Madhesh Swaraj

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मधेश स्वराज

(आम पोथी / ब्लू बूक)

डा. सी. के. राउत
पीएच. डी. (कैम्ब्रिज)

इन्टरनेट संस्करण, सन् २०१३

विषय-सूची

लेखक के विषय मेंअमर-वाणी

भाग १: गति

१. जीवन और मकसद

२. जीने के लिए संघर्ष

३. डुबती नाव और अजगर का मुँह

४. मानव-समाज, राष्ट्र और आक्रान्ता

५. शोषण, विलोपन और योग्यतम का बचना

६. छोड़ो राजनीति, चलो अपना काम करें

७. बिल गेट्स बन जाऊँगा

८. विकास चाहिए, बात नहीं

भाग २: दिशा

९. मधेश के मुद्दे

१०. मधेश में नेपाली उपनिवेश

११. मुक्ति कैसे?

१२. स्वतन्त्र मधेश क्यों?

१३. स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन

१४. बृहत योजना

भाग ३: मार्ग

१५. शान्तिपूर्ण मार्ग क्यों?

१६. असहयोग आन्दोलन

१७. अहिंसात्मक आन्दोलन

१८. सामाजिक आन्दोलन

१९. कार्यकर्ताओं की तैयारी

भाग ४: बाधा

२०. गैर-कानूनी!

२१. खतरा!

२२. लोग, समय और पैसा कहाँ?

२३. नंगों के देश में धोबी!

२४. आशाएँ, आलोचना और प्रतिरोध

२५. सामाजिक असहजता

२६. भारत का भूत!

२७. फूट डालो, राज करो

२८. बक्से में बंद सोच

२९. सीखते भी कहाँ हैं?

भाग ५: विजय

३०. व्यवस्थापन

३१. लोक व्यवहार

३२. प्रभाव

३३. अर्थ संकलन

३४. बुलन्द सोच

३५. मिशन

३६. प्रतिबद्धता

३७. सहकार्य

३८. नेतृत्व

३९. बलिदान

४०. अवसर को पकड़ो

४१. आत्मविश्वास

४२. व्यवहार

४३. तत्काल योजना

स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन

सन्दर्भ सामग्री

अमर वाणी

पराधीन सपनेहुँ सुख नाहिं।
— गोस्वामी तुलसीदास / श्री रामचरित मानस

नरक क्या है? पराधीनता।
— आदि शंकराचार्य

फितना परदाज़ी खूँरेज़ी से भी बढ़ के है।
(पराया द्वारा उत्पीड़न हत्या से भी बदतर है।)
— कुरान, सुर अल-बक़रा:१९१

सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते।
(माननीय पुरुष के लिए आत्मसम्मान बिना के जीवन मृत्यु से भी बढ़कर है।)
— श्रीमद्‍भगवद्‍गीता:२-३४

सामर्थ्य्मूलं स्वातन्त्र्यं, श्रममूलं च वैभवम् ।
न्यायमूलं सुराज्यं स्यात्, संघमूलं महाबलम् ॥
(शक्ति स्वतन्त्रता की जड़ है, मेहनत समृद्धि की जड़ है, न्याय सुराज्य का मूल है और संगठन महाशक्ति की जड़ है।)

खुदी को कर बुलन्द इतना कि हर तकदीर के पहले।
खुदा बंदे से खुद पूछे, बता तेरी रजा क्या है?
— इकबाल

कार्य उद्यम से ही सिद्ध होते हैं, मनोरथ मात्र से नहीं। सोए हुए शेर के मुख में मृग प्रवेश नहीं करते।
— हितोपदेश

सकल पदारथ एहि जग मांही, करमहीन नर पावत नाही।
— गोस्वामी तुलसीदास

सत्यं बृहदृत्तामृग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति ।
सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्न्पुरुं लोकं पृथिवी नः कृणोतु ॥

(सत्य पथ पर चलने की प्रवृत्ति, हृदय का विशाल भाव, सहज व्यवहार, साहस, कार्यदक्षता तथा प्रत्येक मौसम को सहने की शक्ति, ज्ञान के साथ विज्ञान में समृद्धि तथा विद्वानों का सम्मान करने के गुणों से ही राष्ट्र और मातृभूमि की रक्षा की जा सकती है।)
— अथर्ववेद

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक: ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥

(आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, आग जला नहीं सकती, जल गला नहीं सकता और वायु सूखा नहीं सकता।)
— श्रीमद्‍भगवद्‍गीता:२-२३

२४ में ४ घंटे, मधेश सेवा बंदे

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भाग १: गति

१. जीवन और मकसद

जिज्ञासु:
डाक्टर साहब, बड़ी उलझन में हूँ, क्या करूँ समझ में नहीं आ रहा है। बस अपना काम करूँ, समाज के लिए कुछ करूँ या सब कुछ छोड़ दूँ, बड़ी दुविधा है।

डॉ. सी. के. राउत:
आप अपना काम करते हैं तो दुविधा क्या है?

जि:
संतोष नहीं मिलता। पता नहीं चल रहा है, मैं ठीक कर रहा हूँ कि नहीं। सोचता रहता हूँ कि कहीं मुझे कुछ और करना चाहिए था और मैं कहीं दूसरी चीजों में उलझा तो नहीं हूँ? डर सा लगा रहता है। आखिर इस जीवन का मकसद क्या है? हम अपने जीवन में क्या करें?

डॉ:
मुझे खुशी है कि आपको ऐसा महसूस तो हुआ। क्योंकि अक्सर लोग इतनी गहरी नींद में सोते रहते हैं कि वे इस हद तक भी पहुँच नहीं पाते। वे पूरा जीवन व्यतीत कर देते हैं पर मरने तक भी यह पूछ नहीं पाते कि जीवन क्या है और उन्हें क्या करना चाहिए। आइए, मानव से पहले हम दूसरे प्राणियों को देखते हैं।

जि:
दूसरे प्राणियों को?

डॉ:
हाँ, क्योंकि हो सकता है मानव अपनी जटिल बुद्धि के कारण अपने ही विचार जाल में इस तरह फँस गया है कि उन्हें जीवन की आधारभूत कड़ी भी नहीं मिल पा रही है, इसलिए।

आप किसी जीवित प्राणी को देख लीजिए। एक ‘निर्दोष’ फूल को ही देखिए। एक छोटा सा एक-कोषीय बैक्टीरिया को देखिए। उसका मकसद क्या है? वे क्या कर रहे हैं? आप एक फूल के बीज बो देते हैं या पौधे लगा देते हैं या एक बैक्टीरिया को कहीं छोड़ देते हैं तो क्या होता है?

जि:
बीज अंकुर लेता है, पौधा बनता है, उसमें फूल खिलता है। बैक्टीरिया फैलता है।

डॉ:
हाँ, बीज अपने ऊपर की मिट्टी को भी तोड़ते हुए अंकुरता है और पौधे के रूप में प्रकट होता है, पौधा जमीन के नीचे से जल खींच लेता है, हवा लेता है, सूरज की किरण आने की ओर घूम जाता है, क्यों? क्योंकि वह जीवन चाहता है, जीना चाहता है, अपना अस्तित्व चाहता है, और अपना जीवन वहन करना चाहता है। वह रंग-बिरंगी फूल खिलाता है, क्यों? ताकि भँवरे उस पर बैठे, फिर वहाँ पर बीज पैदा हो, ताकि उनका अस्तित्व बचा रहे। पेड़ में फल भी लगता है, तो उसका भी मतलब है—अपने अस्तित्व की रक्षा करना, अपने भविष्य की रक्षा करना, ताकि वह अपने आपको दूर-दूर तक फैला सके। भविष्य में अपनी पीढ़ी को दूर-दूर तक आगे बढ़ा सके, और उनका अस्तित्व कायम रहे, खतरामुक्त रहे।

वही बात एक छोटे से बैक्टीरिया में भी लागू होती है। वह भी अपना जीवन बचाने के लिए सक्रिय रहता है। यहाँ तक कि वह अपने आपको फैलाने के लिए खुद से कई बैक्टीरिया पैदा करता है।

वही बात जानवरों में भी लागू होती है और सारे मानवों में भी। तो आप जाने या ना जाने, आप भी उसी में लगे हुए हैं, वह आपके भीतर ही निहित है। हाँ, यह बात ज़रूर है कि दिग्भम्रित होने के कारण से आप उसके लिए ठीक कदम नहीं उठा रहे होंगे, जहाँ आपको समय और मेहनत लगानी चाहिए वह करने से चूक रहे हैं, पर लक्ष्य आपके भीतर मौजूद हैं, भले ही आप उससे अज्ञात हो। और इसलिए अगर आप सचेत होते हैं और उसके बाद लगते हैं, तो अपना लक्ष्य पाने में आप ज्यादा प्रभावकारी मार्ग अपना सकेंगे, सही रास्ता चयन कर सकेंगे।

जि:
कहने का मतलब हम भी दूसरे प्राणियों की तरह जिएँ? क्या हम मनुष्यों को भगवान ने सर्वश्रेष्ठ प्राणी नहीं बनाया? मानव आज कम्प्यूटर युग तक आ गया है, उतनी प्रगति दूसरे जानवरों ने नहीं की।

डॉ:
मानव कम्प्यूटर चला सकता है, दूसरे जानवर नहीं, यह कोई बड़ी भिन्नता नहीं है, या कहें तो कोई भिन्नता ही नहीं है। जानवर भी अपने जीवन के रक्षार्थ आवश्यक चीजें या ‘टूल्स’ प्रयोग करते हैं, और मानव भी। मानव के उन्हीं उपकरणों में एक कम्प्यूटर है। बस एक उपकरण है, थोड़ा जटिल है, पर अन्तिम मकसद के हिसाब से भिन्न नहीं है।

जि:
हमारे पास धर्म है, आदर्श है, मूल्य-मान्यताएँ हैं, जो दूसरे प्राणियों के पास नहीं है। क्या हमें अपने धर्म, आदर्श और मूल्य-मान्यताओं का ख्याल नहीं करना चाहिए? जैसा कि मानव केवल अपने लिए नहीं सोचता, हममें परोपकार जैसी भावना भी तो होती है!

डॉ:
हाँ, मानव श्रेष्ठ उस मायने में हो सकता है जब हम स्वयं व्यक्तिगत रक्षा से ऊपर उठकर पूरे समाज, मानव जाति, प्राणी या इकोसिस्टम अर्थात् पर्यावरण की रक्षा करने के लिए मिट जाते हैं। वही हमें दूसरे जानवरों से श्रेष्ठ बनाता है।

सच में हमारे पास धर्म है, आदर्श है, मूल्य-मान्यताएँ हैं, और मानव धर्म का मुख्य सार ही परोपकार को कहा गया है। पर धर्म या परोपकार क्या है? समस्त प्राणी की रक्षा का माध्यम, सभी प्राणियों को बचाकर सन्तुलित रूप में ले जाने के लिए प्रकृति अनुकूल आचरण। और यह देखने में ‘निस्वार्थ’ लगता है, पर उन सब में अपने अस्तित्व बचाने का लक्ष्य ही अन्तर्निहित होता है। हम सूर्य, समुद्र, नदी, पहाड़ और मिट्टी सभी को देवता मानकर उपासना करते हैं और पर्यावरण की रक्षा करते हैं, क्योंकि वे हैं तो ही हम हैं। हम सर्प, कौवा और कुत्ता को भी पूजते हैं, दूसरे प्राणियों की रक्षा पर जोड़ देते हैं, क्योंकि इकोसिस्टम में सर्प भी है तो उसका अपना महत्त्व है, इसलिए अपने स्थान पर उसे भी रहने का हक प्रदान किया है धर्मों ने।

उसी तरह सभी आदर्श, सभी सार्वभौमिक मूल्य-मान्यताओं में भी देखेंगे तो आपको समस्त प्राणियों का कल्याण ही नजर आएगा।

जि:
यानि जीवन की रक्षा करें, यही हमारा धर्म है?

डॉ:
हाँ, इसलिए आत्महत्या और हत्या दोनों पाप कर्म माने गए हैं। ‘तुम दुष्ट हो, तुम जाकर आत्महत्या कर लो’ यह मैंने किसी धर्म में नहीं पढ़ा। जीवन की महत्ता ऐसी है।

जि:
पर धर्मों में भी हिंसा तो होते रहे हैं, वध तो किया जाता है, उसका क्या?

डॉ:
जब कोई भी प्राणी अपनी मर्यादा से बाहर होकर इकोसिस्टम को विनाशकारी दिशा में ले जाने की कोशिश करता है, तो उसका संहार धर्मों में किया गया है, ताकि बाकी जीवों को बचाया जा सके। जितने अवतार हुए हैं, जितने धार्मिक युद्ध हुए हैं, वे सब किस लिए थे? जितने देवता-दानव युद्ध हुए, वे किस लिए हुए?

जि:
यानि अपने जीवन और अस्तित्व की रक्षा करना ही हमारा उद्देश्य है?

डॉ:
हाँ, अपने अस्तित्व की रक्षा करना ही जीवन का मकसद है। यही हर प्राणी में लागू होता है। हमें क्या करना चाहिए, जीवन का लक्ष्य क्या है, अब इसमें दुविधा नहीं होनी चाहिए।

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२. जीने के लिए संघर्ष

जि:
अपने अस्तित्व की रक्षा करना हमारे जीवन का मकसद है, सही। पर मैं तो यह पहले से ही करता आया हूँ! खेतीपाती करता हूँ, दुकान चला रहा हूँ, नौकरी करता हूँ, कतार-मलेशिया भी गया, किस लिए? अपना पेट भरने के लिए, बाल-बच्चों का जीवन निर्वाह करने के लिए।

डॉ:
हाँ, लोगों को मालूम हो या ना हो, लोग कहे या ना कहे, लोग चाहे या ना चाहे, पर हर कुछ उसी लक्ष्य के इर्दगिर्द घूमते हैं। जैसा कि हमने देखा कि एक पौधा हो या एक बैक्टीरिया, उनको कोई धार्मिक गुरू या राजनैतिक नेता सिखाता नहीं है, फिर भी उनका लक्ष्य वही है, वे भी अन्तर्निहीत रूप में वही करते रहे हैं, और हम मानव भी। हम भी बहुत बार अज्ञात रूप से ही अपने लक्ष्य को हासिल करने में लगे रहते हैं, अपने जीवन को बचाने के लिए ही संघर्षरत रहते हैं। और संघर्ष हर जगह है।

कोई पैसा कमाता है ताकि वह अपना और अपने परिवार का पालन-पोषण कर सके, यानि जीवन की रक्षा कर सके। कोई नई कला सीखता है, नई डिग्री या नया तालिम लेता है, ताकि जीवन की प्रतिस्पर्धा में वह ख़रा उतर सके, उसे काम मिले और वह अपना जीवन चला सके।

जि:
हम मजदूर किसानों की बात तो समझ में आ गई। हाँ, हम सब जीने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। पर विश्व में बड़े-बड़े वैज्ञानिक हुए, बड़े-बड़े समाजसेवी लोग हुए, उनका क्या?

डॉ:
कोई अध्ययन या रिसर्च करता है, क्यों? ताकि वह समझ सके कि मानव या जीव या हमारे ग्रह का अस्तित्व बचाने के लिए क्या किया जा सकता है, उन्हें कोई खतरा तो नहीं। कोई सामाजिक कार्य करता है, उसके पीछे भी वही कारण है—मानव समाज को बचाना, मानव सभ्यता को बचाना। यहाँ तक कि कोई खेल या तमाशा करता है, उस मनोरंजनात्मक कार्यों में भी किसी न किसी तरह अस्तित्व को बचाने का लक्ष्य ही छिपा हुआ है।

जि:
तो बात हर जगह अस्तित्व की रक्षा ही है?

डॉ:
हाँ, फर्क इतना है कि कहीं वह व्यक्तिगत स्तर पर है, कहीं पारिवारिक स्तर पर, कहीं सामाजिक स्तर पर, कहीं देश के स्तर पर, कहीं विश्वव्यापी स्तर पर तो कहीं समस्त प्राणियों के स्तर पर।

कहीं अल्पकालीन लक्ष्य से उत्प्रेरित है तो कहीं दीर्घकालीन, लेकिन हैं सभी अस्तित्व की रक्षा के लिए ही।

यानि कि हम हर जगह पर, हर कार्य में अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए ही संघर्ष कर रहे हैं, चाहे हमें ज्ञात हो या न हो। इससे कुछ भी, कोई भी छूटा नहीं है, हर किसी को संघर्ष करना ही पड़ता है।

जि:
यानि हर पल हम जीने के लिए संघर्ष ही कर रहे हैं?

डॉ:
हाँ, हर पल हम सब जीने के लिए ही संघर्ष कर रहे हैं, और वही हमारे अन्तःस्थल में मकसद के रूप में भी मौजूद है।

और यह संघर्ष अनवरत है और जीव के उत्पत्ति-काल से ही चल रहा है। और जैसा कि पहले कहा, इससे कोई अछूत नहीं है, सभी को संघर्ष करना ही पड़ता है। और जो व्यक्ति, समाज या प्राणी संघर्ष नहीं कर सकता, उसका अस्तित्व लोप हो जाता है।

जि:
जैसे कि डायनासोर का?

डॉ:
हाँ, हमारे पास डायनासोर का बहुत ही लोकप्रिय उदाहरण है, बदलते पर्यावरण से संघर्ष नहीं कर पाने के कारण वे लोप हो गए। पर वह किसी एक प्राणी या नस्ल के पूरे लुप्त होने के स्तर पर ही नहीं, दैनिक जीवन की चीजों में भी लागू होता है। जैसे कि आज बदली हुई परिस्थिति में जो लोग सही ट्रेनिंग नहीं लेते, कम्प्यूटर के युग अनुकूल अपने को नहीं बनाते, नौकरियों की दुनियाँ में उनका अस्तित्व खत्म हो जाता है। फिर वे अच्छी कमाई नहीं कर सकते और उनके बच्चों का भविष्य सुरक्षित नहीं रहता, अच्छी शिक्षा और अवसर न पाने से बच्चे बिगड़ जाते हैं, और फिर उनके वंश का पतन हो जाता है।

जि:
मतलब हमें बच्चों के भविष्य के लिए संघर्ष करना ही पड़ेगा?

