Manifesto

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स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन (AIM) का घोषणा-पत्र

एक लक्ष्य: स्वराज
शान्तिपूर्ण मार्ग द्वारा मधेश की आजादी

inspiration-nonviolence
गान्धी ने किया, मण्डेला ने किया और हम भी कर रहे हैं;
आइए, शान्तिपूर्ण मार्ग द्वारा मधेश को आजाद करें,
नेपाली उपनिवेश और रंगभेद का अन्त करें।
— डा. सी. के. राउत

नारा
स्वतन्त्र मधेश, अपना देश !
नेपाली उपनिवेश, अन्त हो ! मधेश देश, स्वतन्त्र हो !
आजादी चाहते हैं हम,  उससे कुछ भी नहीं कम !
रंगभेद और गुलामी, मुर्दावाद !  मधेशी एकता, जिन्दावाद !

कृपया इस पर्चे को कम-से-कम १५ लोगों को पढ़ने दें या पढ़कर सुनाएँ ।

स्वतन्त्र मधेश के प्रस्तावित झंडा और राष्ट्रगान
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कोशी कमला गण्डक काली
जनक सीता बुद्ध धारी
अनन्त उर्वर मधेश जय

सहस्र तलाव सरस मृणाली
सुलभ समृद्ध सतत हरियाली
मनोरम महान मधेश जय

परित्राता परिपालक परम भवशाली
अजित अधिप आभा भारी
मेधावी महारथी मधेश जय

जय जय जय मधेश जय
जय जय जय मधेश जय

स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन क्या है?

‘स्वतन्त्र मधेश गठ़बन्धन’ शान्तिपूर्ण मार्ग द्वारा मधेश की आजादी और मधेशियों का अधिकार पाने के लिए कार्यरत सम्पूर्ण मधेशी जनता, कार्यकर्ता, पार्टी और विभिन्न संघ-संगठन का एक गठबन्धन है। यह कोई पार्टी नहीं, बल्कि एक संरचना है, जिस तरह से नेपाल सरकार की अपनी शासन संरचना है। किसी राजनैतिक पार्टी में रहते हुए भी मधेशी लोग गठबन्धन का हिस्सा बन सकते हैं और आजादी आन्दोलन में भाग ले सकते हैं।

मधेश राष्ट्र

मानव सभ्यता के प्रारम्भ से ही मधेश (मध्यदेश या मज्झिमदेश) राष्ट्र का अस्तित्व रहा है। मनुस्मृति, विभिन्न पुराण और विनय-पिटक सहित के प्राचीन धार्मिक ग्रन्थों में मध्यदेश की चर्चा बराबर मिलती है। वैवस्वत् मनु को मध्यदेश का प्रथम राजा माना जाता है। उसके कई पीढ़ी के बाद राम और सीता ने मध्यदेश को धन्य किया। भगवान बुद्ध भी ई. पू. ५६३ में मधेश में ही जन्म लिया। सम्राट अशोक से लेकर राजा सलहेश तक, कर्णाटवंश से लेकर सेन-वंश तक अनेकों गौरवशाली राजा-महाराजाओं और वंशों ने इस भूमि पर राज्य किया। १२वीं सदी के आसपास मुस्लिम शासक यहाँ पर आए, और उसके बाद अंग्रेज। गोरखालियों ने १८वीं सदी के अन्त में मधेश पर हमला किया। उस समय मधेश में सेन राजाओं का राज्य था। गोरखालियों ने अनेक छल-कपट किए, क्रूर-बर्बरता दिखाई, फिर भी वे मधेश पर कब्जा नहीं जमा सके। परन्तु अंग्रेजों ने कोशी से राप्ती बीच की मधेश की भूमि सन् १८१६ में उपभोग करने के लिए नेपाल सरकार को दे दी, और उसी तरह सन् १८६० में राप्ती से महाकाली नदी बीच की मधेश की भूमि अंग्रेजों ने उपहारस्वरूप नेपाल सरकार को दे दी। इस तरह से मधेश नेपाल का उपनिवेश बन गया।

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नेपाली उपनिवेश में मधेशियों का दमन

मधेशियों से प्रतिआक्रमण होने के डर से मधेश पर पैर रखते ही गोरखाली/नेपाली शासकों ने वीर मधेशी सेना का उन्मूलन कर दिया और मधेशियों को नेपाली सेना में अघोषित प्रतिबन्ध ही लगा दिया। मधेश बाहर से नेपाली सेना लाकर पूरे मधेश में सैन्य बैरकें और चेक पोस्ट खड़े कर दिए। अंग्रेजों के उपनिवेश काल में भी भारत में केवल ३% सैनिक अंग्रेज थे, पर मधेश में लगभग पूरे-के-पूरे (~९५%) सैनिक बाहर से आए है, वे मधेशी नहीं हैं। सोचिए, कितना घोर और क्रूर नेपाली उपनिवेश है मधेश में !

