्थात् निर्वाचन में मतदान करने ही नहीं जाना = not effective/ harmful /giving silent consent

रास्ता (ग) अर्थात् सक्रिय बहिष्कार – निर्वाचन में भाग लेकर “मतबदर” करना / “Right to Reject” का प्रयोग करना। यह सबसे बेहतरीन तरीका है, यह अन्तराष्ट्रिय समुदाय को आँकडा सहित ठोस संदेश देना है कि हम लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर भरोसा रखते हैं, पर नेपाल का काला संविधान हमें स्वीकार नहीं, और हम चूप रहके घर में छूपने वाले भी नहीं हैं, यह सब सहकर खामोश रहने वाले भी नहीं है, बल्की हम अभी भी सक्रिय हैं, सजग हैं, ऊर्जाशील है और हमारा आंदोलन जारी है। इसलिए रास्ता (ग) अर्थात् सक्रिय बहिष्कार – निर्वाचन में भाग लेकर “मतबदर” करना/ कोठली बाहर मोहर लगाना / “Right to Reject” = BEST & EFFECTIVE

 

आपके “कोठली बाहर मोहर”/ “मत-बदर” अभियान मधेश केन्द्रित पार्टियों का वोट नहीं काटेगा ?

१. सबसे पहली बात, किस पार्टी को मधेश केन्द्रित या मधेशी पार्टी कहा जा सकता है ? क्योंकि सभी प्रमुख पार्टी अपने नाम से भी “मधेश” शब्द तक को भी मिटाके नेपाली राष्ट्रवादी पार्टी बन गई है, तो इसमें मधेश केन्द्रित पार्टी कौन रह गया है ? जो मधेशी पहचान के लिए लडे, और खुद मधेश और मधेशी नाम तक मिटा दें, ऐसी पार्टी कैसे मधेशी पार्टी हो गई ?

२. चलों मान लेते हैं, अमुक पार्टी है मधेशवादी। तो क्या ? वे पार्टियाँ तो खुद आन्दोलन कर रही है कि “संशोधन से पहले चुनाव हरगिज नहीं”, “संशोधन से पहले का चुनाव पूर्ण रुप में बहिष्कार”। तो ऐसे में उनका वोट किसी के द्वारा काटना कैसा ? उल्टा हम सभी तो सैद्धान्तिक रुप में एक ही बात कर रहे हैं – वे कहते है निर्वाचन बहिष्कार करेंगे उसके लिए मधेश बंद, नाकेबंदी, चक्काजाम, तोडफोड जो करना पडे हम करेंगे। हम भी कहते हैं बहिष्कार करेंगे परन्तु क्योंकि हम नाकेबंदी, तोडफोड और लडाई-झगडा नहीं कर सकते, इसलिए बूथ पर जाकर ही मतबदर करेंगे शांतिपूर्ण रुप में। तो फर्क तो सिर्फ तरीका का है, बात तो वही है। तो इसमें उनका विरोध कहाँ है ? “कोठली बाहर मोहर” के तहत तो हम उन “मधेशवादी पार्टियों” को मद्दत ही कर रहे हैं निर्वाचन असफल कराने में, जो उनकी घोषणा है।

अब भविष्य में कहीं, उनके मुहँ में लार टपक पडे और मधेशी जनता को बीच में ही धोखा देते हुए बिना संशोधन ही निर्वाचन में भाग लेकर १-२ सीट जितने चले गए, तो यह तो उसकी जिम्मेवारी है। वे अपने किए का सजा तो पाएंगे ही !