डॉ:
संघर्ष तो आपको हर हाल में करना ही है, इससे आप भाग ही नहीं सकते। अपने लिए करें, बच्चों के लिए करें, समाज के लिए करें या मधेश के लिए करें, पर संघर्ष करना तो है ही।

ये जो कहेंगे कि क्या मधेश मधेश करें, चलो नेपाल के स्तर पर सोचते हैं, तो क्या वहाँ संघर्ष नहीं है? नेपाल क्यों सेना रखता है, नेपाल की बार्डर रक्षार्थ गोली चलाने और जान देने को क्यों बहादुरी कहा जाता है, क्यों भारत या चीन के खिलाफ नारेबाज़ी करने में राष्ट्रवादी कहके गौरव किया जाता है?

उसी तरह आप कह सकते हैं कि मधेश क्यों, चलो अपने गाँव के विषय में सोचते हैं, या अपने परिवार के विषय में? तो वहाँ पर भी वही संघर्ष है, वहाँ पर भी पग-पग पर संघर्ष ही है। आप एक स्कूल, कॉलेज या अस्पताल खोलना चाहते हैं गाँव में, उसके लिए नेपाल सरकार परमिशन नहीं देती। अपने परिवार की उन्नति के लिए एक फ़ैक्टरी लगाना चाहते हैं, नेपाल सरकार कच्चा सामान नहीं लाने देती। तो वहाँ पर भी आप संघर्ष ही करते हैं, संघर्ष खत्म नहीं हो जाता।

जि:
तो हम संघर्ष किस स्तर पर करें? अपने आप के लिए करें, परिवार के लिए करें, गाँव के लिए करें, जिले के लिए करे, मधेश के लिए करें, नेपाल के लिए करें, एशिया के लिए करे, या विश्व के लिए करें? किस लेवल पर करें?

डॉ:
जहाँ पर कन्ट्रोल है, जहाँ पर चाबी है, जहाँ बात अटकी हुई है, वहाँ पर।

जैसे कि खेती करेंगे तब न खाएँगे और तभी न अपने बाल-बच्चों को खिलाएँगे। अब खेती के लिए बाजार में खाद नहीं मिलता, नेपाल सरकार बाहर से भी लाने नहीं देती। अब उसके लिए किस स्तर पर संघर्ष करना पड़ेगा? अपनी बीबी को पिटने से समस्या समाधान हो जाएगा? अपने गाँव वालों से झगड़ा करने से होगा? या अमेरिका के खिलाफ भूख हड़ताल करने से होगा? उस समस्या की जड़ कहाँ है, चाबी कहाँ है, उस स्तर पर हमें संघर्ष करना होगा। नेपाल सरकार बाधा डाल रही है। नेपाल सरकार मधेशी किसानों के लिए खाद, बीज और सिंचाई की व्यवस्था नहीं करती है और उसमें रुकावट डालती है, इसलिए हमें नेपाली राज से लड़ना होगा, उनको यहाँ से हटाना होगा।

उसी तरह गाँव में स्कूल या कॉलेज खोलने से, अपनी भाषा में पढ़ाने से, अपने क्षेत्र के सरकारी कार्यालयों में अपनी भाषा प्रयोग करने से, अपने गाँव में फ़ैक्टरी लगवाने से रोकता कौन हैं? मधेशियों को सरकारी नौकरी, सेना और पुलिस में रोकता कौन है? मधेशियों को विदेश पढ़ने या काम करने के कोटा में रोकता कौन है? अमेरिकी या विलायती सरकार कि नेपाल सरकार? तो हमें नेपाली राज से संघर्ष करना होगा, उसके लिए गाँव वालों से झगड़ा करके नहीं होगा, न तो अमेरिका या विलायती सरकार से लड़के। उसके लिए जो ज़िम्मेवार है, उस नेपाली राज को ही मधेश में खत्म करना होगा।

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३. डुबती नाव और अजगर का मुँह

जि:
ठीक है, डाक्टर साहब, संघर्ष के लिए सही स्तर पहचान लिया। नेपाली राज से हमें संघर्ष करना है, क्योंकि सारी चीजों की चाबी वहीं पर है। पर उसके लिए हमारा रहना जरूरी है, और उसके लिए तो हम संघर्ष कर ही रहे हैं, आखिर नौकरी करना और पैसा कमाना, ये सब हमारे अस्तित्व बचाने के लिए ही तो है! तो इसमें गलत क्या है?

डॉ:
सही कहा आपने। हम सब संघर्ष कर ही रहे हैं। हम सब खेतीपाती और नौकरी कर रहे हैं, अपने लिए धन इक्कठा कर रहे हैं ताकि हम सब अच्छी तरह खा-पी सके, अच्छा घर बना सके, बच्चों को अच्छी तरह पढ़ा सके और हमारे वंश सम्पन्न और सुरक्षित रहे। मानों हम संसार रूपी समुद्र में जीवन की नैया में बैठे हैं और खूब मछलियाँ पकड़-पकड़कर इक्कठा कर रहे हैं ताकि महिनों-महीना हम खा सके और अपने बच्चों को खिला सके, है न?

जि:
हाँ, सही कहा आपने, डाक्टर साहब। जीवन आखिर नैया ही तो है!

डॉ:
अगर उस नैया में छेद हो जाए तो? छेद होकर नाव में पानी भरने लगे तो? तो भी क्या आप और ज्यादा मछली पकड़ने में लगे रहेंगे कि नाव की रक्षा के लिए जुटेंगे?

उसी तरह, मानिए आपके टोल में आग लग गई, तो आप अनाज को घर में जमा करने में लगे रहेंगे?

वही हो रहा है मधेश के सम्बन्ध में। हमारी मातृभूमि, हमारे मधेश नामक नैया ही डूब रही है। अब यह आप पर निर्भर है कि आप उस नैया को डूबने से बचाने में जुटेंगे या पैसा कमाने में लगे रहेंगे? आज मधेश में आग लगी है, यह आप पर निर्भर है कि आप आग को बुझाने के लिए जुटेंगे कि ढेर अनाज अपनी भखारी में भरने में लगे रहेंगे?

मधेश नैया को बचाने से आपका अस्तित्व बचेगा कि और ज्यादा मछलियाँ पकड़ने से? मधेश गाँव की आग बुझाने से आपका अस्तित्व बचेगा कि और भी अनाज घर में जमा करने से? यह आप ही विचार करें।

और बात इतनी ही नहीं है, आप जो इतनी मेहनत करके मछलियाँ भी जो पकड़ रहे हैं और रख रहे हैं बर्तन में, वह बर्तन नहीं अजगर का मुँह है, अजगर आपके नाँव में बैठ गया है। अब आप विचार किजिए, क्या करना है आपको।

जि:
डाक्टर साहब, जिस नाव और अजगर की बात आप कर रहे हैं, वह सभी को क्यों नहीं दिखाई देती?

डॉ:
क्योंकि मनुष्य के पास बुद्धि है, जिसे दिग्भम्रित किया जा सकता है, खोखले नारों में भुलाया जा सकता है। कोई हमारे लिए धर्म, आदर्श, संविधान और नियम-कानून बना देते हैं और हम उसमें इतना अभ्यस्त हो जाते हैं कि मूल सत्य को ही भूल जाते हैं, जो एक पेड़-पौधा और एक बैक्टीरिया भी आन्तरिक रूप में ही समझ सकते हैं।

अजगर भी अगर लिख-पढ़ सकता और कानून बना सकता तो यही लिखता कि समुद्र और नदियों की मछलियों पर उनका अधिकार है और हमारा काम है मछलियों को पकड़कर उनके मुहँ में डालना, और बोलना ‘जय अजगर!’ पर अजगर ने नहीं बनाया क्योंकि उसे लिखना नहीं आता।

परन्तु नेपाली शासक चतुर है, उसे लिखना-पढ़ना आता है, हमें फँसाने एक पर एक जाल बुनना आता है। उसने लिख दिया— मधेश के जल, जमीन और जंगल पर उनका अधिकार है, मधेशी लोग मर-मर के खेती करके तथा देश-विदेश में मेहनत-मजदूरी करके उनकी झोली भरते रहे, यही मधेशियों का कर्त्तव्य है; वह कर्त्तव्य पालन करो और बोलते रहो ‘जय नेपाल, हामी सबै नेपाली!’ नेपाली शासकों ने हमारे दिमाग में यह भर दिया, हम उसे मान बैठे और वही करते आ रहे हैं, दो सौ वर्षों से। हम नेपाली शासकों के जाल में इस तरह फँस गए हैं कि हम केवल गुलाम बन कर रह गए हैं, अपने अस्तित्व को ही भूल गए हैं, अपने इतिहास को ही भूल गए हैं।

नेपाली शासकों ने कह दिया, ‘हामी नेपाली! नेपालको लागि मर्नु पर्छ है, शहीद हुनु पर्छ है! नेपाल को सीमा रक्षा गर्नु महापुण्य हो’ और हम बस उसी पर उछलते रहते हैं। कोई सिखा देता है, ‘हामी पहिला नेपाली, हाम्रो देश नेपाल’ और हम उछल-कूद करने लगते हैं, बिना सोचे? क्या नेपाल को ब्रह्मा ने बनाया था? और ब्रह्मा ने मधेशियों को, कमैया और कमलरियों को, आदेश दिया था कि अपनी जमीन जोतकर नेपालियों को खिलाते रहो, गुलामी करना तुम्हारा धर्म है, वही तुम्हारा कर्त्तव्य है?

मधेश खुद अलग राष्ट्र है, पर हम आज दिग्भ्रमित होकर अपनी मधेशी राष्ट्रीयता भूल गए हैं।

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४. मानव-समाज, राष्ट्र और आक्रान्ता

जि:
तो उस भ्रम से मुक्त कैसे हों?

डॉ:
भ्रम से मुक्त होने के लिए हमें समग्र तस्वीर अर्थात् ‘बिग पिक्चर’ को नहीं भूलना चाहिए, हमें मानव सभ्यता के विकास-क्रम को याद रखना चाहिए। ऐसा नहीं है कि ब्रह्मा ने नेपाल बनाया और मधेशियों को गुलामी करने का काम सौंपा और इसलिए हम भक्तिपूर्वक युग-युगान्तर ‘नेपाल नेपाल’ जपते रहे और गुलामी करते रहे।

पहले मानव पशुवत थे, जंगलों में विचरण करते थे, शिकार करके खाते थे। प्राकृतिक रूप में अपने अस्तित्व बचाने के लिए बच्चे पैदा करते थे, उन्हें पालन-पोषण करते थे, इससे परिवार बना। मानव को प्रकृति से संघर्ष के दौरान अपने अस्तित्व के ऊपर खतरा महसूस होता रहा, जंगली जानवर आदि का डर रहता था, इसलिए वे समूह बनाकर रहने लगे। इस तरह से समाज का विकास हुआ। बाद में समाज की सारी गतिविधियों को ठीक ढंग से चलाने के लिए उनका मुखिया चुना जाने लगा। और वह व्यवस्था राजा-महाराजा होते हुए संसद और सरकार के रूप में विकसित हुई ताकि ठीक और न्यायपूर्ण तरीकों से सारी बातों को चलाया जा सके।

पर हुआ क्या कि इसमें कितने समूह आक्रामक निकले, कई जातियाँ अपने लाभ के लिए दूसरों के स्थानों पर कब्जा जमाने लगीं, दूसरों को गुलाम बनाने लगीं, उनकी जमीन से अनाज के हिस्सा लेकर जाने लगीं, और वही मधेश के साथ हुआ।

जि:
आपका मतलब खस नेपालियों से है, वे आक्रान्ता हैं?

डॉ:
खस एक घुमक्कड़ जाति थी जो बेबिलोन, मेसोपोटामिया से हिन्दुकुश, कश्मीर, गढ़वाल और कुमाऊँ होते हुए वर्तमान नेपाली राज में पश्चिम की ओर से प्रवेश की थी। खस जाति के लोग मष्टो ‘धर्म’ मानते थे। वे हिन्दू नहीं थे। वैदिक हिन्दू और संस्कार न होने के कारण उन्हें आर्य द्वारा ‘मलेच्छ’ कहा जाता था। बाद में उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाया और उसके बाद हिन्दू धर्म धारण किया।

निरन्तर अतिक्रमण करते हुए एक जगह से दूसरी जगह चलते रहने के कारण उनका अपना कुछ भी नहीं है, भाषा अपनी नहीं, संस्कृति अपनी नहीं, धर्म अपना नहीं, पहचान अपनी नहीं। बस वे जहाँ जाते हैं, वहीं की खोल ओढ़कर वहीं के होने का दावा करने लगते हैं। बक़डियों के बथान में घुसकर बकड़ियों की खाल ओढ़ लेते हैं, हाँस के बथान में घुसकर हाँस की ही खाल ओढ़ लेते हैं, पर है तो भेड़िया, मौका पाते ही उन्हें ही खाने लगते हैं।

आप देख रहे हैं, पश्चिम की ओर से नेपाल में प्रवेश किया, और नेपाल के आदिवासियों को ही विस्थापित कर दिया। यहाँ पूरब की ओर बढ़ते-बढ़ते वे दार्जिलिंग और सिक्किम गए, वहाँ पर देखिए, वहीं अपना आधिपत्य जमाना चाहते हैं, गोर्खालैण्ड की माँग कर रहे हैं, वहाँ के आदिवासियों को ही जीना हराम कर दिया है। उससे भी पूर्व भूटान भी गए, वहाँ पर भी उन्होंने उल्टा धावा बोलना चाहा, पर वहाँ उनको करारा जवाब मिला।

अब ये खस-नेपाली लोग पिछले ५०–६० वर्षों से मधेश उतरकर वहाँ धावा बोल रहे हैं। नेपालियों ने छलपूर्वक मधेशी आदिवासियों की जमीन पर कब्जा कर लिया, मधेशियों को गुलाम बना लिया, कमैया और कमलरी बना लिया। वे लोग मधेशियों को ही मधेश से विस्थापित करने में लगे हैं, मधेश राष्ट्र को तबाह करने में लगे हैं।

जि:
तो क्या मधेश राष्ट्र है? क्या हमारा राष्ट्र नेपाल नहीं?

डॉ:
बड़ी बिडम्बना की बात है कि पिछले कुछ दशकों की शिक्षा प्रणाली के द्वारा हमारे साथ ऐसा षड्यन्त्र किया गया कि आज हम अपने मधेश राष्ट्र को भूला बैठे हैं, अपने इतिहास को भूला बैठे हैं, २०० वर्ष पहले हमारे राजा कौन थे, उनके नाम तक आज अधिकांश मधेशियों को पता नहीं है।

मधेश सबसे पुरातन राष्ट्रों में से है। राष्ट्र के लिए साझा उत्पत्ति, भूभाग, भाषा, संस्कृति, आर्थिक जीवन और मनोवैज्ञानिक संरचना की जरूरत होती है—वे मधेशियों के पास हैं। हमारी राष्ट्रीयता नेपाली कभी नहीं हो सकती—मधेशियों का मूल नेपालियों से अलग है, मधेशियों का भूभाग अलग है, भाषा अलग है, आर्थिक जीवन अलग है, मनोवैज्ञानिक संरचना अलग है, आकांक्षाएँ अलग हैं। हाँ, हम सब नेपाली राज में अभी जरूर हैं, जिस तरह से भारतीय कभी विलायती राज में थे।

जि:
हमारा इतिहास उतना पुराना है? नेपाली नेता तो मधेशियों को आदिवासी नहीं मानते?

डॉ:
हम लाखों वर्ष से मधेश में रहते आए हैं। आपने सुना होगा कि १ करोड १० लाख वर्ष पुराने रामापिथेकस का अवशेष मधेश से मिला है। यानि मानव के विकास से लेकर हम मध्यदेश में ही रहते आए हैं, हमारा इतिहास मानव सभ्यता का इतिहास जितना ही पुराना है। और मधेश में ५०–६० वर्ष पहले आकर बस गए नेपाली लोग हमें कहते हैं कि हम आदिवासी नहीं है!

मधेशी लोग तो १० हजार वर्ष पहले भी मध्यदेश में ही थे और आज भी मध्यदेश में ही हैं। फिरंगी तो खस नेपाली लोग है, जो मेसापोटामिया से घुमते फिरते मधेश तक आ पहुँचे हैं। और उनका अपना कुछ है भी नहीं है—न राष्ट्र, न भाषा, न वेश, न संस्कृति।

हमारी राष्ट्रीयता और सभ्यता तो हजारों वर्ष पहले भी श्रेष्ठ थी। आज भी बुद्ध से पहले के समय के नगरों और गाँवों के भग्‍नावशेष उत्खनन से प्राप्त हो रहे हैं, जो उच्च कोटि की सभ्यता का परिचय दे रहे हैं। पर दुर्भाग्य से हम अनेकों छल-कपट के शिकार हुए और वह गौरवशाली मधेशी सभ्यता आज संहार की कगार पर है।

जि:
कहने का मतलब यह दो सभ्यताओं का संघर्ष है, अपने अस्तित्व के लिए?

डॉ:
हाँ, यह दो सभ्यताओं के बीच का संघर्ष है। यह खस/नेपाली आक्रान्ताओं और मधेशियों के बीच का संघर्ष है। और इसमें अपने अस्तित्व को फैलाने के लिए खस/नेपाली आक्रान्ता मधेशियों का अस्तित्व मिटाने का षड्यन्त्र करते रहे हैं, और मधेशी लोग बार-बार शिकार होते रहे हैं।

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५. शोषण, विलोपन और योग्यतम का बचना

जि:
नेपाली आक्रान्ता मधेश में अपना अधिकार जमाने के लिए किस तरह से शोषण और षड्यन्त्र कर रहे हैं?