शुरू से ही नेपाली शासक मधेशियों के साथ युद्धबन्दी सरह व्यवहार करते हुए गुलाम बनाने में लगे रहे। नेपाल सरकार मधेशियों की जमीन हड़पने और मधेशियों को अपनी ही भूमि से भगाने में लगी रही। लाखों मधेशियों की जमीन हड़पकर उन्हें अपनी ही जमीन पर भूमिहीन बनाकर कमैया, कमलरी और दास बना दिया। मधेशी आदिवासियों की भूमि कब्जा कर उसे नेपाली प्रशासक, सेना और पुलिस में बाँट दिया गया, पहाडी लोगों को मधेश में लाकर व्यापक रूप से बसाया गया। सन् १९५१ से लेकर सन् २००१ के दौरान ही मधेश में नेपालियों/पहाड़ियों की जनसंख्या ६% से बढ़कर ३३% हो गई। उस कारण से भारी संख्या में मधेशी आदिवासी लोग विस्थापित हुए।

मधेश के जल, जमीन और जंगल पर नेपालियों ने पूरा कब्जा कर लिया। नेपाल के शासकवर्ग मधेश के जंगल को कटवाकर बेच डाले, पर अपना ही एक भार जलावन एक जगह से दूसरी जगह ले जाने पर नेपाली पुलिस मधेशियों को पकड़ती है। अपने ही खेत से उपजे चार-पाँच किलो दाल या सुपारी एक जगह से दूसरी जगह लाते वक्त नेपाली पुलिस मधेशियों को पकड़कर यातना देती है।

नेपाली राज में मधेशियों के लिए अलग नियम-कानून, भूमि हदबन्दी और दण्ड-सजाय की व्यवस्था की गई। लाखों मधेशी नागरिकता-विहीन रहे, जिसके कारण वे भूमि स्वामित्व से लेकर सरकारी नौकरियों और सेवाओं से भी वंचित रहे। नेपाली शासक मधेशियों को ‘काले’, ‘मर्सिया’, ‘धोती’, ‘भेले’ आदि कहके रंगभेद और दुर्व्यवहार करते रहे। पुलिस और प्रशासन के समर्थन में नेपालियों ने ऋतिक रोशन कांड और नेपालगंज घटना जैसे दंगे कराके मधेशियों का नश्ल-संहार कर उन्हें भगाने में लगे रहे।

मधेशी जनता से भारी और अनुचित कर, भन्सार और राजस्व वसूली की गई, पर कभी भी मधेश में उचित लगानी और विकास नहीं किया गया। ऊर्बर भूमि और अन्न के भंडार के लिए जाने गए मधेश, नेपाली शासक की नीति के कारण, आज विकास के अभाव और गरीबी से उत्पीड़ित है। सिंचाई, सड़क, अस्पताल और कॉलेज जैसे मधेश के भौतिक पूर्वाधार उपेक्षित होने के साथ-साथ मधेशियों की बहुत बड़ी संख्या गरीबी और कुपोषण का शिकार हो गई है। नेपाल को इतना पैसा मिलता है अनुदान में, इतने प्रोजेक्ट आते हैं, इतने का बज़ट बनता है, लेकिन सब पहाड चला जाता है। मधेशियों को क्या मिलता है? पहाड में एक पर एक स्वर्ण-नगर स्थापित किया जाता है, एक पर एक रोड, एयरपोर्ट, कारखाने, सरकारी कार्यालय, अस्पताल और स्कूल-कलेज बनाए जाते हैं, मधेश में क्या होता है? मधेश में नए ऑफिस या कारखाने खोलने की बात तो दूर, जो भी कारखाने, सरकारी ऑफिस, कलेज या अस्पताल थे, जो भी प्रोजेक्ट चल रहे थे, उसे भी बन्द करा दिया गया; उसे भी नेपाली शासक पहाड की ओर लेकर चले गए।