३. यह भ्रम में न पडें कि स्वराजी सिर्फ “मधेशवादी पार्टी” में लगे लोग ही हैं, बल्कि आजादी आंदोलन में हरेक पार्टी के लोग उतने ही जुडे हैं। कहेंगे तो जो पुर्खौली रुप में कथित “मधेश विरोधी” शक्ति में लगें हैं, वे और उनके बच्चे, आजादी आन्दोलन से ज्यादा जुडे हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि वे सिर्फ अपने बचाऊ और टाइम-पास के लिए ही अपनी पार्टी में हैं, परन्तु उन्हें पूरा यकीन है कि उनकी अपनी पार्टी मधेश की समस्या का हल बिलकुल नहीं करेगी, और आजादी आन्दोलन ही विकल्प है। परन्तु कथित मधेशवादी दल में लगे लोगों को तो इतना कुछ होने के बाद भी उन्हें भरोसा है कि मधेशवादी दल द्वारा ही समाधान मिलेगा। तो ऐसे में हमारे अभियान द्वारा अगर कोई प्रभाव पडता है तो वह मधेशवादी दल को नहीं, बल्कि मधेश विरोधी दल को पडेगा। कोई वोट कटेगा भी तो, वह मधेशवादी दल का नहीं, बल्कि मधेश विरोधी दल का कटेगा।

४. खाली १-२ सीट “मधेशवादियों” को जीताकर भेजने से क्या होगा ? न कोई संशोधन, न तो विधेयक ही रोक पाना, सिर्फ बीबी, समधी, गर्लफ्रेन्ड को सांसद और मंत्री बनाना, निजी फायदे के लिए! मधेशवादियों को १-२ सीट पर जिताने के चक्कर में १० आदमी को मधेश पर शासन और शोषण करने की “वैधता” मिल जाती है! पिछली बार भी ११ सीट पर मधेशवादियों को जिताने के चक्कर में २२९ “मधेश विरोधियों” को हमने मधेश पर शासन करने की “वैधता” दे दी, जिसके कारण से आज यह काला संविधान मधेश पर लादा गया। काश वह ११ सीट भी नहीं होते उसकी जगह जिरो (0) होते, या होने पर भी वे ११ सीट से राजीनामा लेकर आ जाते, तो मधेश की मांगे कब की पूरा हो गई रहती। इसलिए वह १-२ सीट कथित मधेशवादियों को जीताने और नेतामधेशी नेताओं की बीबी, समधी, गर्लफ्रेन्ड को सांसद और मंत्री बनाने के लिए पूरी मधेशी जनता को बलि चढाने का कोई औचित्य नहीं है!

५. मधेश प्रति सहानुभूति रखनेवाले कुछ पार्टी /समूह/परिषद्/अभियान मतदान ही बहिष्कार करने की बात करते हैं, बूथ पर ही नहीं जाने की बात करते हैं, और वे हमें आरोप लगाते हैं कि हमारे मतबदर अभियान से “मधेश विरोधी पार्टी” जीत जाएगी ! आपके द्वारा मधेश प्रति सहानुभूति रखनेवालों से मतदान बहिष्कार करने, बूथ पर ही नहीं जाने का आह्वान से “मधेश विरोधी पार्टी” ही जितेगी न ! हमारे अभियान से तो कम‍‍‌-से-कम सभी मधेशी पहाडी सभी पार्टियों का मतबदर होगा, और प्रभावकारी ढंग से आगे बढा तो निर्वाचन ही असफल हो जाएगा, संविधान ही खारिज हो जाएगा।

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जिसदिन नेपाली संसद् में 0 (जिरो) मधेशी होगा, वहीं से मधेश मुक्त होगा #reverse_logic

नेपाल की संसदीय राजनीति के माध्यम से ही बात करें तो मधेशियों को अधिकार-प्राप्ती या मुक्ति के लिए दो अवस्था हैं :-
(१) मधेशियों का स्थायी रुप में २/३ बहुमत होना (२) मधेशियों की उपस्थिति बिलकुल शून्य (0) होना