डॉ:
नेपाली लोग अपनी सेना लगाकर मधेश में उपनिवेश कायम करते हुए मधेशियों की नस्ल को समाप्त करने में लगे हुए हैं। मधेशी लोग दासता, विस्थापन और जातीय सफाया के शिकार हो रहे हैं। उन्हें मौलिक अधिकारों से वंचित किया गया है, कई मधेशियों को नागरिकता तक नहीं मिल पाती। मधेशियों के लिए कानूनी, सामाजिक और आर्थिक रूप में भेदभाव है, मधेश का आर्थिक दोहन होता आया है। मधेशियों को अनेकों यातना देने के साथ-साथ मधेशी युवा आज गैर-न्यायिक हत्या के शिकार होते रहे हैं।

हर क्षेत्र में, हरेक स्तर पर, नेपाल सरकार मधेशियों के साथ घोर षड्यन्त्र कर रही है। नेपालियों ने ५० वर्ष पहले ही अपने आदमियों को मधेश में बिठाकर मधेश का नेपालीकरण करने की योजना लाई, उसका प्रभाव आज देखिए। आदिवासी मधेशी विस्थापित होकर कमैया, कमलरी और गुलाम बन गए हैं। विराटनगर और नेपालगंज जैसी जगहों पर अब मधेशियों पर आक्रमण होते रहते हैं।

मधेशी किसानों के साथ देखिए, क्या हो रहा है। भारत से खाद-बीज लाने पर पुलिस की गोली खानी पड़ती है; सिंचाई की व्यवस्था नेपाल सरकार करती नहीं, उल्टा मधेश की नदियों का पानी नहर मार्फत भारत को दे दिया जाता है; और जब किसान मर-मिटकर अपनी फसल काटते हैं, तो नेपाल सरकार भारत से धान आयात करके ढेर लगा देती है और मधेशी किसानों को धान कचरे के भाव में बेचना पड़ता है। उतना ही नहीं, मधेशी किसानों से आत्मनिर्भरता छिनने के लिए एक पर एक महाषड्यन्त्र हो रहा है। अभी तो किसान खाद के लिए निर्भर रहते आए हैं और ऋण लेकर भी खाद खरीदते रहे हैं, पर अब उससे बड़ा षड्यन्त्र हो रहा है। मोनसान्टो जैसे बीज नेपाल सरकार आयात करके किसानों के अपने बीज नष्ट करने में लगे हैं। एक-दो वर्ष मोनसान्टो के बीज लगाने पर किसानों के पास रहे बीज नष्ट हो जाएँगे, उसके बाद हर साल मधेशी किसान दूसरों से बीज खरीदने के लिए मजबूर होते रहेंगे। खेत लगाकर और ऋण लेकर बीज भी उसी से खरीदो, खाद भी उसी से खरीदो, सिंचाई की व्यवस्था है नहीं, मशीन लगाकर सिंचाई करो, फिर फसल नहीं हुई, तो क्या करेंगे? खेत की नीलामी होगी, किसान भूमिहीन होंगे, विस्थापित होंगे, और अन्त में, जैसा कि भारत में होते आया है, हजारों-हजार किसान आत्महत्या करने पर मजबूर होंगे। यह घोर षड्यन्त्र हो रहा है हमारे साथ।

जि:
क्या जरूरत है खेती करने की? विदेश चले जाएँगे, दुबई, कतार और मलेशिया है न?

डॉ:
बात है, कब तक? कब तक मधेशियों को जाने देगी नेपाल सरकार? देखिए दूसरे क्षेत्रों में अभी भी विदेश जाने के लिए अवसर आते हैं; सरकारी ऑफिस में भी विदेश जाने के लिए कोटा आता है, छात्रवृत्ति में भी विदेशी कोटा आता है, उसमें कितने मधेशियों को जाने देती है नेपाल सरकार? बहुत कम, या शायद ही कभी। उसी तरह अभी वैदेशिक रोजगार का अवसर प्रचूर है तो ठीक है, जिस दिन नेपालियों को विदेश में काम करने के लिए जाने के अवसर का अभाव होने लगेगा, मधेशियों को विदेश जाने पर रोक लग जाएगी। जब मलेशिया, दुबई या कतार कहेगा कि सालाना केवल १०० आदमी ही लूँगा, तब उनमें कितने मधेशियों को नेपाल सरकार जाने देगी? तब क्या किजिएगा?

जि:
बात तो सही है, डाक्टर साहब। तो हम क्या करें?

डॉ:
सबसे पहली बात है कि अगर हम नेपालियों के षड्यन्त्र को अब जल्दी नहीं पहचानते, और अपने बचाव के लिए संघर्ष नहीं करते हैं तो यह स्थिति भूखमरी, विस्थापन, नस्ल संहार और अन्त में मधेशियों के विनाश में ही जाकर रूकेगी। और मैं केवल कह नहीं रहा हूँ, यह हो रहा है।

तो अगर हमें जीना है तो हमें जुधना है। इसका कोई दूसरा उपाय नहीं है। देवता-दानव के युद्ध से लेकर अमेरिका-अफगानिस्तान युद्ध तक में वही एक सत्य है, अस्तित्व के लिए संघर्ष करना ही पड़ेगा।

जि:
कैसे करें संघर्ष?

डॉ:
हमें पहले यह सोचना होगा कि सारी बातों की चाबी है तो है कहाँ? आज मधेश में मानव अधीन की एक भी बात मुझे बताएँ जो नेपाल सरकार के द्वारा नियन्त्रित न हो।

स्कूल खोलना, दूकान खोलना, फ़ैक्टरी लगवाना, अस्पताल खोलना, कुछ खरीदना, पैसा कमाना और बचाना—सभी नेपाल सरकार के हाथों में हैं। कुछ दिन पहले की बात है नेपाली पुलिस आकर सप्तरी जिले के एक गाँव में पेड़े की दुकान पर उत्पात मचा गई और कहने लगी दुकान खोलने का लाइसेन्स है? नेपाल सरकार ने तो मधेश में स्कूल या अस्पताल खोलना तो लगभग बन्द ही कर दिया है, पर आप स्वयं भी खोलना चाहेंगे, तो परमिशन नहीं देती, रोक लगा देती है। जैसा कि पहले कहा, नेपाल सरकार किसानों को खाद और बीज बार्डर पार से नहीं लाने देती, पर इंडिया से धान लाकर ढेर लगा देती है और मधेशी किसानों की धान का भाव मिट्टी में मिला देती है!

यहाँ तक कि कोई रिसर्च करना या कोई किताब पढ़ना तक भी नेपाल सरकार के हाथों में है। आपने सुना होगा “शासक विरोधी” किताब होने पर सरकार पुस्तक ज़ब्त कर लेती हैं और लोगों को पढ़ने का अधिकार तक नहीं रहता। स्कूल में बच्चों को कौन सी किताबें आप पढ़ा सकते हैं, यह बात भी नेपाल सरकार निर्णय करती है। कई बार सुना होगा, “बाहर” की किताबें पढ़ाने पर कितना विरोध हुआ। उतना ही नहीं, इन्टरनेट पर भी आप क्या देख सकेंगे या क्या लिख सकेंगे, यह भी सरकार नियन्त्रण करती है।

और तो और आपकी जान भी नेपाल सरकार की मुट्ठी में है; वह जब चाहे खत्म कर देगी पर आप अपनी जान भी नहीं दे सकते! गैर-कानूनी है। आमरण अनशन या भूख हड़ताल पर भी बैठते हैं तो पुलिस धरपकड़ करके ले जाती है। नेपाल सरकार का इतना ज्यादा नियन्त्रण है हमारे ऊपर।

तो सारी चीजों की चाबी नेपाल सरकार के पास है, मधेशियों के पास नहीं। मधेशी शासित वर्ग है, गुलाम है। मधेशियों को वह चाबी हासिल करनी होगी, मधेशियों को स्वराज हासिल करना होगा, और वह राजनीति के द्वारा ही किया जा सकता है।

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६. छोड़ो राजनीति, चलो अपना काम करें

जि:
ठीक है, डाक्टर साहब। माना नेपाली राज के पास ही सारी चाबी है। पर राजनीति जैसी गंदी चीज क्या करना! हम अपने जॉब या नौकरी करके भी तो मधेश को बदल सकते हैं? आप भी अमेरिका में रहकर पैसा कमाते तो क्या नहीं कर सकते थे?

डॉ:
ठीक है। देश या विदेश में, आप कितना कमाएंगे? महीने के दस लाख? अच्छा, दस लाख ही सही। दस लाख महीने से हो गया साल का १ करोड बीस लाख, उसमें एक-तिहाई टैक्स, एक-तिहाई खर्च घटाकर सालाना बचेगा ४० लाख। मान लिजिए, आप में तनिक भी व्यक्तिगत स्वार्थ या आकांक्षा नहीं है, आपने अपनी सारी कमाई समाज में ही लगा दी। अगर २५ वर्ष नौकरी करेंगे आप, तो कितने लगा पाएँगे?

जि:
दस करोड़!

डॉ:
उस १० करोड़ में आप यहाँ से १० किलोमीटर रोड़ बनवा सकते हैं? बीच में दो नदियाँ पड़ती हैं, उन पर पुल बनवा सकते हैं? एक अस्पताल बनवा सकते हैं? शायद ही। और बनवा भी दिए तो १० वर्ष के बाद उसका क्या होगा? १० वर्ष के बाद वह रोड़ या पुल मौजूद भी होगा कि बाढ़ के पानी में बह चुका होगा, कहा नहीं जा सकता।

यानि कि आप मर-मर के २५ वर्ष काम किए, अपने सारे पैसे समाज में लगा दिए, फिर भी आप १० किलोमीटर सड़क या एक-दो पुल नहीं बनवा सकते, और बनवाते भी हैं तो पानी की तरह १०–१५ वर्ष में बह जाता है और कोई नामोनिशान तक नहीं रहता, तो यही है जीवन का सदुपयोग? क्या यह राश्ता सही है?

और यह तो महीने के १० लाख कमाने वाले और सारी कमाई समाज में लगाने वालों की हालत हैं। यहाँ के अधिकांश लोग तो महीने में २५००० भी नहीं कमाते, और पहले के अनुपात में तो पूरे जीवन लगाकर आप २५ लाख ही समाज में लगा पाएँगे। क्या होगा उससे? तो कैसे कहूँ कि नौकरी करो, पैसा कमाओ, और उसी से समाज सेवा करो तो सुधर जाएगी दुनियाँ? यह भ्रम है।

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७. बिल गेट्स बन जाऊँगा

जि:
अच्छा, नौकरी को छोड़िए। बिज़नेस करके ही खूब पैसा कमाऊँ तो? खूब पैसा कमाने पर तो होगा? तब तो परिवर्तन ला सकेंगे, तब तो समाज और इतिहास का कायापलट कर सकेंगे?

डॉ:
तो उस इतिहास में बताइए आप कितने धनाढ्य को जानते हैं? अच्छा १०० वर्ष पहले के धनाढ्य के नाम बताइए तो!

जि:
कोई याद नहीं।

जि:
तो जब पैसों से ही परिवर्तन आ सकता है, कायापलट हो सकता है, तो कहाँ है पैसों से कायापलट करने वाले? ठीक है, अभी के ही सबसे ज्यादा धनी आदमी का नाम बताएँ।

जि:
बिल गेट्स।

डॉ:
नहीं, अभी बिल गेट्स से भी ज्यादा धनी कोई और है, याद है उनका नाम आपको?

जि:
अच्छा कोई और है? पता नहीं।

डॉ:
हाँ, सच्चाई तो यह है कि बिल गेट्स का भी नाम आपको इसलिए नहीं याद है कि वह धनाढ्य है बल्कि इसलिए कि वे कम्प्यूटर के क्षेत्र में व्यापक परिवर्तन लाने वाले लीडर हैं, अगर धनवान होने से आप उनको याद करते तो अभी के सबसे धनी आदमी का नाम भी आपको पता होता।

और धनवान क्या कर सकता है? क्या वह नेपाल सरकार की अनुमति बिना यहाँ स्कूल खोल सकता है? रिसर्च कर सकता है? सडक या नहर ही बनवा सकता है? नहीं। तो फिर बात वहीं आ जाती है—नेपाली राज और राजनीति।

जि:
तो आप कह रहे हैं कि विकास भी राजनीति से ही सम्भव है?

डॉ:
आप खुद देखिए, किसके द्वारा विकास हुआ है। बिल गेट्स या उपेन्द्र महतो के द्वारा किया हुआ विकास देखिए और नरेन्द्र मोदी और नितिश कुमार का किया हुआ विकास देखिए।

जि:
कहने का मतलब, इस तरह से कुछ नहीं मिलेगा?

डॉ:
इससे आपको पब्लिसिटी जरूर मिलती रहेगी कि फलाने बाबू ने यह इनार खुदवाया तो फलाने बाबू ने यह क्लब बनवाया तो फलाने बाबू ने यह अनुदान या ग्रांट दिया। आपके नाम गढ़े रहेंगे चबुतरे पर, पर अफसोस, इससे समाज में व्यापक परिवर्तन नहीं होता।

जि:
पैसा न सही, हम अपने ही क्षेत्र में काम करके बहुत बड़े तो हो सकते हैं न, बहुत नाम काम सकते हैं न? हम वही क्यों न करें?

डॉ:
आप अमेरिका में बड़े उद्योगपति बन जाएँ कि यूरोप में बड़े वैज्ञानिक बन जाएँ तो क्या हुआ, जब आपके गाँव-समाज के लोगों को आपके उस बड़प्पन से कुछ लेना-देना नहीं रहता! आपकी बड़ी-बड़ी डिग्री और रिसर्च पेपर से गाँव वालों को क्या लेना-देना! बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर, पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर। ऐसा कुछ किजिए जिससे आपके अपने लोगों को भी शीतलता की छाँव मिले, जिसे आपके गाँव-समाज के लोग भी समझ सके। जिन्होंने आपको बचपन में गोद में उठाया, जिस गलियों में आप खेले-कूदे, जिस समाज में आप पले-बडे, उनकी समझ और पहुँच की भी कुछ चीज किजिए, उनके एहसास और लाभ की भी चीज किजिए।

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८. विकास चाहिए, बात नहीं

जि:
ठीक है, नौकरी गई खेत में, उपेन्द्र महतो भी नहीं बनना। चलिए, एक एनजीओ खोलते हैं, उससे विकास के कार्यक्रम लाएँगे और मधेश का खूब विकास करेंगे।

डॉ:
आप मुझे कोई एक देश दिखा दिजिए जो एनजीओ के माध्यम से विकसित हो गया हो।

जि:
मालूम नहीं।

डॉ:
किसी देश का एक राज्य ही बता दिजिए।

जि:
आप कहना क्या चाहते हैं? क्या ऐसा कोई देश या राज्य नहीं है?

डॉ:
अगर एनजीओ के माध्यम से विकसित हुआ कोई देश या राज्य है, तो आप ही बताइए न! और एनजीओ क्या कर सकता है क्या नहीं, वह भी सरकार निर्धारण करती है, सरकार उसे अनुमति देगी तभी वह कोई छोटे-मोटे कामों में हाथ भी बँटा सकता है, नहीं तो कुछ भी नहीं।

जि:
यानि कि उसके लिए भी नेपाली राज के अंकुश को ही हटाना पड़ेगा?

डॉ:
हाँ, क्योंकि आपको अरबों डॉलर का खजाना भी मिल जाए, तो भी आप बिना नेपाल सरकार की अनुमति से विकास नहीं कर पाएँगे।

जि:
हम खुद करें तो?

डॉ:
बिना स्वतन्त्रता विकास सम्भव नहीं है, विकास स्वतन्त्रता से आता है। पहले आजादी ही चाहिए, उसके बाद ही विकास हो सकता है। आपने सुना होगा ४-५ महीने पहले की घटना। रूपन्देही में कुछ गाँव वाले स्थानीय नदी से गिट्टी-रोड़ा उठाकर अपना रास्ता खुद ही मरम्मत करने लगे, जिस पर नेपाल पुलिस ने कार्रवाई की और लोगों के घर घूसकर महिलाओं को समेत निर्ममतापूर्वक पीटा। मधेशियों के लिए रोक है, पर वहीं कुछ दिन पहले गिट्टी-रोड़ा को भारत निर्यात करने के लिए सिडिओ ने वैध कर दिया।

नेपाल सरकार तो मधेश में अस्पताल नहीं खोलती, पर यहीं के लोग खोलने लगते हैं, तो उसके लिए परमिशन नहीं देती। नेपाल सरकार तो नहीं खोलती, पर आपको भी गाँव में एक स्कूल खोलने के लिए भी परमिशन नहीं देती।

जि:
यानि राजनीति ही है जो सब कुछ नियन्त्रित करती है? और हमें आजादी ही पहले चाहिए, तभी ही विकास हो सकता है?

डॉ:
हाँ, यह केवल राजनीति है। आज के दिन में हमारे लिए वह नेपाली राज है जो सर्वव्यापी रूप में हरेक चीज पर नियन्त्रण करता है। उससे आजादी मिले बिना विकास सम्भव नहीं।

एनजीओ खोलकर, सबसे बड़ा धनवान बनकर, दान-पुण्य जैसे समाजसेवा करके या नौकरी करके उतना व्यापक परिवर्तन नहीं आता, जितना राजनीति से लाया जा सकता है। अगर आप सचमुच मधेश में आमूल परिवर्तन चाहते हैं तो आपको राजनीति में आना ही पड़ेगा। अभी सब कुछ राजनीति से बन्द हैं। हाँ, उसके द्वारा मार्ग खुल जाने पर आप दूसरे तरीकों से भी परिवर्तन ला सकते हैं, जैसे कि कम्प्यूटर या कृषि-विज्ञान या औद्योगिक क्षेत्र में क्रान्ति करके, पर पहले राजनीति से उसे ‘अनलॉक’ करना होगा।

और एक महान दार्शनिक प्लेटो ने भी कहा है कि अगर राजनीति को आप दूसरों के हाथों में छोड़ देंगे तो आपको नीच लोगों के द्वारा शासित होना पड़ेगा।

मधेशियों के जीवन और अस्तित्व संकट में हैं,

यह अस्तित्व की लड़ाई है,

यह नया नहीं, आदिकाल से चल रहा है,

अपने अस्तित्व की रक्षा करना ही सबसे बड़ा धर्म है,

इससे कोई अलग नहीं रह सकता,

मधेशियों के अस्तित्व के लिए वर्तमान नेपाली राज ख़तरा है,

हर चीज की चाबी नेपाल सरकार के पास ही है,

नौकरी, एनजीओ, दान-धर्म आदि जैसे दूसरा कोई रास्ता फलदायी नहीं है,

नेपाली राज से लड़ने के लिए राजनीति अपरिहार्य है।

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भाग २: दिशा

९. मधेश के मुद्दे

जि:
ठीक है, यह तो तय हो गया कि राजनीति ही हमारी चाबी है। पर मैं यह जानना चाहता हूँ कि हमारी वर्तमान स्थिति क्या है? मधेश का मुद्दा क्या है?