मधेश में किसानों को खाद और बीज तक नहीं मिलता, सरकार सिंचाई की कोई व्यवस्था नहीं करती, किसानों की कोई भी समस्या को नेपाल सरकार नहीं देखती। मधेश में व्यापारियों को अनावश्यक दु:ख दिया जाता है, उन्हें निरूत्साहित किया जाता है। मधेश में आज एक से एक योग्य मधेशी युवा पढ़कर बेरोजगार बैठे हुए हैं, नेपाल सरकार उन्हें काम नहीं देती। उतना ही नहीं, नेपाल सरकार ने तो मधेशियों को काम नहीं दिया लेकिन अपने खून-पसीने से अरब-मलेशिया और दिल्ली-पंजाब से भी वे जो कमाकर लाते हैं, मेहनत-मजदूरी या कुछ व्यवसाय करके यहीं पर भी वे जो कमाते हैं, उसका भी लगभग दो-तिहाई हिस्सा नेपाल सरकार मधेशियों से छीन लेती है। कैसे ?  कर या राजस्व के नाम पर। जिस मोटरसाइकल का दाम पचास हजार है, उसे हमें नेपाल सरकार डेढ़ लाख में खरीदने पर मजबूर करती है, यानि नेपाल सरकार हमसे एक लाख रुपया ऐसे ही छीन लेती है! जिस नैनो गाडी का दाम दो लाख नेपाली रुपया है, उसे हमें नौ लाख में खरीदने पर मजबूर करती है, यानि हमारे मेहनत-मजदूरी का सात लाख रुपया नेपाल सरकार हमसे ऐसे ही छीन लेती है! इस तरह, पैसा तो हम कुछ न कुछ खरीदने में ही खर्च करते हैं, और नेपाल सरकार मेहनत-मजदूरी से कमाए हुए हमारे रुपयों का अधिकांश हिस्सा किसी न किसी रूप में हमसे छीन लेती है। और बदले में हमें क्या मिलता है? गोली और गुलामी। हमारे पैसे से नेपाली शासक बन्दुक खरीदते हैं, गोली खरीदते हैं, और सशस्त्र प्रहरी और सैनिक हमारे ऊपर छोड देते हैं। आज मधेशियों को दबाने के लिए नेपाली शासक हजारों-हजार सशस्त्र प्रहरी और सैनिक जगह-जगह पर तैनाथ कर दिए हैं, वे पग-पग पर हमें सता रहे हैं, नेपाली उपनिवेश लाद रहे हैं, हमारी माँ-बहन की इज्जत लुट रहे हैं, हम पर एक पर एक अत्याचार किए जा रहे हैं। आज मधेश में मानव अधिकार संगठन भी बन्द करा दिए गए हैं, और सैकड़ों निर्दोष मधेशी कार्यकर्ताओं को जेल में बन्द किया जा रहा है, दर्जनों निर्दोष मधेशियों को नेपाली पुलिस और सैनिक गोली ठोककर हत्या कर रहे हैं। उसी तरह सीमा क्षेत्र में सरकारी पुलिस और अधिकारियों के द्वारा मधेशी लोग उत्पीड़ित होते रहे हैं। हजारों वर्ष से चलते आए सीमा आर-पार के हमारे सम्बन्धों को तोडने के लिए नेपाली शासक एक पर एक नियमकानून बनाते रहे हैं, आज तो आप एक नया तौलिया लेकर भी बॉर्डर आर-पार नहीं कर सकते।

उसी तरह, नेपाली राज्य संयन्त्र के हर निकाय में मधेशियों के प्रति विभेद रहा है और हर क्षेत्र में प्राय: मधेशियों की उपस्थिति न्यून है। मधेशियों को सरकारी नौकरी मिलना बहुत ही मुश्किल रहा है।

उसके साथ-साथ, नेपाली राज में मधेशियों पर नेपाली भाषा, वेशभूषा और संस्कृति लाद दी गई। वह गणतन्त्र व्यवस्था आने पर भी कायम ही रहा। इच्छा विपरीत मधेशी उपराष्ट्रपति को नेपाली बोलने और दौरा-सुरुवाल पहनने पर नेपाली शासकों ने मजबूर करके ही छोडा।

उतना ही नहीं, मधेशियों में फूट डालकर शासन करने के लिए नेपाली/पहाडी लोग कभी चुरे-भाँवर तो कभी अखण्ड सुदूरपश्चिम के नाम पर हमारी जमीन पर कब्जा जमाए रखना चाहते हैं, मधेश में अपनी विरासत कायम रखना चाहते हैं। हमारे बीच में, कभी थारू, कभी मुस्लिम, तो कभी जनजाति के नाम पर शासक लोग फूट डालना चाहते हैं। पर हम पूछते हैं, ऋतिक रोशन या नेपालगंज जैसे कांडो में हो या अखंड सुदुरपश्चिम आन्दोलन के दौरान थारू या जनजाति या मुस्लिम कहने पर पहाडियों ने मारना छोड दिया था? नेपाली शासकवर्ग ने थारू संग्रहालय में आग नहीं लगाई थी? थारू नेताओं को अस्पताल में घूसकर नहीं पीटा था? ऋतिक रोशन या नेपालगंज दंगों के दौरान मुस्लिम कहने पर पहाडियों ने आक्रमण नहीं किया था? काठमाण्डू में मस्जिद नहीं जलाई थी?  घर में आग नहीं लगाई थी? माँ-बहन की इज्जत नहीं लुटी थी? सच तो ये हैं कि नेपालियों/पहाडियों के अत्याचार से मेची से महाकाली तक, थारू हो या मुस्लिम या दलित या जनजाति, सभी मधेशी तडप रहे हैं।