नेपाल की राजनीति में पहला शर्त्त पूरा होना असम्भव है, क्योंकि नेपाली साम्राज्य की कुल जनसंख्या का लगभग ३३% ही मधेशी है, इसलिए कितना भी हाइपोथेटिकल अवस्था क्यों न हो अर्थात् चाहे मधेश में सिर्फ १ ही पार्टी को पूरा का पूरा मत मिले, कोई मतबदर न हो, और पूर्ण समानुपातिक चुनाव हो, ऐसी अवस्था में भी मधेशी नेपाल के संसद् में ३३% ही पहुँच पाएँगे कभी भी दो-तिहाई हासिल कर नहीं सकेंगे। वह दो-तिहाई भी स्थायी रुपसे हासिल करना होगा, खाली गठबन्धन करके एक बार नहीं, वरना उपलब्धि तुरन्त ही पलट दी जाएगी। साथ-साथ वहाँ पर जित कर गए हुए सांसद् आदर्शवादी भी होना जरूरी होगा, खरीदविक्री होनेवाला नहीं। तो इस तरह से मधेशियों का दो-तिहाई नेपाल के संसद् में स्थायी रुप से बहुमत रहना असम्भव है, इसलिए मधेशी कभी भी नेपाल में रहकर स्थायी रुपसे अधिकार प्राप्त नहीं कर सकते।

 

कुछ लोग शंका करते हैं कि निर्वाचन में मतदान करने जाना ही बुरा है / ज्यादा लोगों का जाना ही बुरी बात है / नेपाल सरकार दावा करेगी कि ज्यादा प्रतिशत मतदान हुआ !

 

उत्तर:  २०७२ असोज ३ गते के दिन अर्थात् जिस दिन संविधान जारी हुआ, उस दिन भी तो बहुत ज्यादा पहाडी और बहुत ज्यादा मधेशी दोनों सडक पर उतरे थे। तो क्या उस दिन ज्यादा संख्या में मधेशियों का घर बाहर जाना/सडक पर उतरना ही संविधान को स्वागत का अर्थ दे गया ? कि **उतरकर क्या किया** यह मायना रखता है ?! उस दिन पहाडियों ने दिपावली मनाया और मधेशियों ने काला दिवस !

उसी तरह निर्वाचन के दिन भी मधेशियों का जाने का नहीं (वे तो जैसे भी जाएंगे ही), पर वहाँ जाकर क्या करते हैं (मतबदर करते हैं), यह मायना रखता है ! और वह आएगा पूरा सरकारी आँकडा सहित, और पूरा अन्तर्राष्ट्रिय समुदाय देखेगा कि बहुसंख्यक या ५०% से ज्यादा जनता ने **जाकर मतबदर** कर दिया  अर्थात् नेपाल के संविधान और निर्वाचन को बहुमत से अस्वीकार कर दिया।

निर्वाचन को रोकने के लिए हिंसा और बल का प्रयोग, निषेध की राजनीति, या अनुपस्थित रहकर मौन स्वीकृति देके नेपाल के काला संविधान और निर्वाचन को स्वीकार करने से लाखों गुणा बेहतर है बूथ पर जाकर मतबदर करना।   यह शासकों के मुँह पर ऐसा कडा तमाचा है जिसकी गुञ्ज पूरे विश्व में गुँजेगी!

और यह लोकतान्त्रिक पद्धति पर आस्था और उसका सदुपयोग है, यह कोई गैरकानूनी, गैरसंवैधानिक बात नहीं, यह Right to Reject के अधिकार का उपयोग है। ऐसे लोकतान्त्रिक पद्धति द्वारा जवाब देने से मधेशियों की छवि अन्तरराष्ट्रिय स्तर पर और भी बढेगी। वरना, निर्वाचन या उसके सम्बन्धी कार्यक्रमों को जिस तरह अभी भाँडा जाता है, उससे यही संदेश जा रहा है कि “मधेशी पार्टी” के पास कोई समर्थन नहीं, भाडा में कुछ लठैत और लडाकू बुलाके कार्यक्रम को भाँड देता है, खुद हारने की निश्चित होने के कारण दूसरों को निषेध करता है..आदि। कोई कोई तो इतना तक आरोप लगा देते हैं कि सीमा पार से लठैत को बुलवाकर कार्यक्रम भाँड रहा है … इसलिए राइट टू रिजेक्ट का शांतिपूर्ण प्रयोग अन्य विकल्पों से लाखों गुणा बेहतर है।