डॉ:

  1. नेपाली उपनिवेश: अंग्रेजों ने सन् १८१६ और १८६० की संधियों के द्वारा मधेश को नेपाल के राजा को सौंप दिया, और सन् १९२३ की संधि द्वारा नेपाल को सार्वभौम देश के रूप में मान्यता देने के बाद मधेश नेपाल का उपनिवेश बन गया। यहाँ तक कि सन् १९५८ तक मधेश से नेपाल (घाटी) जाने के लिए मधेशियों को पासपोर्ट लेना पड़ता था, जो चिसापानीगढ़ी में जाँच की जाती थी।
  2. रंगभेद: मधेशियों को ‘काले’ मानकर उनके साथ नेपाली राज में भेदभाव किया जाता है और मधेशी लोग अनेकों सामाजिक दुर्व्यवहार के शिकार होते रहे हैं।
  3. दासता: मधेशियों को नेपाली शासक कमैया, कमलरी और दास बनाकर शोषण करते रहे हैं। यहाँ तक कि कानूनी रूप में किसी गुनाह की सजा स्वरूप नेपाली राज में सन् १९२० तक मधेशियों को दास बनाया जा सकता था।
  4. विस्थापन: सन् १९५१ से २००१ के बीच मधेश में नेपालियों/पहाडियों की जनसंख्या ६% से बढ़कर ३३% हो गई। उसी तरह सन् २००१ में नेपाली साम्राज्य की पूरी जनसंख्या का ४८.४% तराई में था परन्तु सन् २०११ में वह बढ़कर ५०.३% हो गई। इस तरह से पहाडियों का मधेश की भूमि पर आकर कब्जा करके बस जाने से भारी संख्या में मधेशी आदिवासी लोग विस्थापित होते रहे हैं।
  5. जातीय सफाया और दंगे: मधेशी लोग नेपाली राज में अनेकों जातीय सफाया और दंगे के शिकार होते रहे हैं। ऋतिक रोशन कांड और नेपालगंज घटना जैसे दंगों को फैलाने और प्रश्रय देने में नेपाली प्रशासन और पुलिस का भी हाथ रहता आया है।
  6. नागरिकता: आज भी लाखों मधेशी नागरिकता से विहीन है, जिसके कारण वे भूमि स्वामित्व से लेकर सरकारी नौकरी और सेवा से भी वंचित रहते आए हैं।
  7. मौलिक अधिकारों का हनन: अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता लगायत के मौलिक अधिकारों से कई मधेशी वंचित होने के साथ-साथ नागरिकता के अभाव में लाखों मधेशी मतदान अधिकार से भी वंचित होते रहे हैं।
  8. आर्थिक दोहन: मधेश के जल, जमीन और जंगल लगायत के स्रोतों पर मधेशी प्रतिकूल नियन्त्रण करने के साथ-साथ राजस्व, सीमा शुल्क, बाजार नियन्त्रण, व्यापार आदि सम्बन्धी आर्थिक नीति मधेशियों को व्यापक शोषण करने पर लक्षित करके मधेश का आर्थिक दोहन किया जाता रहा है।
  9. नेपालीकरण: मधेश में नेपालियों को पहाड़ से लाकर बसाके तथा मधेश में नेपाली भाषा, वेश और संस्कृति लादकर मधेश का नेपालीकरण किया जाता रहा है।
  10. असमान कानून और व्यवस्था: नेपाली राज में मधेश और मधेशियों के लिए कानून और व्यवस्था असमान रहती आई है। वर्तमान में भी नागरिकता, भूमि हदबन्दी, वन उपभोग, भाषा-संस्कृति, आप्रवासन आदि सम्बन्धी कानून मधेशियों प्रति अन्यायपूर्ण हैं।
  11. सीमावर्ती क्षेत्रों में यातना: नेपाल और भारत दोनों ओर के सुरक्षाकर्मियों और अधिकारियों के द्वारा मधेशी लोग उत्पीड़ित होते रहे हैं। भारतीय मुद्रा का अभाव और सीमा आरपार करने पर दुर्व्यवहार झेलने से लेकर भारतीय बाँध के कारण दर्जनों मधेशी गाँव बाढ़ और डुबान से पीड़ित होने तक, अनेकों समस्याओं से मधेशी लोग उत्पीड़ित होते रहे हैं।
  12. गैर-न्यायिक हत्या: एक के बाद दूसरी ‘सुरक्षा योजना’ और ‘सुरक्षा विधेयक’ लाकर नेपाल सरकार द्वारा दर्जनों निर्दोष मधेशी कार्यकर्ताओं की हत्याएँ की जा रही है।
  13. विकास का अभाव और गरीबी: ऊर्बर भूमि और अन्न के भंडार के लिए जाने गए मधेश नेपाली राज की नीति के कारण आज विकास का अभाव और गरीबी से उत्पीड़ित है। सिंचाई, सड़क, अस्पताल और कॉलेज जैसे मधेश के भौतिक पूर्वाधार उपेक्षित होने के साथ-साथ मधेशियों की बहुत बड़ी संख्या गरीबी और कुपोषण के शिकार हो गई है। मधेश में १९% परिवार अति खाद्यान्न अभाव वाले परिवार हैं, ५०% बच्चे रक्तअल्पता के शिकार हैं, २०% बच्चे अपक्षय की स्थिति में हैं और ४२% महिलाएँ रक्तअल्पता के शिकार हैं। नेपाली राज में सब से कम साक्षरता दर वाले जिले भी मधेश में हैं और मधेश के जिलों का मानव विकास सूचकांक भी बहुत कम है।
  14. विभेद और उपेक्षा: नेपाली राज्य संयन्त्र के हर क्षेत्र में मधेशियों प्रति विभेद रहा है और हर क्षेत्र में प्राय: मधेशियों को १२% से कम ही स्थान मिला है। निजामती सेवा/प्रशासन में केवल ८-९%, न्यायपालिका में केवल ८%, और सेना तथा सुरक्षा निकायों के उच्च पदों में लगभग ०% मधेशियों की उपस्थिति रही है। नेपाली नागरिक समाज और मीडिया से भी मधेशी बहुत उपेक्षित हैं।
  15. अन्तरराष्ट्रीय दबाव: मधेश प्रति संयुक्त राष्ट्र संघ, संयुक्त राज्य अमेरिका, भारत, विलायत, चीन लगायत के अन्तरराष्ट्रीय शक्तियों की भी स्पष्ट या अनुकूल नीति नहीं होने की वजह से अन्तरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा भी मधेशी पीड़ित हैं। यहाँ तक कि विदेशी अनुदान, सहयोग और परियोजनाओं में भी मधेशियों को उचित हिस्सा नहीं मिल पाता है।

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nepalmadhesh

१०. मधेश में नेपाली उपनिवेश

जि:
आपने मधेश नेपाली उपनिवेश होने की बात कही। उसके विषय में जरा और बताइए।

डॉ:
हाँ, मधेश राष्ट्र आज परतंत्रावस्था में है, आज यह नेपाल का उपनिवेश है। मधेश राष्ट्र जिसका अपना गौरवशाली इतिहास रहा है, जहाँ पर एक से एक शूरवीर राजा महाराजा हुए, वह आज नेपाल के औपनिवेशिक शोषण के तले दबा हुआ है।

मधेश केवल सन् १८१६ और १८६० में नेपाली साम्राज्य के अधीनस्थ हुआ। प्रति वर्ष दो लाख रुपए भुगतान के बदले, सन् १८१६ में अंग्रेजों ने मधेश के पूर्वी भाग नेपाल के राजा को दे दिया। उसी तरह, भारत में सन् १८५७–५९ के दौरान हुए सिपाही विद्रोह को दबाने के लिए नेपाल के राजा द्वारा दिए गए सैन्य सहयोग के बदले उपहार स्वरूप अंग्रेजों ने पश्चिम मधेश नेपाल के राजा को दे दिया। और इस प्रकार से मधेश नेपाल का उपनिवेश बना था।

जि:
आन्तरिक उपनिवेश तो सुनता आया हूँ, आप कह रहे हैं पूरा उपनिवेश?

डॉ:
नेपाली सेना और शासक मधेश में मधेश बाहर से आकर बसे हैं और वहाँ पर अपना नेपाली शासन लादे हुए हैं, तो यह आन्तरिक उपनिवेश कैसा! यह पूर्ण उपनिवेश है। नेपाली मधेश के लिए बाह्य-तत्त्व है।

जि:
मधेश में इस नेपाली औपनिवेशिक शासन की विशेषताएँ?

डॉ:
मधेश में रहे नेपाली शासन का चरित्र विशुद्ध रूप से औपनिवेशिक शोषण पर लक्षित रहा है, जैसे—

  1. मधेशी सेना का उन्मूलन और नेपाली सेना में मधेशियों के प्रवेश पर अघोषित प्रतिबंध,
  2. मधेश बाहर से नेपाली सेना लाकर पूरे मधेश में सैन्य बैरकें और चेक पोस्ट खड़ा करना, (इसकी तुलना इस प्रकार की जा सकती है: मानों अमेरिका से अमेरिकी सेना का उन्मूलन करके अमेरिकी जनता को सेना में भर्ती पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाय और उत्तरी कोरिया की सेना जाकर पूरे अमेरिका भर में सैन्य बैरकें स्थापना करके बैठ जाएँ, तो उसे क्या कहा जाएगा?)
  3. मधेशी जनता से भारी और अनुचित कर, भन्सार और राजस्व वसूली करना पर मधेश में उचित लगानी न करना,
  4. मधेश के वन-जंगल, खान, नदी-नाले और जमीन सहित के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करना,
  5. मधेशी आदिवासियों की भूमि पर कब्जा कर उसे नेपाली प्रशासक, सेना और पुलिस में बाँट देना,
  6. सरकारी योजनाओं द्वारा नेपाल के शासकवर्ग के लोगों को लाकर मधेश में बसाना,
  7. मधेशियों को नेपाल आने-जाने के लिए (सन् १९५८ तक) पारपत्र या पासपोर्ट लेने की जरूरत होना,
  8. नेपाली शासकवर्ग की भाषा, वेश और संस्कृति मधेश पर लादना,
  9. मधेशियों को कमैया और कमलरी सहित के दास बनाना,
  10. मधेशियों के लिए अलग नियम-कानून होना, जैसे कि भूमि स्वामित्व पर अलग हदबन्दी, मुलुकी ऐन में मधेशी जात-जातियों के लिए अलग दण्ड-व्यवस्था आदि।

जि:
कहने का मतलब, जिस तरह से भारत में अंग्रेजों का औपनिवेशिक राज था, उसी तरह नेपालियों का औपनिवेशिक राज मधेश में है?

डॉ:
हाँ, पर तुलनात्मक रूप में, भारत में रहे अंग्रेजी औपनिवेशिक शासन से मधेश में रहे नेपाली औपनिवेशिक शासन ज्यादा
कठोर रहा है। जैसे कि—

  1. बाह्य सैन्य-शक्ति की उपस्थिति: अंग्रेजों के उपनिवेश में भारतीय सेना में बहुत ही कम प्रतिशत अंग्रेजी सैनिक थे, बाकी सैनिक भारतीय ही थे। जैसे सन् १८५७ के सिपाही विद्रोह के दौरान ९०% सैनिक भारतीय थे, केवल १०% अंग्रेज थे। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान लगभग केवल ३% सैनिक ही अंग्रेज थे, बाकी भारतीय ही थे।पर मधेश की भूमि पर पूर्णत: नेपाली सेना आकर बैठी हुई है, और उसमें मधेशियों की संख्या लगभग नगन्य है।
  2. प्रशासक और कर्मचारी: अंग्रेजों के शासनकाल में भारत में कितने प्रशासक और कर्मचारी अंग्रेज थे और कितने भारतीय थे? पर मधेश में बहुसंख्यक सरकारी प्रशासक और कर्मचारी नेपाली है, मधेशी नहीं।
  3. लगान और राजस्व: अंग्रेज भारत से लगान उठाते थे तो कुछ हद तक विकास भी करते थे और जनता के लिए उचित व्यवस्था और प्रणाली कायम करने के लिए भी तत्पर रहते थे। अंग्रेजों द्वारा संसार के सबसे बड़े रेलवे नेटवर्कों में से एक का भारत में निर्माण करने के कार्य को आज भी सराहा जाता है। दूसरी ओर, नेपाली शासक मधेश से भारी मात्रा में लगान और राजस्व वसूली करते हैं, यहाँ तक कि कुल ग्राहस्थ उत्पादन के ५९% और राजस्व के ७६% योगदान मधेश से मिलते हैं। पर उनमें से अधिकांश शासकवर्ग के लोग अपने क्षेत्र में लेकर चला जाता है और वह उनके स्वार्थ का परिपोषण करने पर खर्च होता है। वे मधेश में एक हुलाकी सड़क का निर्माण और मरम्मत करने तक पर ध्यान नहीं देते हैं, वहीं पहाड़ में फास्ट ट्रयाक सुरंग मार्ग और चार और छह लेन की सड़कें बनाते हैं।
  4. आप्रवासन और विस्थापन: सन् १९५१ से सन् २००१ बीच के ५० वर्ष के दौरान पहाड़ से आप्रवासित होकर मधेश में बसे पहाड़ियों की जनसंख्या ६% से बढ़कर ३३% हो गई, और भारी संख्या में मधेशी आदिवासी विस्थापित हुए। भारत में आकर बसे अंग्रेज भारत की जनसंख्या के कितने प्रतिशत थे, और कितने भारतीयों को विस्थापित किया गया?
  5. इतिहास और संस्कृति: अंग्रेजों के शासनकाल में भारतीय इतिहास, संस्कृति, भाषा और साहित्य पर व्यापक खोज हुई। पर नेपाली उपनिवेश काल में नेपाली भाषा, वेशभूषा और संस्कृति लादने के साथ-साथ मधेशियों का इतिहास, पुरातत्त्व, भाषा, साहित्य, संस्कृति, वेशभूषा आदि को मिटाने की नीति ली गई और मिटाने के कई प्रयत्न किए गए।
  6. साधन-स्रोत पर नियन्त्रण: नेपाली उपनिवेश में मधेश के जल, जमीन और जंगल पर मधेशियों को कितना अधिकार दिया गया है? नेपाल के शासकवर्ग मधेश के जंगल को कटवाकर बेच डाले, पर मधेशियों को अपने ही खेत का एक सुखे हुए वृक्ष काटने के लिए भी नेपाल सरकार से अनुमति लेनी पड़ती है; मधेशियों के द्वारा एक भार जलावन एक जगह से दूसरी जगह लाने पर नेपाल पुलिस उन्हें पकड़ती है। अपने ही खेत से उपजे चार-पाँच किलो दाल या सुपारी एक जगह से दूसरी जगह लाते वक्त नेपाली पुलिस मधेशियों को तस्कर कहके यातना देती है।
  7. दासता: नेपालियों ने लाखों मधेशियों की जमीन हड़पकर उन्हें अपनी ही जमीन पर भूमिहीन बनाकर कमैया, कमलरी और दास बना दिया। कई मधेशी सदा के लिए विस्थापित होकर शरणार्थी हो गए। जो रह गए वे नारकीय जीवन जीने के लिए मजबूर हो गए और नेपाली शासक के शारीरिक, मानसिक और यौन शोषण का शिकार बनते रहे।

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११. मुक्ति कैसे?

जि:
ठीक है, डाक्टर साहब। पर इस औपनिवेशिक शासन से मुक्ति कैसे मिलेगी? इसके भी तो अनेक मार्ग है, चुनाव लडूँ, हथियार उठा लूँ, सड़क आन्दोलन करूँ, क्या करूँ?

डॉ:
सबसे पहले हम जड़ तलाश करें और तब वहाँ तक पहुँचें। क्यों हो रहा है ऐसा, यह पता लगाएँ। अभी हम सब प्राय: क्या करते हैं कि कहते हैं यह हो गया, नेपालियों ने यह कर दिया, वह कर दिया, यहाँ विभेद कर दिया, इसमें हिस्सा नहीं दिया आदि। फिर हम एक मुद्दे को लेकर सड़क पर निकलते हैं, दूसरे मुद्दे को लेकर सर्वोच्च अदालत में जाते हैं, तीसरे मुद्दे को हम संसद और संविधान से समाधान करवाने के लिए संघर्ष करते हैं, पर फिर कुछ महीनों या वर्षों में हालत वैसी ही रह जाती है, या कहीं कुछ और मुद्दा निकल जाता है।

जैसे एक वृक्ष में एक ओर से काँटेवाली टहनी निकलती है, हम शोर करते है और उसे कटवा देते हैं। तब तक फिर दूसरी ओर से निकल जाती है, फिर उसको कटवाते हैं। फिर तीसरी ओर से निकलती है, और तब तक पुरानी टहनी फिर से पनप जाती है। हम कटवाते जाते हैं, पर वह सिलसिला रूकता नहीं, और कई बार हम तो देख नहीं पाते, कई बार हमें काटने की शक्ति नहीं रहती और हम काटों में जीने पर विवश हो जाते हैं, और कई बार हम लहु-लहुवान होकर भी काट नहीं पाते। सोचने वाली बात है कि जब वृक्ष बबूल का है, तो उससे काँटे वाली टहनी ही न निकलेंगे, उसमें आम थोड़े ही फलेंगे। अगर आपको आम खाना है तो उस जंगली बबूल को अपनी भूमि से सदा के लिए उखाड़कर फेंकना होगा, और वहाँ आम के पौधे लगाने होंगे।

जब तक हम जंगली बबूल के वृक्षों को, जो हमारे खेतों को पूरी तरह ढ़क चुके हैं, उन्हें जड़ से उखाड़कर उनकी जगह आम के पौधे नहीं लगा लेते, यह सारे समाधान बेकार है।

मधेशियों के मुद्दों को लेकर आज लोग अदालत जाते हैं, सड़क आन्दोलन करते हैं, सरकार में शामिल हो जाते हैं, नए संविधान बनाने की बात करते हैं, यह कोई भी बात औपनिवेशिक दासता से मुक्ति नहीं दिला सकती।

मुक्ति पाने के लिए नेपाली उपनिवेश को जड़ से ही उखाड़कर फेंकना होगा और वहाँ पर स्वतन्त्रता के पौधे लगाने होंगे।

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१२. स्वतन्त्र मधेश क्यों?

जि:
कहने का मतलब, आप पूर्ण आजादी और स्वराज की बात करते हैं। आखिर स्वतन्त्र मधेश ही क्यों?