नेपाली राज में नाकाम कोशिस

मधेशी जनता ने अपनी मुक्ति के लिए सैकड़ों वर्ष संघर्ष किया है, सैंकडों मधेशी शहीद हुए हैं, लाखों-लाख घायल हुए हैं, लाखों ने अपना योगदान दिया है।यहाँ तक कि ०६३-०६४ साल के महान मधेश आन्दोलन में ५४ से अधिक मधेशियों की कुर्बानी के बाद मधेशियों ने अपना अधिक-से-अधिक मत देकर मधेशी नेताओं को संसद भेजा; जितनी सीटें वे लोग कभी सोच भी नहीं सकते थे, उससे ज्यादा सीटों पर नेताओं को पहुँचाया। लेकिन मधेशी राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, उपप्रधानमन्त्री, रक्षामन्त्री, गृहमन्त्री लगायत मन्त्री परिषद् में मधेशी मन्त्रियों का बहुमत रहते हुए भी वे लोग मधेशी जनता के लिए कुछ भी नहीं कर सके, बल्कि उल्टा मधेशियों का अधिकार खोते रहे। मधेशी अफसर, नेता, मन्त्री, उपप्रधानमन्त्री या राष्ट्रपति को तो एक नेपाली/पहाडी प्यून या ड्राइभर भी नहीं सुनता है, तो वे क्या परिवर्तन लाएँगे? यह प्रमाण है कि नेपाल के अन्दर रहते हुए हम कभी भी कुछ भी हासिल नहीं कर सकते।

नेपाल के अन्दर रहते हुए कोई राजनैतिक परिवर्तन मधेशियों के जीवन में कुछ बदलाव न तो ला सका, और न ही कभी ला सकेगा। पुरानी माँगे वर्षो-वर्ष पचकर-सडकर ‘मल’ बनकर निकल चुकी हैं, और हम देख चुके हैं कि उससे मधेशियों को कभी कुछ मिला नहीं। लेकिन अभी भी कुछ नेता  लोग नेपाल के संसद और सत्ता में जाने के लालच से वही पचकर-सडकर निकले हुए ‘मल’ फिर से मधेशियों को खिलाने की कोशिस कर रहे हैं। लेकिन मधेशी जनता क्या वही ‘मल’, वही गन्दगी खाएगी? हरगिज नहीं। अब मधेशी जनता स्वराज के लिए आगे बढ़ेगी, अपनी आजादी के लिए आगे बढेगी। अब बस वही एक मार्ग शेष है, दूसरा कोई उपाय नहीं।

स्वतन्त्र मधेश ही क्यों?

1. प्राकृतिक समाधान: पहली बात, अगर कोई भूमि उपनिवेश है या कहीं की जनता गुलाम है, तो स्वतन्त्रता उनका प्राकृतिक समाधान और हक है। चाहे लोग कितने सुसम्पन्न ही क्यों न हो, उन्हें सब कुछ मिला ही क्यों न हो, पर अगर कोई गुलाम है, तो आजाद होना हर हाल में उसका अधिकार है। हमारा मधेश आज नेपालियों का उपनिवेश बना हुआ हैं, गुलाम बना हुआ है, इसलिए हर हाल में स्वतन्त्र होना हमारा नैसर्गिक अधिकार है।

2. औपनिवेशिक सेना को मधेश से हटाना: दूसरी बात, कोई दूसरा समाधान मधेश में रहे औपनिवेशिक नेपाली/पहाडी सेना को पूर्ण रूप से हटाकर उसकी जगह मधेशी सेना को नहीं रख सकता, और जब तक मधेश की भूमि पर नेपाली सेना रहेगी, मधेशियों की गुलामी का अन्त कदापि नहीं हो सकता। नियम, कानून, व्यवस्था, संविधान आदि बनते रहेंगे, पर उनकी कोई अहमियत नहीं जब तक मधेश की अपनी सेना न हो। क्योंकि नेपाली साम्राज्य की सेना लगाकर कभी भी नियम, कानून, संविधान और व्यवस्था को निलम्बन किया जा सकता है। इसलिए जब तक मधेश में मधेशी मातहत की मधेशी सेना नहीं, तब तक नियम, कानून, व्यवस्था, संविधान आदि कुछ भी अपना नहीं।