उसके साथ-साथ इसका अलग पहलू और मनोविज्ञान भी है। निर्वाचन के समय में ऐसा माहौल बनता है कि वृद्ध से वृद्ध, असक्त से भी असक्त, जो चलफिर भी नहीं सकते, वे भी मतदान करने जाते हैं। वे किसको मतदान करेंगे उससे उसको भी उतना कुछ लेना देना नहीं रहता है, वे तो सिर्फ वोट गिराने की खुशी हासिल करना चाहते है, उसमें उसको व्यापक सन्तुष्टि मिलती है। यह मैंने कई निर्वाचनों में देखा है। इसलिए वोट गिराने से रोकना ज्यादा दिक्कत का काम है। दूसरी बात, रिश्तेनाते, गांववाले, कार्यकर्ता, स्वयंसेवक आदि भी उन्हें पकडकर मतदान करने ले जाते ही हैं और रिश्तेदारों/गांववालों के कहने से नहीं गए तो वे बहुत नाराज होना निश्चित रहता है, उनको यकीन हो जाता है कि इसने मुझे मत नहीं दिया, इसलिए भी लोग मतदान करने जाते ही हैं। इसलिए जाने से तो रोक नहीं सकते, परन्तु जाकर मतबदर कर सकते हैं क्योंकि मतदान गोप्य होता है। किसीसे नाराजगी की झंझट नहीं, हर कोई खुश।

 

(वैसे चन्द लोग इसलिए चिन्तित है क्योंकि वे चाहते हैं कि जो रा.ज.पा. निर्णय करे, वही वही हम भी फलो करें। वह कहें “निर्वाचन होने नहीं दें / निर्वाचन करें बहिष्कार” तो हम भी वही कहें; वे कहें सडक आंदोलन, तो हम भी वही कहें; वे कहें प्रधानमंत्री निर्वाचन में भाग लेना उचित, तो हम भी उसे सही ठहरादें। अर्थात् हम उनके लिए माहौल बनाते रहें, उनके फेवर में निर्णय देते रहे, उनको डिफेन्ड करते रहे। और नहीं किए तो….अनेकों आरोप।)

 

ऐसे आजादी कैसे आएगी ?

आजादी के लिए आज तक किए क्या है ? पहले कुछ कर्म करके तो देखिए, फिर न परिणाम की बात आती है ? और वह भी हम बहुत छोटे कार्य करने के लिए बोल रहे हैं, बहुत ही सुरक्षित शांतिपूर्ण छोटा सा कार्य। सडक पर जाकर मरने के लिए, रोडा और पेट्रोल बम फेंकने के लिए नहीं कह रहे हैं; न तो आपसे कोई रुपये पैसे मांग रहे हैं। सिर्फ कह रहें है कि बूथ तक जाकर “कोठली बाहर मोहर” मारिए (वह मत भी कोई अपने लिए हम नहीं मांग रहे हैं, बल्कि मधेशी एकता और शहीद के लिए), और फिर देखिए चमत्कार ! कर्म, तब न फल।

(उन संशयवादियों के लिए जो कुछ अभी किए तो नहीं, मुहँ से भी आजादी मांगी नहीं, और कह देते हैं कि आजादी कैसे आएगी! बुलाओगे तब ना आएगी.)

गीत

“कोठली बाहर मोहर मारू मिता यौ”

यह संवैधानिक लोकतान्त्रिक अधिकार ही है, कोई गैरकानूनी गैरलोकतान्त्रिक बात नहीं

अस्वीकार करने का अधिकार (Right to Reject or None of The Above) / मतबदर करना लोकतान्त्रिक अभ्यास है, यह कोई गैरकानूनी गैरलोकतान्त्रिक बात नहीं है। बहुत सारे देशों में यह अधिकार संवैधानिक रुप में ही सुनिश्चित किया गया रहता है, जैसे कि भारत, बंगलादेश, यूक्रेन, स्पेन आदि देशों में।

नेपाल में भी इस अधिकार को रखने के लिए सर्वोच्च अदालत ने आदेश दिया था और नेपाल में भी यह अधिकार प्राप्त है:

परन्तु इस निर्वाचन के लिए जनता से यह अधिकार कटौती कर दी गई है।

नो भोट प्रस्ताव
आयोगको प्रस्तावअनुसार स्थानीय तह निर्वाचन ऐनबाट सरकारले ‘नो भोट’ (कुनै पनि उम्मेदवारलाई मत दिन्न भन्न
पाउने अधिकार) हटाएको थियो । तर प्रतिनिधिसभा विधेयकमा भने ‘नो भोट’ प्रस्ताव गरिएको छ ।

मतबदर करनेवालों की जीत – निर्वाचन स्वत: खारिज

अस्वीकार करने के अधिकार (Right to Reject/NOTA) में बहुत जगहों पर ऐसा प्रावधान रहता है कि अगर सबसे ज्यादा मत लानेवाले उम्मीदवार से अगर ज्यादा “नो भोट” हो जाय/मतबदर हो जाय, तो जीत “नो भोट” की होती है और ऐसा होने पर वह पद खाली ही रहता है, या पुन: निर्वाचन कराना पड़ता है।

NOTA/Right to Reject सम्बन्धी थप जानकारी

https://en.wikipedia.org/wiki/None_of_the_above :

When “None of the Above” is listed on a ballot, there is the possibility of NOTA receiving a majority or plurality of the vote, and so “winning” the election. In such a case, a variety of formal procedures may be invoked, including having the office remain vacant, having the office filled by appointment, re-opening nominations or holding another election (in a body operating under parliamentary procedure), or it may have no effect whatsoever, as in India and the US state of Nevada, where the next highest total wins regardless.

 

NOTA से सम्बन्धित जनचेतना मूलक विडियो (भारतीय चुनाव से सम्बन्धित):

 

पर्चा

प्रेस-विज्ञप्ति

दूसरे संघ-संगठनों से अपील

रा.ज.पा. नेपाल से “कोठरी बाहर मोहर” लगाके निर्वाचन को सक्रिय बहिष्कार करने हेतु सहकार्य के लिए अपील

२०७४ जेठ २८ गते रविबार

श्री महन्थ ठाकुर
राष्ट्रीय जनता पार्टी, नेपाल

विषय: मतपत्र में “कोठरी बाहर मोहर” लगाके निर्वाचन को सक्रिय बहिष्कार करने हेतु सहकार्य के लिए अपील

आदरणीय ठाकुर जी,

राष्ट्रीय जनता पार्टी, नेपाल द्वारा मधेश आंदोलन को जारी रखते हुए, संयुक्त लोकतान्त्रिक मधेशी मोर्चा द्वारा नेपाल सरकार समक्ष २०७२ साल कार्तिक १५ गते पेश की गई समग्र मधेश–दो-स्वायत्त प्रदेश, सुरक्षा निकाय और अदालत सहित राज्य के सम्पूर्ण अंग में समानुपातिक समावेशी की व्यवस्था, जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्र/प्रतिनिधि निर्धारण, तथा वैवाहिक नागरिकता का प्रावधान अन्तरिम संविधान अनुसार होने लगायत की ११-सूत्रीय माँगें पूरी नहीं होने तक, नेपाल सरकार द्वारा किए जाने वाले कोई भी निर्वाचन को बहिष्कार करने का निर्णय स्वागत-योग्य है और इस दृढ़ निर्णय के लिए राष्ट्रीय जनता पार्टी, नेपाल को हम सभी आभार व्यक्त करते हैं।

जहाँ तक निर्वाचन को बहिष्कार करने का सवाल है, उसके लिए तरीका भिन्न-भिन्न हो सकता हैं और हर एक के अपने फायदे और बेफायदे भी हैं।