डॉ:
पहले इसके केवल तीन मुख्य आधारभूत कारण देखें—

  1. पहली बात, अगर कोई भूमि उपनिवेश है या कहीं की जनता गुलाम है, तो स्वतन्त्रता उनका प्राकृतिक समाधान और हक है। चाहे लोग कितने सुसम्पन्न ही क्यों न हो, उन्हें सब कुछ मिला ही क्यों न हो, पर अगर कोई गुलाम है, तो आजाद होना हर हाल में उसका अधिकार है।
  2. दूसरी बात, कोई दूसरा समाधान मधेश में रहे नेपाली/पहाडी सेना को पूर्ण रूप से हटाकर उसकी जगह मधेशी सेना को नहीं रख सकता, और जब तक मधेश की भूमि पर नेपाली/पहाड़ी सेना रहेगी, मधेशियों की गुलामी का अन्त नहीं हो सकता। नियम, कानून, व्यवस्था, संविधान आदि बनते रहते हैं, उनकी कोई अहमियत नहीं जब तक अपनी सेना न हो। साम्राज्य की सेना लगाकर कभी भी नियम, कानून, संविधान और व्यवस्था को निलम्बन किया जा सकता है। इसलिए जब तक मधेश में मधेशी मातहत की मधेशी सेना नहीं, तब तक नियम, कानून, व्यवस्था, संविधान आदि कुछ भी अपना नहीं।
  3. तीसरी बात, कोई दूसरा समाधान मधेशियों को स्थायी रूप से अधिकार नहीं दिला सकता, उन मार्गों द्वारा अधिकार मिल जाने पर भी नेपाली शासक जब चाहे वह अधिकार हमसे छीन लेते हैं। जैसे कि ०६३–०६४ साल के मधेश आन्दोलन की उपलब्धि के रूप में तो स्वायत्त मधेश हासिल हो चुका था, मधेशियों को राज्य के हर अंग और निकाय में समानुपातिक समावेशी करने के लिए समझौता हो चुका था, पर जैसे ही हम कमजोर हुए, सारी चीजें नेपाली शासकों ने हमसे छीन ली। अरे, यहाँ तक हुआ है कि मधेशियों को दे दी गई नागरिकता भी दसों हजारों की संख्या में छीन ली गई है।

ऊपर दिए गए तीन कारण आधारभूत हैं जो साबित करते हैं कि हमें स्वतन्त्र मधेश ही चाहिए, आजादी ही चाहिए, उससे कम कुछ नहीं। उनके अलावा मधेशियों के प्रति जो विभेद और रंगभेद नेपाली राज में कायम है, मधेशियों का विस्थापन, जातीय सफाया और नस्ल संहार जो हो रहा है, मधेश में जो विकास का अभाव और गरीबी है, मधेश का जो आर्थिक दोहन किया जा रहा है, मधेश का जो नेपालीकरण करके मधेश की अपनी सारी चीजें मिटाई जा रही हैं आदि अनेकों कारण भी मौजूद हैं।

जि:
क्या नेपाल के संविधान में अधिकार सुनिश्चित करने से नहीं होगा?

डॉ:
संविधान उसका होता है, जिसके पास सेना होती है। जिसकी सेना नहीं, उसका क्या संविधान? सेना लगाकर कभी भी संविधान

को निलम्बन किया जा सकता है, और नेपाल में संविधान टिका है कितना?

अभी मर-मर के अधिकांश मधेशी लोग इस तरह से कर रहे हैं कि जैसे संविधान में एक बार लिखा देंगे, तो सारा काम खत्म! संविधान तो हर १०–१५ वर्ष में टूटा हैं यहाँ, पूरे परिवर्तन आए हैं, तो मधेशियों के मामले में कितने दिन टिकेगा संविधान? जैसे मधेशी ठंड पडेंगे, फिर पलट लेगा संविधान। देखा नहीं, स्वायत्त मधेश तो मधेश आन्दोलन के बाद समझौता में था, सेना में भी समानुपातिक प्रतिनिधित्व, पर कहाँ गए वे? कितने मधेशी सेना में भर्ती हुए? ३००० मधेशियों की भी भर्ती नहीं हो सकी।

और क्या अभी नेपाल के संविधान में मधेशियों को दूसरे दर्जा पर रखा गया है, क्या मधेशियों को नागरिकता नहीं देने के लिए कहा गया है? नहीं, तो फिर इतने मधेशी लोग अनागरिक क्यों हैं, मधेशी क्यों अपनी ही भूमि पर दूसरे दर्जे के नागरिक हो गए हैं? बताइए। खाली लिख देने से नहीं होता है न!

इस लिए ऐसे संविधान बनते रहेंगे, टूटते रहेंगे, जब तक मधेशियों के पास अपना देश, अपनी सेना और अपना संविधान नहीं होता, चाहे जितनी भी उपलब्धियाँ दिखा दें, सब मिथ्या हैं, क्षणिक हैं।

संविधान बस वृक्ष का एक फल है, जैसा वृक्ष वैसा ही फल। और यहाँ तो एक फल जो एक महीने में सड़ जाता है, उसे शासकों से पाने के लिए हम वर्षों संघर्ष करते हैं, और हाथ में आते-आते ही सड़ जाता है। हमें फल के लिए नहीं, अपना वृक्ष लगाने के लिए लगना चाहिए, जहाँ पर हरेक साल फल लगेगा। स्वराज कल्प-वृक्ष है और संविधान फल। अपना वृक्ष रहेगा तो फल तो खाते रहेंगे।

जि:
अगर संघीय-राज्य प्रणाली आ जाएगी तो सब कुछ ठीक नहीं हो जाएगा? तब हम अपने तरीके से राज्य चला सकते हैं।

डॉ:
ऐसा क्या चमत्कार हो जाएगा संघीयता के आने से?

  1. क्या संघीयता सम्पूर्ण मधेश को अखण्ड रखकर एक राज्य होने की गारन्टी करती है?
  2. क्या वह मधेशियों की जमीन पुन: नहीं छीने जाने की और नेपालियों/पहाड़ियों को मधेश में नहीं बसाए जाने की गारन्टी करती है?
  3. क्या वह मधेश के प्रशासक मधेशी होने की गारन्टी करती है? नहीं तो, बाद में भी नेपाली अधिकारियों द्वारा इसी तरह से कर्फ्यू लगाकर मधेशियों पर आक्रमण होता रहेगा और नेपाली शासक द्वारा इसी तरह से शोषण जारी ही रहेगा।
  4. क्या वह ऋतिक रोशन कांड और नेपालगंज घटना जैसे सुनियोजित जातीय सफाया के षड्यन्त्र कराके मधेशियों पर फिर लूटपाट और आक्रमण नहीं होने की गारन्टी करती है?
  5. क्या वह मधेश के काम-काज और नौकरियाँ मधेशी को ही मिलने की गारन्टी करती है? कि बाहर से नेपाली लोगों को बुलाकर दी जाएगी?
  6. क्या वह मधेश की सम्पूर्ण आय और दाता राष्ट्रों से प्राप्त अनुदानों का समुचित भाग मधेश में लगानी होने की गारन्टी करती है? कि मधेश को खाली विश्व बैंक और एडीबी का ऋण ढोना पड़ेगा?
  7. क्या वह देश भीतर और बाहर रहे मधेशियों की पहचान की समस्या को समाधान करेगी? क्या तब धोती, इंडियन और मर्सिया कहके नहीं बुलाया जाएगा?
  8. क्या वह मधेश के साधन-स्रोत, जल, जमीन और जंगल पर पूर्णत: मधेशियों का अधिकार होने की गारन्टी करती है?
  9. क्या वह मधेश की नागरिकता, सुरक्षा और वैदेशिक नीति मधेशियों के हाथों में होने की गारन्टी करती है?
  10. क्या वह मधेश से नेपाली सेना पूर्णत: हटाकर पूर्ण मधेशी सेना बनाने की गारन्टी करती है? नहीं तो कभी भी नेपाली सेना को परिचालन करके केन्द्रीय नेपाली सरकार कुछ भी कर सकती है, कोई संविधान भी लागू कर सकती है, कुछ भी नियम-कानून लगवा सकती है। केन्द्रीय सरकार आपातकालीन स्थिति की घोषणा करके मधेशियों के सम्पूर्ण अधिकार मिनट भर में ही निलम्बन कर सकती है। क्या इसे हम अपनी उपलब्धि मानें? क्या इसे हम सम्पूर्ण मधेशियों के बलिदान और संघर्ष का मोल माने?

तो ऊपर की १० आधारभूत और महत्त्वपूर्ण बातों में से कितनी बात संघीयता या आजादी के अलावा कोई अन्य राजनैतिक व्यवस्था दिला सकती है? बताइए।

क्यों गांधी और मंडेला ने आजादी के बदले विलायत के अधीन में रहते हुए संघीयता को स्वीकार नहीं किया? देखिए ऐसी बातें कुछ आइएनजीओ और संघ-संस्थाएँ पत्र-पत्रिकाओं में उठवा देती हैं, उसके लिए फंड रिलिज कर देती हैं, और उस पर लोग भागते रहते हैं, होटल और रिसोर्ट में लेक्चर देते फिरते हैं। पर मधेशियों के लिए वह वास्तविक समाधान नहीं है।

जि:
क्या देश का नाम बदलने से नहीं होगा?

डॉ:
क्या जहर की शीशी पर शर्बत का नाम लिखकर उसे सेवन करने से हम मरेंगे नहीं? आप ऊपर के ही १० सूत्रों को देखें कि क्या पूरा होगा, क्या नहीं।

जि:
ठीक है समझ गया। तो आप ही बताइए, आजाद होने पर क्या होगा?

डॉ:
मधेश आजाद होने पर हमारा अपना सार्वभौम देश होगा, हमें आजादी मिलेगी, हमें किसी देश के गुलाम या दूसरे दर्जे के नागरिक बनकर नहीं रहना पड़ेगा, हमारी अपनी पहचान होगी, अपना ऊँचा आत्मसम्मान होगा। मधेश में अपनी सेना और पुलिस होगी, अपना संविधान होगा, अपनी शासन-व्यवस्था और अपना प्रशासन होगा।

लगभग एक लाख मधेशियों को तो सेना में ही नौकरी मिलेगी, दूसरे एक लाख पुलिस में लगेंगे। प्रशासन में कई लाख मधेशियों को नौकरियाँ मिलेंगी।

हम अपनी समस्याओं का समाधान अपने हिसाब से कर पाएँगे। किसानों के लिए बीज, खाद, सिंचाई और राहत की व्यवस्था कर सकेंगे। मेहनत-मजदूरी की कमाई लूटकर पहाड़ नहीं जाएँगी। यही पर एक से एक अस्पताल, एक से एक कॉलेज, एक पर एक फैक्टरियाँ खुलेंगी; रोड, नहर और रेलवे बनेंगे।

विदेशी कोटा, छात्रवृत्ति, अनुदान सभी मधेश को मिलेंगे। मधेशियों के प्रति विभेद नहीं रह जाएगा। नेपाली पुलिस और प्रशासन के संरक्षण में नेपाली लोग मधेशियों पर आक्रमण करके उन्हें मिटाने की चेष्टा नहीं कर सकेंगे, जैसा कि नेपालगंज दंगे में हुआ था।

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१३. स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन

जि:
पर आजादी के लिए संघर्ष करने हेतु कोई प्लेटफॉर्म तो होना चाहिए, संघ-संगठन तो होना चाहिए?

डॉ:
हाँ, उसी के लिए हम सब ने ‘स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन’ बनाया है।

जि:
यह गठबन्धन क्या है?

डॉ:
स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन मधेश की आजादी चाहने वाले मधेशियों का संगठन है। इसका लक्ष्य बुद्ध, गांधी और मंडेला के अहिंसावादी सिद्धान्तों पर चलते हुए शान्तिपूर्ण मार्ग द्वारा मधेश में नेपाली उपनिवेश, रंगभेद और गुलामी का अन्त करके मधेश को आजाद करना है। गठबन्धन के ३ आधार स्तम्भ हैं: (क) स्वतन्त्र मधेश, (ख) लोकतान्त्रिक व्यवस्था, और (ग) शान्तिपूर्ण एवं अहिंसात्मक मार्ग।

जि:
इससे कौन जुड़ सकता है? मैं तो पहले से दूसरी पार्टी में हूँ, इसमें कैसे जुड़ूँ?

डॉ:
गठबन्धन पार्टी नहीं, एक संरचना है जिसमें व्यक्ति, पार्टी और संघ-संस्थाएँ जुड़ सकती हैं। यह नेपाल के चुनाव में भाग लेने वाली पार्टी या मोर्चा-बन्दी नहीं है, यह वोट माँगने के लिए नहीं है। हम नेपाली साम्राज्य की संरचना को नहीं मानते हैं, इसलिए नेपाल में कभी कोई पार्टी दर्ज नहीं की जाएगी।

जि:
गठबन्धन कैसी संरचना है?

डॉ:
गठबन्धन की संरचना का निर्माण इस तरह से किया गया है कि कल मधेश सरकार का गठन होने पर इसी संरचना को मधेश की प्रशासनिक संरचना बनाई जा सके। इसलिए इस संरचना में एक देश को चलाने के लिए जितने अंग, विभाग, निकाय और मोर्चा की आवश्यकता होती है, वे सब मौजूद हैं। यानि कि यह एक समानान्तर सरकार के रूप में मौजूद रहेगी। इसके सदस्य किसी भी वैधानिक पार्टी से जुड़े रह सकते हैं और अपनी जगहों से काम कर सकते हैं।

जि:
यह संरचना इतना विस्तृत क्यों है?

डॉ:
जैसा कि पहले कहा, मधेश आजाद होने के बाद गठबन्धन की इसी संरचना को मधेश की प्रशासनिक संरचना बनाने की कोशिश की जाएगी, इसलिए जो लोग अभी संरचना में मौजूद हैं, वही लोग कल मधेश सरकार का गठन होने पर उसके पदाधिकारी या कर्मचारी बनेंगे। जैसे कि गठबन्धन के ‘विभाग’ को ‘मन्त्रालय’ मे परिवर्तन किया जाएगा, और विभाग में मौजूद सारे कार्यकर्ता उस मन्त्रालय अन्तर्गत के कर्मचारी होंगे; ‘युवा मोर्चा’ को ‘प्रहरी’ आदि में परिवर्तन किया जा सकता है, और उसमें लगे लोग प्रहरी संरचना के कर्मचारी बनेंगे।

जि:
आपने कहा कि लोकतान्त्रिक व्यवस्था गठबन्धन का एक आधार स्तम्भ है। आखिर लोकतान्त्रिक व्यवस्था क्यों?

डॉ:
पहली बात तो यह है कि गठबन्धन का विश्वास है कि लोकतान्त्रिक व्यवस्था की ही स्थापना होनी चाहिए, जो विश्व भर में श्रेष्ठ मानी गई है। लेकिन व्यवहारिक तौर पर भी अन्तरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त करने के लिए पद्धति या व्यवस्था को लोकतान्त्रिक होना ही पड़ेगा। अगर हम अमेरिका, यूरोप या भारत से सहयोग की अपेक्षा करते हैं, या UN से सहयोग की अपेक्षा करते हैं, तो निश्चित रूप से हमारी पद्धति और व्यवस्था लोकतान्त्रिक होना आवश्यक है।

और लोकतान्त्रिक व्यवस्था का मतलब होता है जनता को चुनने का अधिकार देना, यानि जनता खुद चुनेगी कि उन्हें कौन सी राजनैतिक व्यवस्था चाहिए। और चुनने के लिए पहले आजाद होना जरूरी है, तभी ही पूँजीवाद, समाजवाद, साम्यवाद या कुछ और आता है। नहीं तो आप के लिए एक ही वाद है, गुलामी।

जि:
गठबन्धन क्यों? हम पहले एक पार्टी का गठन कर लेते, बाद में स्वतन्त्रता की आवाज उठाते, तो नहीं होता?

डॉ:
बबुल के पौधे लगाकर आप कहेंगे कि इसमें आम फलेगा, तो सम्भव है? अगर आपको आम खाना है, तो आम के ही बीज रोपने होंगे, आम के ही पौधे लगाने होंगे। आजादी चाहिए तो आपको आजादी के लिए ही संगठन बनाना होगा। तभी जाकर आजादी चाहने वाले लोग उसमें जुटेंगे, तभी आजादी आन्दोलन सशक्त होगा। अगर सत्तावादी पार्टी खोलेंगे, तो संसद, सत्ता और भत्ता के लिए ही न लोग उसमें आएँगे, और वैसे लोगों के आने पर प्रवृत्ति भी वही रहेगी। आप यह बात मौजूद संसदीय पार्टियों में भी देख ही सकते हैं।

इसलिए गठबन्धन ने शुरु से ही आजादी के लक्ष्य को स्पष्ट कर दिया है, ताकि किसी को धोखा न मिले, कोई गुमराह न हो, और सही आदमी ही इससे जुट पाएँ। क्योंकि स्पष्ट रूप से हमने कहा है कि यह नेपाल की व्यवस्था को नहीं मानता, यानि यह नेपाल के संसद और सरकार में भाग लेने के लिए नहीं है। यह मधेश की आजादी के लिए है। इसमें समझौता करके धोखा खाने की भी बात नहीं आती, क्योंकि जब आजादी मिलेगी तो सभी मधेशियों को मिलेगी, सभी को मालूम होगा, सभी को फायदा होगा।

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१४. बृहत योजना

जि:
गठबन्धन की योजना क्या है?

डॉ:
हम योजना को तीन चरण में बाँट सकते हैं: पहला तैयारी, दूसरा चढाई और तीसरा बचाव।

  1. तैयारी, स्वराज के लिए (Preparation):यह ८–१२ वर्ष तक चलेगी, इसमें मधेश देश को चलाने के लिए आवश्यक हर कुछ तैयार किया जाएगा, सांगठनिक संरचना बनाने से लेकर मानव-जनशक्ति और भौतिक पूर्वाधार तैयार करने तक सभी। इसमें प्रचार-प्रसार करके जागृति फैलाने से लेकर सांगठनिक संरचना और फ्रन्ट बनाना, विभिन्न कार्यों के लिए जनशक्ति तैयार करना, आय-स्रोत की व्यवस्था करना, अत्यावश्यक भौतिक संरचना बनाना (जैसे कि तत्काल संचार क्षेत्र में), अपनी प्रशासनिक संरचना बनाना, युवा दस्ता बनाना और बाद में सैन्य और प्रहरी संरचना खड़ी करना, राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्ध बनाना, विभिन्न अन्तरराष्ट्रीय संघ-संस्थाओं या नियोगों से समर्थन हासिल करना, विभिन्न देशों के संसद में ककस बनाना, विदेशी कूटनीतिज्ञों का समर्थन हासिल करना, UN से सम्बन्ध बनाते हुए उनके कार्यक्रमों में हिस्सा लेना आदि जैसे कार्य आते हैं।
  2. चढाई अर्थात् साम्राज्य को अन्त करने और स्वराज को स्थापित करने के लिए आन्दोलन (Aggression):जब हम सांगठनिक रूप में अच्छी तरह सक्षम और तैयार हो जाएँगे, तबअसहयोग आन्दोलन से लेकर अहिंसात्मक विद्रोह और नाकाबन्दी का सहारा लेते हुए मधेश में नेपाली साम्राज्य को अन्त करके स्वराज की स्थापना करने के लिए लगेंगे। इसमें असहयोग आन्दोलन, सत्याग्रह, सिपाही विद्रोह, सैनिक विद्रोह, एलन्स्की के तरीके, नेपाल सरकार को राजस्व/कर देने से अस्वीकार करना, कर रहित आयात (खाद, बीज, चीनी, कपड़ा आदि जैसे दैनिक खपत के सामान; बाद में मोटरसाइकल, मेशिन, गाड़ी आदि भी), धार्मिक एवम् नैतिक क्रान्ति, सड़क आन्दोलन, सीमाना बन्द, अत्यावश्यक वस्तुओं की नाकाबन्दी आदि जैसे तरीके आते हैं।
  3. बचाव, अर्थात् स्वतन्त्र मधेश को मान्यता दिलाना और उसे रक्षा करना (Defense and Sustainment): इस अन्तिम चरण में मधेश को अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना, कूटनैतिक सम्बन्ध स्थापित करना, द्विपक्षीय एवम् बहुपक्षीय समझौता करना, राजदूतावास या मिशन ऑफिस खोलना/खुलवाना और मधेश को UN मे दर्ता करवाना आदि जैसी चीजें शामिल हैं।

जि:
तैयारी में सबसे पहले क्या करना है?