3. स्थायी समाधान: तीसरी बात, कोई दूसरा समाधान मधेशियों को स्थायी रूप से अधिकार नहीं दिला सकता; उन मार्गों द्वारा अधिकार मिल जाने पर भी नेपाली शासक जब चाहे वह अधिकार हमसे छीन लेते हैं। जैसा कि ०६३-०६४ साल के मधेश आन्दोलन की उपलब्धि के रूप में तो स्वायत्त मधेश हासिल हो चुका था, मधेशियों को राज्य के हर अंग और निकाय में समानुपातिक समावेशी करने के लिए समझौता हो चुका था, पर जैसे ही हम शान्त हुए, सारी चीजें नेपाली शासकों ने हमसे छीन ली। समानुपातिक समावेशी के आधार पर कितने मधेशी लोग सेना में भर्ती हुए? ३००० मधेशियों की भी भर्ती नहीं हो सकी। अरे, यहाँ तक हुआ है कि मधेशियों को दे दी गई नागरिकता भी दसों हजारों की संख्या में नेपाली राज द्वारा छीन ली गई है।वोटर लिस्ट में दशकों से मौजूद मधेशियों के नाम को हटा दिया गया है। फिर भी अभी मर-मर के बहुत मधेशी लोग इस तरह से कर रहे हैं कि जैसे संविधान में एक बार लिखा देंगे, तो सारा काम खत्म! संविधान तो नेपाल में हर १०-१५ वर्ष में टूटा हैं, तो मधेशियों के मामले में कितने दिन टिकेगा संविधान? जैसे मधेशी शान्त होंगे, फिर पलट लेगा संविधान। इस लिए नेपाल के संविधान बनते रहेंगे, टूटते रहेंगे, जब तक मधेशियों के पास अपना देश, अपनी सेना और अपना संविधान नहीं होता, यानि कि स्वराज नहीं होता, चाहे जितनी भी उपलब्धियाँ दिखा दें, सब मिथ्या हैं, क्षणिक हैं।

आजादी के सिवा कोई दूसरा मार्ग नहीं है

आप ही बताइए,

  1. क्या कोई और व्यवस्था मधेश से नेपाली सेना पूर्णत: हटाकर पूरे मधेशी सेना बनाने की गारन्टी करती है? मधेश से सम्पूर्ण नेपाली प्रहरी और सशस्त्र प्रहरी वापस कराने की गारन्टी करती है? नहीं तो नेपाली शासक जब चाहे हम पर गोली चलाकर राज करते रहेंगे, जो भी नियम-कानून और संविधान बनाकर हम पर लादते रहेंगे; केन्द्रीय सरकार इमरजेन्सी घोषणा करके मिनट भर में हमारे सारे अधिकार छीन सकती है। और हमें, हमारी माँ-बहन को, इन नेपाली सैनिक और पुलिस के खौफ में सदा की तरह तडपते हुए जीना पडेगा।
  2. क्या कोई और व्यवस्था मधेश की अखण्डता की गारेन्टी करती है? नेपाली शासक तो हमें तोडने में लगे हैं, हमें एक-आपस में लडाने में लगे हैं।
  3. क्या कोई और व्यवस्था मधेश के साधन-स्रोत, जल, जमीन और जंगल पर पूर्णत: मधेशियों का अधिकार होने की गारन्टी करती है?
  4. क्या कोई और व्यवस्था मधेशियों की जमीन नहीं छिने जाने की और पहाडियों को मधेश में बसाने का षड्यन्त्र नहीं होने की गारेन्टी करती है? अगर नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब बाकी जिले भी झापा, चितवन और कंचनपुर जिले की तरह पूरी तरह से पहाडियों से भर जाएँगे, और मधेशी केवल नेपालियों के दास बन कर रह जाएँगे।
  5. क्या कोई और व्यवस्था मधेश की नागरिकता, सुरक्षा और वैदेशिक नीति मधेशियों के हाथों में ही होने की गारन्टी करती है?
  6. क्या कोई और व्यवस्था मधेश में सिडियो, एसपी लगायत के सभी प्रशासक मधेशी होने की गारन्टी करती है? नहीं तो, बाद में भी नेपाली शासक द्वारा कर्फ्यू लगा-लगाकर मधेशियों पर आक्रमण होता ही रहेगा और शोषण जारी ही रहेगा।
  7. क्या कोई और व्यवस्था ऋतिक रोशन कांड, नेपालगंज घटना, अखंड सुदुरपश्चिम जैसे सुनियोजित जातीय सफाया का षड्यन्त्र कराके मधेशियों पर फिर लूटपाट और आक्रमण नहीं होने की गारन्टी करती है? पहाडियों द्वारा मधेशियों के घर और गाँव में आग नहीं लगाने की गारन्टी करती है?
  8. क्या कोई और व्यवस्था मधेश के काम-काज और नौकरियाँ मधेशियों को ही मिलने की गारन्टी करती है? कि बाहर से नेपाली लोगों को बुला-बुलाकर मधेश में नौकरी दी जाएगी?
  9. क्या कोई और व्यवस्था मधेश की सम्पूर्ण आय और दाता राष्ट्रों से प्राप्त अनुदानों का समुचित भाग मधेश में लगानी होने की गारन्टी करती है? कि मधेश को खाली विश्व बैंक और एडीबी का ऋण ढोना पड़ेगा?
  10. क्या कोई और व्यवस्था देश भीतर और बाहर रहे मधेशियों की पहचान की समस्या का समाधान करेगी? क्या तब मधेशियों को धोती, इंडियन और मर्सिया कहके नहीं बुलाया जाएगा? 