(१) निषेधात्मक एवं हिंसात्मक बहिष्कार: बल प्रयोग, हिंसा, तोडफोड़ आदि लगायत के हिंसात्मक एवं निषेधात्मक माध्यम द्वारा निर्वाचन बहिष्कार करना मधेशी जनता और मधेश के हित में नहीं है। इससे पहले भी नेपाल में विभिन्न सशस्त्र एवं संगठित समूह द्वारा निर्वाचन बहिष्कार किया गया था, पर वे निर्वाचन को होने से रोक नहीं सके। ज्यादा से ज्यादा १-२ बूथ पर ही उनका कोई प्रभाव रहा। उनकी कोई ठोस उपलब्धि नहीं रही। उसी तरह, इससे पहले २०७२ साल में संविधान के लिए सुझाव संकलन के समय में भी मधेशी पार्टियाँ द्वारा बहिष्कार किया गया था, तो भी सुझाव संकलन हुआ ही और संविधान भी जारी हुआ। तो पूरी नेपाली सेना और देश भर से सुरक्षाकर्मियों को मधेश में उतार देने के बाद, नेपाल सरकार मधेश में निर्वाचन कराने में सफल होना निश्चित प्राय है। दूसरी बात, ऐसे निषेधात्मक और हिंसात्मक तरीका को अपनाना कहीं न कहीं इस बात का संकेत है कि ऐसे समूह लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर भरोसा नहीं रखते या इनका जनसमर्थन कम होने के कारण इन्हें हिंसा और बल प्रयोग पर उतरना पड़ा। यह अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी मधेशी जनता की तरफ से अच्छा संदेश नहीं होगा और ऐसे प्रतिरोध को कोई अन्तरराष्ट्रीय समर्थन भी नहीं मिलेगा। तीसरी बात, ऐसे प्रतिरोध में कोई ठोस आँकड़े नहीं होते कि कितने प्रतिशत जनता ने निर्वाचन को अस्वीकार किया। तो साफ है, यह रास्ता न तो मधेश के हित में हैं, न तो निर्वाचन को पूर्णत: रोक ही सकता है।

(२) निष्क्रिय बहिष्कार — अर्थात् निर्वाचन में मतदान करने ही नहीं जाना। इस विकल्प में सब से बड़ी बात है प्रभावकारिता की। क्योंकि मतदान करने के मनोभाव, परिस्थिति और बाध्यता को रोकना आसान नहीं होता। इसलिए विगत में भी किए गए ऐसे बहिष्कार प्राय: असफल रहा है। इस तरह से बहिष्कार करने पर भी निर्वाचन हुआ ही है और परिणाम आया ही है। इसके अलावा ऐसी मौनता या तटस्थता से “मौन सम्मति लक्षणम्” अर्था्त नेपाल के काला संविधान और निर्वाचन के प्रति सहमति मानी जाएगी, विरोध नहीं। अन्तरराष्ट्रीय समुदाय यह आरोप लगाएंगे कि ऐसे बहिष्कार करनेवाले समूह अल्पमत में है, उनका ज्यादा समर्थन नहीं है, इसलिए उन्होंने निर्वाचन को चूपचाप बहिष्कार किया। अन्तरराष्ट्रीय समुदाय यह भी आरोप लगाएंगे कि ऐसे समूह लोकतान्त्रिक पद्धति पर विश्वास नहीं रखते। इसके साथ-साथ, निर्वाचन के समय में ऐसा माहौल बनता है, रिश्तेनाते इस तरह वोट खसाने के लिए पकडकर ले जाते हैं, पार्टियाँ इस तरह से ह्वीप जारी करती हैं, कि उस समय जो आदमी चलफिर भी नहीं सकते, बीमार रहते हैं, वे भी मतदान करने के लिए जाते ही हैं। इसलिए मतदान करने के मनोभाव और परिस्थिति को रोकना सहज नहीं होता, और इसलिए यह तरीका निष्प्रभावी हो जाता है।