डॉ:
सबसे पहली बात है जागृति या जनचेतना अर्थात् संजीवन। आपको पहले गाँव-गाँव, टोल-टोल, घर-घर में जाकर लोगों को मधेश के इतिहास, वर्तमान दुर्दशा, औपनिवेशिक शोषण और मुक्ति के मार्ग के विषय में चेतना फैलानी होगी। किसान, महिला, मजदूर, विद्यार्थी, शिक्षक, युवा और बेरोजगार से लेकर डाक्टर, इन्जिनियर और प्रोफेसर सभी को समझाना होगा।

उसके बाद सभी को अपनी जगहों पर संगठित करना होगा। जरूरी नहीं है कि सारे लोग एक ही बैनर के नीचे आ जाएँ, आप स्वतन्त्र रूप से अपने इलाकों में, अपने व्यवसायिक क्षेत्रों में संगठन बना सकते हैं। विद्यार्थी हैं तो विद्यार्थी संगठन, किसान हैं किसान संगठन, आप्रवासी हैं तो आप्रवासी संगठन, अपने जिले में, अपने गाँव में, किसी शहर में, कहीं भी। बस संगठित होना आवश्यक है। आप अपने संगठन का कोई भी नाम दे सकते हैं, कोई भी बैनर के तले रख सकते हैं, बस अन्तिम मकसद ध्यान में रहे और कार्य मधेश के हित में करें। ऐसे छोटे-छोटे संगठन हर जगह बनना चाहिए।

उसके बाद संवर्धन का चरण आता है, यानि संगठन को पालन-पोषण करते हुए उसे विस्तार करने का चरण। उसमें विचार-प्रचार, विस्तार, विकास, विप्‍लव-तैयारी और विशेष-सम्बन्ध करके मुख्य रूप में पाँच बातें आती हैं। यानि आप पहले विचार का प्रचार-प्रसार करें कि मधेश की स्थिति क्या है, उपनिवेश क्या है, आजादी क्यों चाहिए। उसके साथ संगठन का विस्तार करते रहिए ताकि ज्यादा सदस्य हों, ज्यादा जगहों पर संगठन की उपस्थिति हो, ज्यादा योग्य व्यक्ति संगठन में लगें। उसी तरह विकास किजिए, जनशक्ति और पूर्वाधार का।महाआन्दोलन और स्वतन्त्र मधेश के लिए आवश्यक जनशक्ति तैयार करें, तालिम दें, साथ-साथ अत्यावश्यक भौतिक पूर्वाधार का भी विकास करें, जैसे न्यूजपेपर और एफएम जैसे संचार माध्यम, उद्धार टोली आदि। उसके बाद, विप्लव तैयारी, यानि महाआन्दोलन जो होगा उसके लिए आवश्यक तैयारी किजिए, साधन-स्रोत की व्यवस्था के साथ-साथ कार्यकर्ताओं को आवश्यक तालिम आदि की व्यवस्था। साथ-साथ, राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिज्ञ, मानवअधिकारकर्मी, राजनैतिक पार्टी, गैर-सरकारी संस्था आदि से विशेष सम्बन्ध स्थापित करें।

जि:
कितना समय तैयारी करना होगा?

डॉ:
८–१२ वर्ष तक खाली तैयार होना है, संरचना बनानी है, जनशक्ति का निर्माण करना है, यानी सामाजिक-आर्थिक विकास का काम करना है। देश चलाने के लिए पूरी तरह तैयार होने के बाद ही हम स्वतन्त्र मधेश की माँग को लेकर आन्दोलन करना शुरु करेंगे, और वह भी शान्तिपूर्ण होगा।

जि:
यानि इतनी तैयारी के बाद ही हम महाआन्दोलन में जा सकते हैं?

डॉ:
हाँ, तभी ही हम संघर्ष के चरण यानि महाआन्दोलन में जा सकते हैं। उस महाआन्दोलन का लक्ष्य मधेश में नेपाली साम्राज्य की समाप्ति और मधेश से नेपाली सेना की वापसी के साथ-साथ अपनी सेना और पुलिस सहित मधेश में स्वराज की स्थापना करना होगा।

और महाआन्दोलन के बाद संरक्षण या समाप्ति का चरण आता है। मधेश में सरकार गठन करने के बाद मधेश को UN में दर्ज कराना, विश्व के अन्य देशों से कूटनैतिक सम्बन्ध कायम करना, उनके राजदूतावास मधेश में खुलवाना आदि जैसी बातें उस चरण में होंगी।

जि:
आपने जो समय कहा महाआन्दोलन तक जाने का, ८–१२ वर्ष, क्या वह लम्बी अवधि नहीं है?

डॉ:
मधेश की स्वतन्त्रता चाहने वाले अक्सर लोग मधेश को तुरन्त स्वतन्त्र घोषणा करवाना चाहते हैं। अगर ऐसा हो भी जाता है, तो यह हानिकारक ही होगा, क्योंकि हम स्वतन्त्र मधेश को ज्यादा दिन रख नहीं पाएँगे, उसके लिए हमारे पास न तो जनशक्ति तैयार है न तो अन्य पूर्वाधार ही मौजूद है। प्रमाण के लिए मधेश आन्दोलन को ले सकते हैं; आन्दोलन के द्वारा बहुत कुछ प्राप्त होते हुए भी हम कुछ रख नहीं पाए, न तो स्वायत्त मधेश, न तो एक मधेश एक प्रदेश, न ही सेना में भर्ती न ही अन्य अधिकार। क्योंकि हम तैयार नहीं थे, ये जानकर शासकवर्ग धीरे-धीरे दी हुई सारी चीजें भी हमसे छीनकर ले गए। इसलिए यह जरूरी है कि पहले हम स्वतन्त्र मधेश के लिए आवश्यक जनशक्ति और पूर्वाधार तैयार करें, न कि पहला होने के लिए या क्रेडिट लेने के लिए बस मधेश को स्वतन्त्र घोषणा कर दें, करा दें।

और जरा सोचिए, सन् २००६ मे गणतन्त्र आन्दोलन हुआ और पिछले ८ वर्षों में नेपाल में एक संविधान तक नहीं बन पाया है और देश जहाँ खड़ा था वहीं पर खड़ा है, तो स्वतन्त्र देश स्थापना करने की तैयारी के लिए ८–१२ वर्ष की अवधि लम्बी कैसे है? दूसरी जगहों पर भी देखेंगे तो स्वतन्त्रता आन्दोलन बहुत लम्बे काल तक चलने की बात मालूम होती है। भारत में ही देखिए। सिपाही विद्रोह होने के ९० साल बाद भारत आजाद हुआ, गांधी के आने के बाद भी ३२–३३ साल लगा। उसकी तुलना में हम सब तो बहुत कम समय की बात कर रहे हैं। और यह कम इसलिए है कि नेपाली साम्राज्य अपने आप में सशक्त नहीं है, न तो आर्थिक रूप से, न तो सामरिक रूप से, और आज के विश्व की परिस्थितियाँ बदल गई हैं और हमारे मुद्दों में रंगभेद, उपनिवेश और मानवाधिकार का हनन जैसे पहलू भी शामिल है जिसे खत्म करने के लिए पूरे विश्व लगेंगे, यह विश्व का नैतिक दायित्व भी बन गया है।

जि:
पर अगर ८–१२ वर्ष के बाद ही करना है, तो लोग अभी क्यों लगेंगे? वे कुछ और करेंगे।

डॉ:
बात यह है कि ८–१२ वर्ष सक्रिय रूप से तैयार करने की अवधि है, यानि कि अभी से सक्रिय रूप से लगे और ८–१२ वर्ष तक में तैयार हुए तब जाकर स्वतन्त्रता के योग्य होंगे, ८–१२ वर्ष हाथ पर हाथ धर के बैठे रहने से हम अपने आप तैयार नहीं हो जाएँगे।

यहाँ मैं एक उदाहरण देना चाहता हूँ। अगर आपकी माता बहुत बीमार हैं, तुरन्त सर्जरी की जरूरत हो गई, तो आप कहेंगे कि मुझे बहुत जरूरी है, अभी के अभी डाक्टर बन जाऊँगा, तो सम्भव है? और आपने अगर हाथ में सर्जरी की छुरी उठा भी ली तो आप ठीक के बदले गलत ही करेंगे न? इसलिए अगर आपको डाक्टर बनना है तो अभी जरूरत होने से ही या अभी बहुत छटपटाने से नहीं होगा, उसमें ५ वर्ष लगेंगे ही। और ५ वर्ष बैठे-बैठे रहने से भी नहीं होगा, उसके लिए पहले मेडिकल कॉलेज में भर्ती होना पड़ेगा, अध्ययन करना पड़ेगा, सीखना पड़ेगा, कई परीक्षाएँ देनी पड़ेंगी, और तब ५–६ वर्ष बाद जाकर आप डाक्टर बनेंगे और सर्जरी करने के काबिल हो पाएँगे। वही बात यहाँ समाज और देश के मामले में भी लागू होता है। मोटरसाइकिल चलाने के लिए भी हम १० दिन की ट्रेनिंग लेते हैं, एक सिलाई-मेशिन चलाने के लिए भी ३ महीने की ट्रेनिंग लेते हैं, हवाई-जहाज चलाने के लिए भी २–३ वर्ष की ट्रेनिंग लेते हैं, तो देश चलाने के लिए कुछ नहीं सिखना पड़ेगा? मोटरसाइकिल के पीछे तो फिर भी एक-दो आदमी बैठते हैं, हवाई-जहाज में १००–२०० आदमी बैठते हैं, पर जब आप देश चलाने जाते हैं तो वहाँ पर तो आपकी जिम्मेवारी में करोड़ों नागरिक होते हैं! उनकी जिम्मेवारी लेने के लिए क्या हमें सावधान होकर, मेहनत करके देश चलाने के लिए सीखना नहीं चाहिए?

जि:
बात समझ में आई। पर इतने दिन तक लोगों को लगाए कैसे रखें? लोग तो यहाँ महीने में तीन बार पार्टी बदलते हैं, उनका मकसद बदलता है, ऐसे में वे एक चित्त होकर कैसे मधेश की आजादी के लिए लगे रहेंगे?

डॉ:
जिस तरह से डॉक्टरी की पढ़ाई में पहले छोटे-छोटे मेढक का चीरफार करना सिखाया जाता है, और फिर एक-एक करके आगे की बात बतलाया जाता है, उसी तरह हमें भी जरूरी है कि हम उस आजादी के लक्ष्य को छोटे-छोटे कार्यों या मुद्दों का सहारा दें। इससे हमारे लक्ष्य और अभियान निरन्तर जीवन्त और ऊर्जाशील रहेंगे, कार्यकर्ता आन्दोलन से जुटे रहेंगे, और सामाजिक परिवर्तन भी आता रहेगा। जैसे कि हम भ्रष्टाचार नियन्त्रण, सामाजिक कुरीति पर बन्धन (जैसे दहेज प्रथा उन्मूलन, शराब/जुआ आदि बन्द करवाना), भूमिहीन आन्दोलन, मधेशी प्रतिकूल विधेयकों का विरोध (जैसे विशेष ‘सुरक्षा’ नीति का विरोध), प्रहरी और प्रशासनिक ज़्यादती का विरोध आदि जैसे आन्दोलन करते रहें। उन आन्दोलन में हम ऐसे मुद्दों का चयन करें जिससे हमारे लक्ष्य का सम्बन्ध हो। पर याद रहे, हमारा आन्दोलन सदैव शान्तिपूर्ण और अहिंसात्मक हो।

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भाग ३: मार्ग

१५. शान्तिपूर्ण मार्ग क्यों?

जि:
हमने ये तो समझ लिया कि हमें आजादी ही चाहिए, स्वतन्त्र मधेश ही चाहिए। पर उसे हासिल करने शान्तिपूर्ण मार्ग क्यों?

डॉ:
शान्तिपूर्ण और अहिंसात्मक मार्ग द्वारा बहुत सारे देशों को स्वतन्त्रता मिली है, भारत और दक्षिण अफ्रिका जैसे उदाहरण हमारे सामने है। आधुनिक समय में जहाँ पर आजादी के लिए सशस्त्र युद्ध भी हुआ, वहाँ भी शायद ही कभी विद्रोहियों को पूर्ण विजय मिली, और वहाँ पर भी अन्तत: शान्तिपूर्ण मार्ग द्वारा ही समस्या का समाधान किया गया, अन्त में टेबल पर से या जनमत संग्रह से ही बात को सुलझाया गया। और सन् २००१ के ९/११ की घटना के बाद तो विश्व का रूख ही पलट गया है, और आज के विश्व में सशस्त्र मार्ग द्वारा ज्यादा देर तक टिका ही नहीं जा सकता, विजय पाना तो दूर की बात है। इसके लिए आप श्रीलंका के तमिल टाइगर्स जैसे पहुँची हुई बहुत ही शक्तिशाली विद्रोही शक्तियों का उदाहरण ले सकते हैं। और आज सशस्त्र युद्ध द्वारा विजय पा भी लें तो विश्व की शक्तियाँ मिलकर उसे परास्त करने मे लग जाएँगी। इसलिए आज के दिन में शान्तिपूर्ण और अहिंसात्मक मार्ग ही सब से उत्तम और सफलता देने वाला मार्ग है। इस राह पर अन्तरराष्ट्रीय समर्थन भी आसानी से प्राप्त किया जा सकता है और इसके द्वारा विजय निश्चित है।

दूसरी बात, सशस्त्र आन्दोलन से मधेश का भला नहीं हो सकता, थोड़ी सी हुई सशस्त्र गतिविधियों का नतीजा आप देख सकते हैं। सरकार को बहाना मिल जाता है, मधेशियों पर ज़ुल्म करने के लिए, ‘सुरक्षा’ के नाम पर एक पर एक विधेयक और ‘सुरक्षा योजना’ लाने के लिए, मधेश में हजारों सशस्त्र प्रहरी तैनात करने के लिए, दर्जनों सशस्त्र प्रहरी और सैनिक कैम्प खोलने के लिए, मधेशियों पर अत्याचार करने के लिए। सशस्त्र संघर्ष की राह अफ्रिका में हुए हिंसात्मक संघर्ष, और गरीबी तथा हिंसा से भरे समाज, की ओर ले जाती है, जो मधेश के हित में कदापि नहीं है।

उसके अलावा, सशस्त्र आन्दोलन के लिए भले ही कुछ जुनून भरे लोग आ जाएँ, पर बहुसंख्यक मधेशी जनता इसके लिए आगे आना नहीं चाहेगी। इसलिए अधिक से अधिक समर्थन पाने के लिए भी हमें सशस्त्र आन्दोलन से दूर रहना होगा।

जि:
शान्तिपूर्ण मार्ग में किस तरह के आन्दोलन आते हैं?

डॉ:
अहिंसात्मक असहयोग आन्दोलन और सत्याग्रह जैसे कार्य शान्तिपूर्ण मार्ग में पड़ते हैं।

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१६. असहयोग आन्दोलन

जि:
यह सत्याग्रह और असहयोग आन्दोलन क्या है?

डॉ:
सत्य का पालन और रक्षा करने के लिए किया जाने वाला आग्रह या हठ ही सत्याग्रह है।

आप मुझे बताएँ, अगर नेपाल सरकार ने कानून लाया कि हरेक नेपाली नागरिक काले आदमियों के ५०० बच्चों को मारे और वह क़ानूनन अपराध नहीं होगा तो क्या आप उस कानून को मानेंगे?

जि:
नहीं।

डॉ:
नहीं मानेंगे तो आप गैर-कानूनी काम कर रहे हैं, आपको सजा भी हो सकती है।

जि:
चाहे मुझे सजा हो जाए, ऐसा मैं नहीं कर सकता।

डॉ:
क्यों नहीं?

जि:
मैं क्यों निर्दोष लोगों की हत्या करूँ, यह पाप है। यह भगवान के आदेश के खिलाफ है। यह प्रकृति के खिलाफ है। यह समाज के खिलाफ है। मेरी अन्तरात्मा ऐसा करने नहीं देगी।

डॉ:
सही कहा आपने। देश के कानून से ऊपर भी कोई न्याय-अन्याय का नियम है, हमारी अन्तरात्मा का आदेश है। किसी देश के कानून मानने से पहले हम वह न्याय-अन्याय देखेंगे, जो हर-जगह लागू होता है, जिससे हमारी नैतिकता, हमारी अन्तरात्मा भी मंजूर होता है, जो सत्य है। लोगों को उसी नियम का पालन करना चाहिए जो सत्य और न्याय-संगत हो; जो नियम और कानून न्याय-संगत नहीं, उसे हम पालन नहीं करेंगे और उसे पालन करावाने की भी हम जिम्मेवारी नहीं लेंगे। उसी सत्य और न्याय-संगत चीजों को पालन करवाने का आग्रह ही सत्याग्रह है, और जो सत्य और न्यायपूर्ण नहीं है उसे पालन न करना और न करवाना ही असहयोग आन्दोलन है।

जि:
कुछ हमारे उदाहरण?