यानि कि, नेपाली राज में रहकर मधेशियों को इनमें से कुछ भी नहीं मिल सकता। ये सब मधेश को आजाद करके ही हासिल हो सकता है।

 

स्वतन्त्र मधेश

मधेश स्वतन्त्र होने से हमारा एक देश होगा। हमें हर गुलामी से मुक्ति मिलेगी और अपना ऊँचा आत्मसम्मान होगा। हमारी पहचान होगी जो मधेशी की संस्कृति, भाषा और रहन-सहन को समेटेगी। कोई भी हमारी पहचान के ऊपर सवाल नहीं कर सकेगा। कभी नागरिकता-पासपोर्ट लेने में दिक्कत नहीं होगी, किसी को भी नागरिकता के अधिकार से वंचित नहीं होना पडेगा। स्वतन्त्र मधेश में लाखों मधेशी युवा मधेशी सेना में प्रवेश करेंगे, लाखों-लाख पुलिस में प्रवेश करेंगे, लाखों-लाख प्रशासक बनेंगे। लाखों-लाख मधेशियों को नौकरी मिलेगी और बेरोजगारी हटेगी। बॉर्डर आर-पार के सम्बन्ध को सहज करते हुए किसानों को खाद, बीज, तेल-डिजल, थ्रेसर, पम्पिनसेट आदि सहज रूप से लाने दिया जाएगा, उनके लिए सीमापार बाजार भी खुला रहेगा। मेशिन, मोटरसाइकल, ट्रैक्टर जैसी चीजों पर से कर हटा दिया जाएगा, जिससे वे चीजें बॉर्डर के पार के दामों में ही मिल जाएँगी। हम क्यों नेपाल सरकार को लाखों-लाख राजस्व बेवजह देते रहें? जो मोटरसाइकल आज डेढ लाख में मिलता है, वह चालीस-पचास हजार में मिलने लगेगा। जो नैनो कार आज नेपाल में नौ लाख मे मिलती है, वह डेढ-दो लाख रुपये में मिलने लगेगी। सीमा-क्षेत्र से नेपाली सशस्त्र पुलिस और सैनिक का अत्याचार हट जाएगा। सीमा क्षेत्र में आवत-जावत और व्यापार मधेशी अनुकूल सहज होगा। किसानों के लिए, खेती के लिए सिंचाई, सुलभ ऋण सहयोग, बोरिङ्ग और उन्नत बीज की व्यवस्था की जाएगी। गरीबों को राशन कार्ड मिलेगा; हर किसी के लिए खाना, कपड़ा और वास की उचित व्यवस्था की जाएगी। मधेश में एक पर एक रोजगार और प्रोजेक्ट आएँगे; फैक्टरियाँ खुलेंगी; सड़कें बनेंगी; पुल, एयरपोर्ट, अस्पताल, स्कूल-कलेज और लाइब्रेरी बनेंगे। स्वदेश में ही सभी को रोजगार मिलेगा, फिर भी वैदेशिक रोजगार में जाने चाहने वालों के लिए  सुलभ ऋण की व्यवस्था की जाएगी, जो वापस न कर सकने वालों के लिए मिनाहा कर दिया जाएगा। वैदेशिक रोजगार में जानेवालों के लिए विदेश में सुरक्षा की व्यवस्था की जाएगी। हर प्रकार से मधेश अमन-चैन और समृद्धि की ओर बढ़ेगा।  इसलिए हम स्वतन्त्र मधेश के लिए संघर्ष करें।
अन्तिम निर्णायक आन्दोलन