(३) सक्रिय बहिष्कार — निर्वाचन में भाग लेकर “मतबदर” करना / लोकतान्त्रिक “राइट टू रिजेक्ट” का प्रयोग करना। यह सबसे बेहतरीन तरीका है, क्योंकि यह राष्ट्रीय तथा अन्तरराष्ट्रीय समुदाय को आँकडा सहित ठोस संदेश देगा कि मधेशी जनता लोकतान्त्रिक व्यवस्था पर भरोसा रखती है, परन्तु नेपाल का काला संविधान और उसे संस्थागत करने के लिए किए जा रहे निर्वाचन मधेशियों को स्वीकार नहीं। यह सशक्त संदेश है कि मधेशी जनता चुप रहकर घर में छुपने वाली भी नहीं हैं, सब कुछ सहकर खामोश रहने वाली भी नहीं है, बल्कि मधेशी जनता अभी भी सक्रिय हैं, सजग हैं, ऊर्जाशील है और मधेश आंदोलन जारी है। जो जनता मधेश आंदोलन के प्रति सद्‍भाव रखती है परन्तु अपनी पार्टी की ओर से कार्रवाई के डर से, पार्टी ह्वीप के कारण से, अपने रिश्तेनातों के कारण से खुलकर मधेश आंदोलन में सहभागी नहीं हो पाती, मतदान गोप्य होने के कारण, वे लोग भी इस मुहिम में सहभागी होकर अपना “मतबदर” करके मधेश आंदोलन के प्रति एकबद्धता दिखा सकते हैं। इस मार्ग के जरिए ५०% से ज्यादा मतबदर करके नेपाल के काला संविधान को नहीं स्वीकारने के जनमत-संग्रह के रुपमें सशक्त और ठोस संदेश दे सकते हैं, जिस संविधान को नेपाल सरकार ९५% से ज्यादा जनता का समर्थन प्राप्त होने का दावा करती आई है। यह नेपाली सेना और पुलिस लगाकर जबरदस्ती मधेशियों पर संविधान लादने और निर्वाचन करानेवाले नेपाली शासकों के मुँह पर जोड़दार तमाचा है। यह निर्वाचन के अवसर को आन्दोलन के रुप में ग्रहण करते हुए, लोकतान्त्रिक “राइट टू रिजेक्ट” का अधिकार प्रयोग करते हुए, नेपाली सेना और पुलिस के घेरा में जाकर, उसी का मतपत्र प्रयोग करके, शांतिपूर्ण तरीका द्वारा मतबदर करके ही, नेपाल सरकार को कड़ा, वैधानिक तथा आँकडायुक्त जवाब देना है। मधेशियों का अधिकार छीननेवाले और मधेशी पर गुलामी लादने वाले नेपाल के काला संविधान को लागू होने से रोकने या खारिज करने का जो काम डेढ-दो वर्ष से जारी सड़क आन्दोलन नहीं कर सका, घनघोर नाकेबन्दी नहीं कर सकी, ६० शहिदों की बलिदानी नहीं कर सकी, सैकडों जुलूस और सभाएँ नहीं कर सकीं, वह काम “कोठरी के बाहर मोहर” मारकर मतबदर द्वारा आसानी से, शांतिपूर्ण तरीका से किया जा सकता है, यह तरीका एक ऐसा “मास्टर स्ट्रोक” है। यह समग्र मधेशी जनता और शहीद को विजय दिलाने में सफल होनेवाला ब्रह्मास्त्र है।

इसलिए, ऊपर की बातों को मध्यनजर करते हुए, वीर मधेशी शहीदों को साक्षी मानकर, समग्र मधेशी जनता की भलाई के लिए हम आपसे विनम्र आग्रह करना चाहते हैं कि जो निर्वाचन बहिष्कार करने का लक्ष्य आपकी पार्टी ने लिया है, उसमें सक्रिय बहिष्कार अर्थात् मतपत्र में “कोठरी बाहर मोहर” लगाकर मतबदर करके निर्वाचन को बहिष्कार करने के तरीका को अपनाया जाएँ। आपके सहकार्य से, हमें पूरा विश्वास है कि आनेवाले निर्वाचन में बहुमत मधेशी जनता मतबदर करके नेपाली शासकों के षड्यन्त्र को असफल बनाएगी, और मधेशी जनता का ही विजय होगा।

आपका,

डा. सी. के. राउत
संयोजक, स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन

 

 

 

 

 

 

 

मधेशी एकता का निशान – कोठली बाहर मतदान
शहिदों का हो सम्मान – कोठली बाहर मतदान

मधेश आंदोलन जारी है, मत-बदर की बारी है
अब की बार, मत-बदर करके आरपार

कोठली बाहर मोहर मारें,
काला संविधान खारिज करें
सम्पूर्ण अधिकार स्थायी रुप से पाने का द्वार खोलें

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