डॉ:
नेपाल सरकार ने हमें सरकारी कार्यालयों में मातृभाषा प्रयोग करने पर कई बार रोक लगाई। और हम जानते हैं कि अपनी मातृभाषा का विकास, संरक्षण और संवर्धन करना हर आदमी का कर्त्तव्य और अधिकार भी है। इसलिए नेपाल सरकार के उस आदेश को न मानना और उसका उल्लंघन करना असहयोग आन्दोलन है। अगर नेपाल सरकार मधेशियों पर नेपाली टोपी और वेशभूषा लगाने का नियम लादती है, तो उसे उल्लंघन करना असहयोग आन्दोलन है। मधेश में नेपाल सरकार अगर ज़बरदस्ती कोई अनुचित कर लगा देती है, तो उसे न देना असहयोग आन्दोलन है।

जि:
असहयोग आन्दोलन किस-किस तरह के होते हैं?

डॉ:
असहयोग आन्दोलन कई प्रकार के हो सकते हैं। जैसे सरकार के कोई अनैतिक नियम के विरूद्ध, सरकार के असमान और अन्यायपूर्ण नियम के विरूद्ध, और सरकार के कोई खतरनाक नियम के विरूद्ध।

जि:
क्या असहयोग आन्दोलन सदैव अहिंसात्मक होते हैं?

डॉ:
असहयोग आन्दोलन कई रूप ले सकते हैं। यह हिंसात्मक और अहिंसात्मक दोनों हो सकते हैं। और यह कानूनी दायरे में रहते हुए भी किया जा सकता है।

जि:
कानूनी दायरे में रहते हुए?

डॉ:
हाँ। जैसे कि नेपाल सरकार ने वोटर लिस्ट में नाम लिखाने के लिए नागरिकता दिखाना अनिवार्य किया। यह सरासर मधेशियों पर लक्षित था और उनके लिए अन्यायपूर्ण था। इसे रोकने के लिए कोई भी मधेशी वोटर लिस्ट में नाम लिखाने जाते ही नहीं, सरकारी कर्मचारी घर में आने पर भी उससे अपना नाम दर्ज नहीं करवाते। नाम दर्ज नहीं करवाना गैर-कानूनी तो नहीं है। इस तरह से नेपाल सरकार को असहयोग करके कानून के भीतर रहते हुए भी विरोध किया जा सकता था। अगर अधिकांश मधेशी इस तरह से विरोध करते तो क्या सरकार मधेशियों के बिना ही चुनाव करा लेते? और करा भी लेते तो ऐसे निर्वाचन का क्या अर्थ होता?

जि:
असहयोग आन्दोलन में कुछ खास नियम भी आते हैं?

डॉ:
अलग-अलग समय में अलग-अलग व्यक्तियों ने अपने हिसाब से असहयोग आन्दोलन के लिए कुछ मान्यताएँ रखी हैं। जैसे गांधी और मार्टिन लुथर किंग ने अपने कार्यकर्ताओं के लिए कुछ निर्देश दिए थे।

जि:
गांधीजी का क्या निर्देश था?

डॉ:
क्रोध नहीं करना, प्रतिशोध नहीं लेना, विरोधियों या सरकार की कार्रवाई पर आत्मसमर्पण करना (जैसे कि सरकार के द्वारा गिरफ्तार किए जाने पर गिरफ्तार होना), सरकार द्वारा व्यक्तिगत सम्पत्ति ज़ब्त करने पर करने देना, गाली-गलौज और अनादर से परहेज करना, साम्राज्य के झंडे को सलामी नहीं देना, सरकारी कर्मचारी और पुलिस को भी आक्रमण और अनादार से बचाना आदि थे।

जि:
मार्टिन लुथर किंग का क्या था?

डॉ:
उनका भी ऐसा ही मिलता जुलता था। उनका भी विश्वास था कि असहयोग आन्दोलन में लगी जनता अपने विपक्षियों को पराजित करने या अपमान करने नहीं, बल्कि उनकी दोस्ती और समझदारी जीतने के लिए प्रयत्नशील रहे। ऐसे लोग विपक्षियों को समाप्त या बर्बाद करने की नहीं, बल्कि अन्याय और अत्याचार को खत्म करने की बात सोचते हैं। असहयोग आन्दोलन को दूसरों पर आक्रमण करने के बदले कष्ट झेलने की बात के रूप में वे मानते थे।

जि:
हमारे सन्दर्भ में असहयोग आन्दोलन के कुछ सम्भावित रूप?

डॉ:
असहयोग आन्दोलन अनेकों रूप ले सकते हैं, आप दैनिक रूप में खबर लेते रहिए, हर जगह आपको नई-नई तरकीब नजर आती रहेगी। थोड़ा रचनात्मक होने की भी जरूरत है।

  • शांतिपूर्ण नाकाबंदी: जैसे नेपाल सरकार मधेशियों के द्वारा सीमा पार से कुछ लाने पर उन्हें परेशान करती है, वहीं दूसरी ओर शासकवर्ग की आवश्यक वस्तुएँ आने देती है। इसका विरोध करने के लिए बार्डर नाका पर शांतिपूर्ण धरना दिया जा सकता है।
  • किसी जगह अपने अधीन में रखना या घेरना: जैसा कि भूमिहीनों को भूमि न दिए जाने पर सरकारी जमीन पर बसना, सरकारी कार्यालयों में बस जाना।
  • सरकार द्वारा निषेधित पर सत्य विषयों पर भाषण देना, लिखना, किताब छपवाना, पर्चा बाँटना, कोणसभा और आमसभा करना: जैसे कि २०४६ साल से पूर्व राजनैतिक पार्टियों पर प्रतिबन्ध था, उस समय में राजनैतिक पार्टियों द्वारा आमसभा करना आदि ऐसे विरोध अन्तर्गत आते हैं। अभी मधेश आजादी के लिए भाषण देना, आमसभा करना, किताब लिखना और पर्चे बाँटना, इसी तरह के आन्दोलन हैं।
  • सरकार द्वारा निषेधित पर सत्य और न्याय द्वारा समर्थित चीजों को रखना। जैसे गांधी द्वारा लिखित कई किताबों पर बैन लगा दिया गया था, इसलिए असहयोग आन्दोलन के रूप में उन किताबों को व्यापक रूप में बाँटा गया, अंग्रेजी हुक़ूमत के विरोध स्वरूप और गिरफ्तारी की अपेक्षा करते हुए।
  • उसके अलावा गैर-कानूनी बहिष्कार, राजस्व या लगान देने से बहिष्कार, सरकारी कार्यालय चलाने और काम कार्रवाई के लिए मुश्किलें खड़ा करने लगायत की गतिविधियाँ भी इसमें शामिल है।
  • उसी तरह इलेक्ट्रॉनिक रूप में सरकारी वेबसाइट को बिगाड़ना, उस पर कुछ और जानकारी रख देना, सरकारी वेबसाइट चलने के लिए कठिन बना देना आदि भी इसमें आते हैं।

जि:
तो क्या, हम यहीं बैठकर नेपाल सरकार को टैक्स नहीं दें, तो असहयोग आन्दोलन हो जाएगा?

डॉ:
याद रहे, कानून को तोड़ना तभी ही असहयोग आन्दोलन कहलाया जा सकता है जब वह खुले आम किया जाता है और खुले रूप में उसकी घोषणा की जाती है। अगर टैक्स नहीं देना है, तो उसकी घोषणा पहले कर दें, कारण सार्वजनिक करें, और कार्रवाई होने पर उसे भुगतने के लिए भी तैयार रहें।

जि:
कानून तोड़ने पर सरकार गिरफ्तार करे तो?

डॉ:
बहुत सारे मामलों में आन्दोलनकारियों को गिरफ्तार किए जाएंगे, आन्दोलनकारियों पर सरकार की तरफ से आक्रमण या दमन भी हो सकता है। आन्दोलनकारियों को गिरफ्तारी देनी चाहिए। हाँ, मुद्दे की दलील में आप बचाव भी कर सकते हैं, सजा के लिए तैयार भी हो सकते है। गांधी ने अपने विश्वास के लिए कानून के अनुसार कड़ी से कड़ी सजा की माँग की थी। इसलिए उन सब चीजों के लिए आपको तैयार होना जरूरी है।

जि:
असहयोग आन्दोलन शुरु करने से पहले क्या-क्या तैयारियाँ करनी होंगी?

डॉ:
असहयोग आन्दोलन शुरु करने से पहले हमें अपनी रणनीति तैयार करने के साथ-साथ कुछ तालिम लेना चाहिए। इससे आन्दोलन क्यों कर रहे हैं, आन्दोलन के क्रम में क्या-क्या हो सकता है, और उससे आप कैसे सामना करेंगे, यह सारी बातों से आप चिर-परिचित हो जाएँगे। इससे भविष्य में आपको उन परिस्थितियों का सामना करने में आसानी होगी। आन्दोलनकारियों की सूची भी बना सकते हैं, उसमें सम्पर्क मोबाइल या फोन नम्बर, घर का पता तथा उनके घर के सम्पर्क आदमी का मोबाइल नम्बर आदि मौजूद रहना चाहिए।

उसी तरह पत्रकार, मानवअधिकारकर्मी और अपने वकील की टोली को पहले ही खबर कर देना चाहिए। उसके साथ-साथ कैमरा आदि भी तैयार रखना चाहिए, उस काम के लिए एक ही नहीं बल्कि ज्यादा आदमियों को अलग-अलग जगहों पर रखना चाहिए।

एफएम और समाचार गृह के रिपोर्टरों से सम्पर्क में रहना चाहिए, और घटना के क्रम के साथ उन्हें जानकारी देते रहना चाहिए। प्रेस विज्ञप्ति निकालने या प्रेस कन्फेरेन्स करने के लिए तैयार रहना चाहिए।

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१७. अहिंसात्मक आन्दोलन

जि:
यह अहिंसात्मक आन्दोलन क्या है?

डॉ:
वह आन्दोलन, जिसमें आन्दोलन करने वालों द्वारा हिंसा नहीं किया जाता। हिंसा के बिना किए गए संविधान, झंडा या पुतला दहन जैसे संकेतात्मक विरोध, सत्याग्रह, असहयोग आन्दोलन या दूसरे सामाजिक या राजनैतिक आन्दोलन अहिंसात्मक आन्दोलन हैं।

जि:
कैसी-कैसी गतिविधियाँ आती हैं इसमें?

डॉ:
धरना देना, प्रचारबाजी करना, सत्याग्रह करना, विरोध नृत्य, गीत, संगीत, लेख, किताब आदि निकालना, जागरण सभा करना, जागृति अभियान चलाना, लाबिंग करना, सरकार को मालपोत आदि कर न देना, कार्यक्रम बहिष्कार करना, नाकाबंदी करना, कानूनी या कूटनैतिक कार्रवाई करना, सभा-समारोह, उत्सव या पुरस्कार बहिष्कार करना, बन्द-हड़ताल करना आदि आते हैं।

जि:
क्या अहिंसात्मक आन्दोलन में दम है?

डॉ:
आप जोश में आकर कह सकते हैं कि अहिंसात्मक आन्दोलन में कोई दम नहीं है। पर मैं इस पर जोड़ देना चाहता हूँ कि पहले के दिनों से आज अहिंसात्मक मार्ग कहीं ज्यादा सान्दर्भिक और ताकतवर है। इसके दो पहलू हैं।

पहला कि आज एक-एक आदमी इतना ताकतवर हो गया है, उनके हाथों में इतनी विध्वंसात्मक शक्ति आ गई है कि एक आदमी भी सुपरपावर को बिना हथियार के ही मात दे सकता है और बहुत ही बड़ी क्षति पहुँचा सकता है। इसलिए आज सरकार किसी एक समुदाय को अनदेखा करके, किसी समुदाय को दबाके, किसी समुदाय पर अन्याय करके नहीं चल सकती। उसे हरेक की न्यायोचित्त माँगों को सुनना ही पड़ता है। उसके लिए बम और बारूद की ही जरूरत नहीं होती। सरकार हिंसा का इन्तजार नहीं कर सकती, क्योंकि अगर करती है तो भारी क्षति का सामना करना पड़ता है।

दूसरी ओर खास करके सन् २००१ के बाद आज विश्व की सरकारें इस तरह से हिंसात्मक गतिविधियों पर आक्रामक तरीकों से पेश आ रही हैं कि वे कारण नहीं देखतीं। और सारी सरकारें इस मामले में एकजुट हो गई हैं। कहीं कहीं इसमें अगर कोई असहमति दिखती है, तो वह केवल किसी एक खास देश से जुड़े स्वार्थ के कारण। इस कारण से आज के दिनों में हिंसा द्वारा प्राप्त कोई विजय तनिक भी टिक नहीं सकती।

जि:
आप एक तरफ कह रहे हैं कि आदमी बहुत ताकतवर हो गया है, तो फिर वह विजय क्यों हासिल नहीं कर सकता? आपका विचार विरोधपूर्ण नहीं है?

डॉ:
कहने का मतलब, आदमी ताकतवर तो हो गया है कि वह सुपरपावर को भी व्यापक क्षति पहुँचा सकता है और सम्भवत: क्षणिक विजय भी हासिल कर सकता है, पर इतना ताकतवर नहीं कि हिंसा द्वारा प्राप्त विजय को वह ज्यादा दिन रख सके, क्योंकि आज विश्व हिंसा और आतंकवाद के खिलाफ एकजुट और आक्रामक है, सारी सरकारें मिलकर हिंसा द्वारा प्राप्त विजय को निष्फल कर ही देंगी। इसलिए शान्तिपूर्ण मार्ग ही आज सफलता तक पहुँचा सकता है, उसी के द्वारा विश्व का समर्थन और सम्मान भी पाया जा सकता है।

जि:
कहाँ पर अहिंसात्मक आन्दोलन ने अपनी भूमिका निभाई है?

डॉ:
आपको दूर जाने की जरूरत नहीं है, भारत हमारे लिए सबसे बड़ा उदाहरण है। उसी तरह, मंडेला का उदाहरण भी हमारे सामने है। कहें तो सन् १९६६ से १९९९ तक में अहिंसात्मक नागरिक आन्दोलनों ने निरंकुश शासन को हटाने की ६७ घटनाओं में से ५० में मुख्य भूमिका निभाई है।

जि:
पर दलाई लामा तो कामयाब नहीं हो पाए?

डॉ:
आप यह सोचिए कि अगर दलाई लामा ने हथियार उठाया होता तो आज विश्व रंगमंच पर जिस तरह से वे और उनके आन्दोलन स्थापित हैं, वह होता? जिस तरह से उन्हें अनेकों देश जाने को मिलता है, वहाँ पर उनको जो सम्मान और समर्थन मिलता है, वह होता? कि उन पर कब का दमन होकर उनका आन्दोलन ही खत्म हो चुका होता? और शायद, हम और आप तिब्बत और दलाई लामा के नाम भी नहीं जानते।

और जहाँ पर हिंसा द्वारा जीत हासिल भी हुई, वहाँ थोड़ी देर बाद ही सही, अन्तत: सरकार एक या दूसरे तरीकों से परिस्थिति को काबू कर ही लेती है। तमिलों ने श्रीलंका के एक भू-खण्ड पर कब्ज़ा कर ही लिया था, नेपाल में माओवादियों ने भी एक तरह से जीत ही हासिल कर ली थी, पर अन्तत: क्या हुआ? तो आज जहाँ आतंकवाद के नाम पर पूरे विश्व की शक्तियाँ एक होकर दम लगाती हैं, तो उसमें भले ही नेक उद्देश्य के लिए कोई हिंसा का इस्तेमाल करता हो, पर उसे भी सरकारें नहीं छोड़तीं। ऐसे में अहिंसात्मक मार्ग विकल्पहीन सा हो गया है।

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१८. सामाजिक आन्दोलन

जि:
अच्छा, डाक्टर साहब। मैं तो बेसब्र हो रहा हूँ आन्दोलन करने के लिए। चलिए, कोई आन्दोलन करते हैं!

डॉ:
अभी तो हमारी मुलाकात हुए कुछ घंटे भी नहीं हुए, आपने कुछ तैयारियाँ भी नहीं कीं, योजना भी नहीं बनाया और आन्दोलन के लिए कूद पड़े!

जि:
तैयारी और योजना?

डॉ:
हाँ, हमें योजनाबद्ध तरीके से आन्दोलन में जाना होगा। ताकि हम खास मिशन के लिए लम्बे समय तक आन्दोलन को टिका सकें, घूसपैठियों से बच सकें, जोखिम और धन-जन की क्षति कम कर सकें, और आन्दोलन व्यवस्थापन के लिए कार्यकर्ताओं और मानवअधिकारकर्मियों को आवश्यक तालिम दी जा सके। अपने आन्दोलन को

छिटफूट की घटना के बजाय समग्र आन्दोलन का स्वरूप प्रदान करने के लिए और एकता की शक्ति प्राप्त करने के लिए भी हमें तैयारी करके योजनाबद्ध तरीके से ही जाना होगा।

आन्दोलन ऐसे ही नहीं हो जाता, लोग ऐसे ही अकारण एकाएक विद्रोह नहीं कर देते। उसके लिए आवश्यक तत्त्व होते हैं, साधन-स्रोत होते हैं। आन्दोलन के भी अपने चरण होते हैं, जिससे होकर वह गुजरता है।

मधेश में तो बच्चा-बच्चा चक्काजाम, बंद और भूख-हड़ताल के विषय से वाक़िफ़ है, पर अक्सर आन्दोलन के इन शस्त्रों का लोग ठीक ढंग से उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। क्योंकि कोई तैयारी नहीं होती। आज बंद किया, कल से ग़ायब। आज नारे लगाए, कल कोई नहीं है। मनोरंजन के साधन की तरह बन गया है आन्दोलन। और परिणाम यह है कि भूख-हड़ताल शुरु कर दिया पर कोई देखने तक नहीं आता, बाद में अपने ही लोगों द्वारा भूख-हड़ताल खत्म। दो-चार दिन सड़क पर शोरशराबा किया, जुलूस निकाले, फिर से लोग बिना उपलब्धि के ठंडा पड़ जाते हैं। और ऐसा इसलिए होता है क्योंकि आन्दोलन के लिए जो चीजें चाहिए, जो तैयारियाँ होनी चाहिए, आन्दोलन को जिस आवश्यक चरण से गुजरना चाहिए, वे नहीं हो पाता। इसलिए उन सबके विषय में हमें पहले ही सोचना चाहिए।

जि:
क्या-क्या चरण होते हैं आन्दोलन में?