हमारे बाप-दादा नहीं लडे और हम गुलाम हुए। आज हम नहीं लडेंगे, हमारे बच्चे गुलाम होंगे। क्या हम अपने बच्चों को गुलामी देना चाहेंगे? ऋतिक रोशन कांड और नेपालगंज घटना जैसे दंगों में मरने के लिए छोड़ना चाहेंगे? भेदभाव और रंगभेद का शिकार होने के लिए छोड़ना चाहेंगे? आज हम अगर चुप बैठे रहे, तो शासकवर्ग हमारे अस्तित्व को ही मिटा डालेंगे। वे हमारे अधिकार ही नहीं छिनेंगे, हमारे नामोनिशान को मिटा देंगे।

और ऐसी नेपाल सरकार जो अपने सैनिक और सशस्त्र पुलिस लगाकर हमें कुचल देना चाहती हो, उसके आगे बार-बार भिखारी की तरह हात फैलाने का औचित्य क्या है? मधेश तो केवल डेढ़-दो सौ वर्ष पहले नेपाल में आया था, तो मधेश को सदा के लिए नेपाल में उपनिवेश बनकर रहने की जरूरत क्या है? मधेशियों को तो सन् १९५८ तक भी काठमाण्डू जाने के लिए भी भिसा लेना पडता था। तब तक भी मधेश का नेपाल से पृथक अस्तित्व था। नेपाल सरकार ने तो झूठ बोलकर संयुक्त राष्ट्रसंघ की सदस्यता ले ली, और मधेश को निगल गया। हमें वह स्वतन्त्र मधेश वापस पाना है, न कि छोटी-छोटी चीजें भीख में माँगनी है। आखिर हम कितनी बार एक ही चीज के लिए लडते रहें? कितनी बार हम एक ही चीज के लिए मरते रहें? कितनी बार वही आन्दोलन और समझौते करते रहें जो केवल कागज पर ही सीमित रह जाता है? इस लिए बारबार नेपाली शासकों की गोली खाने के बजाय, अब अन्तिम निर्णायक संघर्ष करना है, जो मधेश को स्वतन्त्र कर दे, हमें गुलामी से आजाद कर दे, और नेपाली शासक के सभी षडयन्त्रों को सदा के लिए खत्म कर दे।

इसलिए, वार्ता और समझौता की परवाह नहीं करते हुए, हमें तब तक संघर्ष करना है जब तक मधेश स्वतन्त्र नहीं हो जाता, हर मधेशी आजाद नहीं हो जाता। उससे पहले रूकने पर फिर हमारे साथ धोखा ही होगा, कुछ नेता या पार्टी वार्ता या समझौते के नाम पर हमारे खून का सौदा ही करेंगे, हमारे साथ गद्दारी ही करेंगे। यह स्वतन्त्रता संग्राम मन्त्री, प्रधानमन्त्री या सांसद् बनने के लिए नहीं है; नेपाल के संसद या सत्ता में जाने के लिए नहीं है; उस तरफ जाने वाला हर कोई गद्दार है, मन्त्री और सांसद् बनने के लालची है। हम आजादी के लिए आन्दोलन करें, जो मधेश आजाद होने पर हम सबको प्राप्त होगी, जिससे किसी के साथ धोखा होने की कोई बात ही नहीं रह जाती। केवल सन् १९९० के बाद भी ३० से ज्यादा नए देश बने हैं; हम भी पीछे नहीं रहेंगे, मधेश को आजाद करके रहेंगे।

हमारी योजना

(१) स्वतन्त्र मधेश के लिए आवश्यक जनशक्ति और पूर्वाधार निर्माण करना; जिले-जिले में, गाम-गाम में, वार्ड-वार्ड में जाकर सुदृढ प्रशासनिक एवम् भौतिक संरचना निर्माण करना; मधेश सरकार के लिए आवश्यक प्रशासक, सेना और पुलिस बनाना; राष्ट्रीय योजना आयोग, थिंक ट्याङ्क, मीडिया हाउस, राष्ट्रीय समाचार पत्र, रेडियो और टेलिविजन जैसे पूर्वाधार निर्माण करना,

(२) भारत, चीन, अमेरिका और विलायत लगायत के देशों के संसद् में मधेश के ककस निर्माण करना, और वहाँ के संसदों में मधेश के लिए समर्थन जुटाना,

(३) मधेश सरकार का गठन और मधेश राष्ट्र को व्यवस्थापन और संस्थागत करना; लोकतान्त्रिक पद्धति और संरचना को स्थापित करना,

(४) मधेश की नागरिकता व पासपोर्ट जारी करना,

(५) संयुक्त राष्ट्रसंघ में मधेश को दर्ता कराना और अन्तरराष्ट्रीय जगत में मधेश को स्थापित करना,

(६) विश्व के अन्य राष्ट्रों से द्विपक्षीय तथा विश्व बैंक और एशियाई विकास बैंक जैसे अन्तरराष्ट्रीय संघ-संस्थाओं से वहुपक्षीय कुटनैतिक सम्बन्ध स्थापित करना, उनके नियोग मधेश में खुलवाना और साथ में उनके देश में मधेश राजदूतावास स्थापित करना,

(७) सन् १९५० की नेपाल-भारत संधि से मिले अधिकारों को पुन:प्राप्त करना और उसके तहत भारत में मधेशियों को विशेषाधिकार दिलवाना,

(८) संयुक्त राष्ट्रसंघ ने जो गलत आधार पर नेपाल को सदस्यता दे दी, और नेपाल ने जो हमारे साथ रंगभेद और जातीय भेदभाव किया, मधेशियों का नरसंहार किया, उसके लिए इन्टरनेशनल कोर्ट अफ जस्टिस में आवाज उठाकर कार्रवाई और क्षतिपूर्ती की माँग करना; शहीद और घायल तथा राज्य द्वारा पीडित पक्षों के परिवारों के लिए आजीवन राहत और सुरक्षा की व्यवस्था करवाना,

(९) अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर मधेशियों का संगठन विस्तार करना; मधेश और मधेशी सम्बन्ध में अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर जन-चेतना फैलाना।

स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन (AIM) की माँगें
स्वराज: शान्तिपूर्ण मार्ग द्वारा मधेश की आजादी

  1. मधेश को सार्वभौम-सम्पन्न स्वतन्त्र देश घोषणा की जाए। नेपाली उपनिवेश का अन्त हो।
  2. मधेशी राजनैतिक पार्टियाँ और नागरिक समाज को मिलाकर अविलम्ब अन्तरिम मधेश संसद और मधेश सरकार का गठन किया जाए, जो मधेश में आगामी निर्वाचन कराने और संविधान बनाने का काम करेगी।
  3. मधेश से नेपाली राज के शासन-संयन्त्र और प्रशासक को वापस लिया जाए। उस जगह पर मधेश सरकार अपना शासन संयन्त्र और प्रशासक रखेगी।
  4. मधेश से नेपाल सरकार सम्पूर्ण कर और राजस्व वसूली अविलम्ब बन्द करे। वह काम मधेश सरकार करेगी।
  5. मधेश के साधन-स्रोत, जल, जमीन और जंगल पर से नेपाल सरकार का आधिपत्य हटाया जाए।
  6. मधेश से नेपाल प्रहरी और सशस्त्र प्रहरी बल हटाकर उनमें से मधेशियों को चुनकर मधेश प्रहरी का अविलम्ब गठन किया जाए।
  7. मधेश से सम्पूर्ण नेपाली सेना हटाकर मधेशी सेना का अविलम्ब गठन किया जाए।
  8. मधेशियों से हरण की गई जमीन को वापस किया जाए, और उसे मधेश सरकार के मातहत में रखा जाए।
  9. मधेश में संयुक्त राष्ट्रसंघ लगायत विश्व के राष्ट्रों के प्रतिनिधि रखने लिए आवश्यक प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाए।

अपना मधेश – आजाद देश !!

नेतृत्व: डॉ. सी. के. राउत

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सप्‍तरी जिले के महदेवा गाँव में जन्मे डॉ. सी. के. राउत, विलायत के कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से पीएच. डी. किए हुए हैं। वे युवा इन्जिनियर पुरस्कार, महेन्द्र विद्याभूषण, कुलरत्‍न गोल्डमेडल और ट्रफिमेन्‍कफ एकाडेमिक एचिभमेन्ट अवार्ड जैसे सम्मानों से विभूषित हैं। डॉ. राउत अमेरिका में वैज्ञानिक के रूप में कार्यरत थे। मधेश की सेवा करने के लिए वे २०६८ साल में अमेरिका से वापस लौट आए। उन्होंने ‘मधेश का इतिहास’, ‘वीर मधेशी’, ‘वैराग से बचाव तक’ और ‘मधेश स्वराज’ किताबें भी लिखी हैं।

समाप्त

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