डॉ:
पहला चरण है, उभार अर्थात् सामाजिक खलबली और आक्रोश का। इस चरण में लगभग कुछ भी व्यवस्थित नहीं होता, पर लोगों में व्यापक असंतोष और आक्रोश रहता है, किसी नीति या घटना के खिलाफ। इस चरण में लोग एकजुट नहीं होते, पर अकेले चौक-चहार पर या इन्टरनेट पर प्रतिक्रिया देते रहते हैं। लोग एक-दूसरे से हुए अन्याय के विषय में बात करते हैं, आक्रोश व्यक्त करते रहते हैं। मीडिया कवरिज भी हो सकती है, जो असंतोष को और बढ़ाती है। पर इस चरण में कोई आगे नहीं आने की और लोग एकत्र नहीं होने की स्थिति बनी रहती है। इस चरण में सामाजिक आन्दोलन संस्थाएँ मुद्दा को हाइलाइट करने का, उसके विषय में खबर और चेतना फैलाने का और लोगों को आन्दोलित करने का काम करती हैं। उनका काम आन्दोलन को दूसरे चरण में ले जाने का होता है।

जि:
दूसरा चरण?

डॉ:
दूसरा चरण होता है, एकीकरण अर्थात् लोगों के जुड़ने और इकट्ठा होने का। लोग जब एक दूसरे से शिकायत शेयर करने परन्तु एक नहीं होने के चरण को पार करते हैं, तब आन्दोलन इस चरण में प्रवेश करता है। इस चरण में आने तक लोग एक हो जाते हैं, उनका प्रयास सामूहिक होता है। लोगों को मुद्दे के विषय में जानकारी होती है, वे ये जानते हैं कि उसके लिए कौन जिम्मेवार है, अर्थात् आक्रमण के लिए लक्ष्य की पहचान हो चुकी होती है। इस चरण की सबसे खास बात यह है कि इसमें नेतृत्व उभरता है, जो लोगों को इकट्ठा करके समूह को एक दिशा प्रदान करता है। इस चरण में स्पष्ट रूप में माँग तय हो चुकी होती है, और लोग विरोध प्रदर्शन करने तथा जुलूस निकालने लगते हैं। पर जुलूस छोटे-छोटे समूहों में होते हैं।

जि:
तीसरा चरण?

डॉ:
अधिकारीकरण, सामाजिक आन्दोलन संगठन या किसी पार्टी द्वारा। इस चरण में छोटे-छोटे समूहों में निकल रहे जुलूस और उनके द्वारा हो रहे विरोध कार्यक्रमों के बीच में समन्वय किया जाता है। इनके समूहों के नेतृत्व एक जगह बैठते हैं और योजनाबद्ध तरीकों से कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए आगे बढ़ते हैं। केवल छिटफूट जुलूस और ऐसे ही उभरे नेतृत्व से काम नहीं चलता। इसके लिए समर्पित, जानकार और तालिम प्राप्त नेतृत्व की आवश्यकता होती है। इसकी पूर्ति के लिए कोई सामाजिक आन्दोलन संगठन या किसी पार्टी को आगे आना पड़ता है, और उनकी संरचना काम में लाई जाती है।

इस चरण में आने के बाद सरकारी और राजनैतिक संयन्त्र से नियमित सम्पर्क कायम रहता है। अधिकतर आन्दोलन इसी चरण में आते-आते खत्म हो जाते हैं, क्योंकि भावना और आक्रोश में आन्दोलन तो उठते हैं, जुलूस निकलते हैं, पर उसे योजनाबद्ध तरीकों से निरन्तरता देने के लिए, आन्दोलन को अधिकारीकरण करने के लिए और सरकारी तथा राजनैतिक संयन्त्र से सम्पर्क और समझौता करने के लिए नेतृत्व, सांगठनिक संरचना, जनशक्ति और पूर्वाधार तैयार नहीं होते। केवल भावना के भर पर आन्दोलन को टिकाए रखना मुश्किल होता है, और इसलिए समर्पित कार्यकर्ताओं और अधिकारियों की जरूरत होती है। और इसलिए इस चरण को पार कराके आन्दोलन को सफलता की ओर ले जाना अधिकारीकरण करने वाले संगठन की क्षमता और पूर्वाधार पर निर्भर होता है।

जि:
चौथा ?

डॉ:
समाप्ति या संस्थागतन। आन्दोलन की समाप्ति कई किस्म से हो सकती है।

  • दमन, यानि आन्दोलन के कारण सरकार कोई कड़ा नियम लागू कर देती है, कार्यकर्ताओं पर जासूसी करा सकती है, नेताओं को गिरफ्तार कराती है, और उसके कारण आन्दोलन बिखर जाता है।
  • सहवरण, यानि आन्दोलनकारी स्वयं अपने मुद्दों को छोड़ देता है। यह अक्सर तब होता है जब आन्दोलन केन्द्रीकृत नेतृत्व पर ज्यादा निर्भर होता है, ऐसे में नेता लोग अपना चेहरा बचाकर सरकार से कुछ वार्ता कर लेते हैं और आन्दोलन सफल होने से पहले ही खत्म कर देते हैं परन्तु आन्दोलन का मूलभूत मुद्दा पूरा नहीं हुआ होता है।
  • असफलता। आन्दोलन को व्यापक रूप में फैला न पाने और उसे निरन्तरता दे न पाने से, आन्दोलन में गुटबाज़ी हो जाने से या दरार पैदा हो जाने से, या जारी आन्दोलन किसी दूसरे आन्दोलन में विलीन हो जाने से अक्सर आन्दोलन असफल हो जाता है।
  • मूलधार समावेशीकरण, अर्थात् आन्दोलन राज्य संयन्त्र के मूलधार में समाहित हो जाता है और खत्म हो जाता है, जैसे कि नेताओं को कुछ मंत्रालय दे दिए जाते हैं, संसद में सीटें ही दे दी जाती हैं, या आन्दोलनकारी पक्ष राजनैतिक पार्टी बनकर निर्वाचन में हिस्सा ले लेता है।
  • सफलता, जिसमें आन्दोलन की माँग पूरी होने के बाद ही आन्दोलन खत्म होता है। अक्सर स्पष्ट रूप से निश्चित और स्थानीय माँग को लेकर स्थानीय रूप से उठे आन्दोलनों को कम समय में सफल होने की ज्यादा सम्भावना होती है। जैसे किसानों द्वारा फसल की क्षतिपूर्ति या गाँव वालों द्वारा आगजनी या बाढ़ की क्षतिपूर्ति की माँग सफल होने की सम्भावना ज्यादा रहती है, पर वहीं पर भ्रष्टाचार खत्म करने की माँग पूरी करने के लिए बहुत ज्यादा समय लगेगा, क्योंकि उसके लिए कोई स्पष्ट मापन और सहज निरीक्षण विधि नहीं होने के साथ-साथ, उसे पूरी करने के लिए जादू की छड़ी जैसी कोई चीज नहीं होती।

जि:
ये तो हुए सामाजिक आन्दोलन के चार चरण। पर सामाजिक आन्दोलन के लिए क्या आवश्यक है?

डॉ:
राजनैतिक अवसर, सांगठनिक शक्ति और सूत्रण क्षमता।

जि:
आन्दोलन के लिए पूर्वाधार क्या है?

डॉ:
पहला, सामूहिक आक्रोश या भाव। आक्रोश सामूहिक होता है, पर वह किसी एक व्यक्ति के साथ हुए अन्याय या एक व्यक्ति से जुड़ी घटने से भी ट्रिगर हो सकता है। देखा जाए तो ट्रिगर होने के लिए अक्सर तथ्यांक नहीं, बल्कि व्यक्तिगत घटनाएँ ही ज्यादा प्रभावकारी होती हैं। लोग इसलिए आन्दोलन में नहीं उतरते कि उन्हें कहा जाए कि सरकार ने १\% जनता को मार दिया, पर जनता के आगे सरकार द्वारा की गई केवल एक अन्यायपूर्ण हत्या भी जनता को भावपूर्ण बनाकर उन्हें आक्रोश में ला सकती है।

उसके बाद, सभी चीज अगर समान रखी जाए, तो ज्यादा विपन्न लोग आन्दोलन को बहुत दिनों तक झेल नहीं सकते, उसके लिए अपने पैर पर खड़ा होने की क्षमता होना आवश्यक होता है।

उसी तरह, लोगों की घना बस्ती या नियमित उपस्थिति रही झोपड़पट्टी, कॉलेज, स्कूल और फ़ैक्टरी जैसी जगहों पर आन्दोलन लम्बे काल तक चल सकता है, पर मेला, उत्सव, सभा-समारोह पर किए गए आन्दोलन ज्यादा दिन नहीं टिक पाते।

उसके साथ-साथ, नीचले स्तर तक संगठन पहले से मौजूद होना, देश के दूसरे समुदायों से कम लगाव होना, और लोगों में फ्री-राइडिंग (मुफ्त में लाभ पाने की प्रवृत्ति) के बदले व्यक्तिगत प्रतिबद्धता होना, ये सब आवश्यक हैं।

राज्य द्वारा कोई ऐन-कानून अकस्मात लगाए जाना या लोगों को मिल रहे अधिकार अकस्मात कटौती करना आदि को भी आन्दोलन के पूर्वाधार के रूप में लिया जा सकता है।

जि:
आन्दोलन को कैसे जगाएँ?

डॉ:
सबसे पहले, आन्दोलनकारियों के बीच पहले से सम्पर्क रहना महत्वपूर्ण होता है। आन्दोलनकारी एक या दूसरे संगठन से जुड़े रहना तथा कार्यकर्ताओं में आन्दोलन करने का पूर्व अनुभव होना आन्दोलन करने में सहायक होता है, क्योंकि ऐसे लोग जल्द ही आन्दोलन में उतर आएंगे। उसके साथ-साथ युवा, विद्यार्थी, बेरोजगार और अविवाहित लोग, जिनके पास ज्यादा स्वतन्त्रता हो, ऐसे लोग आन्दोलन में जल्दी उतरते हैं और पहला लक्षित समूह वही होना चाहिए। यही कारण है नेपाल में अक्सर आन्दोलन विद्यार्थियों या युवाओं के द्वारा ही शुरु होता रहा है।

उसी तरह आन्दोलन में लोगों को उतारने के लिए भावना को काम में लाने की बहुत ही जरूरी होती है। इसलिए ऐसे भावनात्मक मुद्दों को उछालें जिससे हर कोई जुड़ सके, जो क्रिटिकल अर्थात् अति महत्वपूर्ण लगे, जिस पर लोग जान लुटाने के लिए भी तैयार हो जाएँ।

उसके साथ-साथ, आन्दोलन के लिए भाषण और बातचीत के अलावा गीत-संगीत, वीडियो, पोस्टर, बैनर आदि के सहारे लेने के साथ-साथ प्रदर्शन को दिलचस्प, नाटकीय और नया बनाने की भी कोशिश करनी चाहिए, जैसे झाड़ू प्रदर्शन, पुतला दहन, भैंस जुलूस आदि करके।

इन सब कामों को योजनाबद्ध रूप में ले जाने के लिए सामाजिक आन्दोलन संगठन का जगह-जगह पर निर्माण होना जरूरी होता है।

जि:
सामाजिक आन्दोलन संगठन (SMO) क्यों चाहिए?

डॉ:
संगठन होने पर आन्दोलन के लिए ऑफिस, स्टाफ, स्वयंसेवक, कार्यकर्ता और नेतृत्व बोर्ड मौजूद रहते हैं। मान लिजिए आप आन्दोलन में हिस्सा लेना चाहते हैं या आन्दोलन को कुछ आर्थिक या अन्य सहायता ही करना चाहते हैं, तो आप कहाँ जाएँगे, किससे सम्पर्क करेंगे? संगठन रहेगा, उसका ऑफिस और स्टाफ रहेगा, तभी न आप जाकर आप उनसे बातचीत कर सकते हैं।

संगठन रहने से आन्दोलन वर्षो-वर्ष तक जारी रखा जा सकता है। नहीं तो आन्दोलन बस तीन-चार दिन की भीड़भाड़ और जुलूस में सीमित रह जाता है। सभी आन्दोलन का लक्ष्य कम समय में पूरे होने वाले नहीं होते; जैसे कि भ्रष्टाचार विरूद्ध का आन्दोलन निरन्तर वर्षो-वर्ष चलता रहेगा, उसके लिए संगठन होना आवश्यक है। भूमिहीनों का ही आन्दोलन, वह भी तत्काल ही

७–८ दिन जुलूस निकालने से सफल हो जाएगा, ऐसी बात नहीं है। भूमि मिलने पर भी वह आन्दोलन पुनर्वास पूरी तरह व्यवस्थित नहीं होने तक और भूमिहीन लोग आत्मनिर्भर नहीं बनने तक जारी रहेगा, उसके लिए भी संगठन आवश्यक है। और हमारी आजादी आन्दोलन भी उसी तरह वर्षों-वर्ष चलने वाला आन्दोलन है, उसके लिए तो हर जगह संगठन की मजबूत उपस्थिति होना अत्यावश्यक है।

जि:
संगठन का और क्या-क्या काम है?

डॉ:
मीडिया, दाता, सरकारी संयन्त्र, पार्टी, कूटनीतिज्ञ, दूसरे देश आदि से सम्बन्ध रखना।

जि:
आन्दोलन उठने पर सरकार क्या करती है, किस तरह से प्रतिक्रिया देती है?

डॉ:
खास करके आन्दोलनकारियों को निरुत्साहित करना, गिरफ्तार करना, तकलीफ़ देना—आन्दोलन के क्रम में सरकार का प्राय: यही रवैया रहता है। ऐसे में आन्दोलनकारियों को चाहिए कि वह सरकार को शान्तिपूर्ण तरीके से गिरफ्तार करने के लिए मजबूर करें।

ऐसा अगर सैकड़ों आदमी करेंगे, तो वह आन्दोलन सफलता की ओर बढ़ेगा। आपको गिरफ्तार करने के लिए सरकार को मजबूर करने के लिए आप सिडियो ऑफिस या किसी सरकारी कार्यालय में धरना देने जैसे काम कर सकते हैं।

जि:
आन्दोलन के क्रम में प्रदर्शनकारियों को क्या समस्याएँ झेलनी पड़ती हैं?

डॉ:
शान्तिपूर्ण आन्दोलन में सबसे बड़ी समस्या होती है घुसपैठियों की। आन्दोलन को असफल बनाने के लिए या उसे दूसरी ओर मोड़ने के लिए विपक्षी या अवसरवादी समूह आन्दोलन में घुसपैठ कर देते हैं, हिंसा और तोड़फोड़ कर देते हैं, सांप्रदायिक दंगा उठा देते हैं, कुछ उग्र प्रचारबाजी या बयानबाजी कर देते हैं। ऐसा करके वे आन्दोलन को बदनाम करते हैं, आन्दोलन के बुनियादों को कमजोर कर देते हैं। इससे विपक्षी या सरकार फायदा उठाती है। हिंसा और तोड़फोड़ करने या सांप्रदायिक सद्‍भाव खलल करने का कारण दिखाते हुए सरकार आन्दोलनकारियों का दमन करने लगती है; सरकार को एक आधार मिल जाता है। इसलिए इससे हमें एकदम सावधान होना चाहिए।

जि:
तो इससे बचें कैसे?

डॉ:
संगठित होकर, पहले से ही तैयारी करके। अगर संगठित होकर हम आन्दोलन पर उतरते हैं, अगर पहले से ही हममें तैयारी है, तो हम एक-दूसरे को जानते रहेंगे। तब आन्दोलन में अगर कोई बाहरी घुसपैठिया आ जाता है तो उसे हम पकड़ सकते हैं और उसे रोक सकते हैं। हममें पहले से ही तैयारी होने के कारण सभी आन्दोलनकारियों को ज्ञात रहेगा कि क्या करना जायज है क्या नहीं, या क्या करने की योजना है और क्या नहीं, और सभी आन्दोलनकारी योजना के तहत ही कदम उठाएँगे। संगठित होने के कारण नेतृत्व की योजना अनुरूप ही आन्दोलनकारी आगे बढ़ेंगे।

जि:
सरकार और भी कुछ चालें चलती हैं?

डॉ:
आज के जमाने में सरकार हिंसा का सहारा लेने से भी ज्यादा फूट डालो और राज करो (डिभाएड एंड रूल) की नीति अपनाने, मतभेद पैदा करने, दूसरे समूहों को विरोध में खड़ा करने और उन्हें समर्थन करने, नेतृत्ववर्ग को राज्य संरचना में शामिल कर लेने और दिखावटी समाधान के लिए आयोग, कमीशन और छानबीन कमेटी का गठन करने का काम करती है।

जि:
आन्दोलन की शुरुआत कैसे करें?

डॉ:
पहले छोटे-छोटे समूहों से आन्दोलन शुरु करें, किसी टोल या गाँव के लोग मिलकर, किसी क्लब के सदस्य और दोस्त मिलकर, या किसी कार्यालय या सामाजिक संस्था से जुड़े लोग मिलकर। याद रहे कि आन्दोलनकारी एक-दूसरे से परिचित हो।

आन्दोलन के लिए प्रभावकारी संचार माध्यम होना चाहिए, वह बहुत हद तक आजकल मोबाईल फोन पूरा कर देता है। (हालांकि मोबाईल फोन की जानकारी सरकार ट्रैक करके आन्दोलन के विषय में पहले ही पता लगा सकती है, पर शान्तिपूर्ण आन्दोलन को इससे खास फर्क नहीं पड़ता अगर रणनैतिक बात मोबाईल पर शेयर नहीं की जाती है।)

उसी तरह आन्दोलन के लिए सक्षम, ईमानदार और समर्पित नेतृत्व की आवश्यकता होती है, जो अच्छा-खासा बोल सकता हो, निर्णय ले सकता हो, लोगों को मार्गदर्शन कर सकता हो, और लोगों में ऊर्जा जगाने के साथ-साथ उन पर प्रभाव डाल सकता हो और उन्हें नियन्त्रण में भी रख सकता हो।

इसके साथ-साथ आन्दोलन का लक्ष्य, माँग और टार्गेट सभी को प्रष्ट होना चाहिए। माँग व्यवहारिक, निश्चित और स्पष्ट होनी चाहिए। जैसा कि किसान की समस्या के हल के लिए नेपाल सरकार के विरोध में एक गाँव के लोगों का सड़क पर जुलूस निकालना, यह सही सूत्रण नहीं है, क्योंकि इसमें माँग और टार्गेट (किसके खिलाफ, समाधान कौन देगा?) स्पष्ट और निश्चित नहीं है। पर ‘हरेक किसान को माघ महीने के अन्दर गेहूँ खेती के लिए ४ बोरा खाद मिले, उसके लिए सिडिओ कार्यालय घेराऊ करना’, यह ज्यादा उपयुक्त सूत्रण है।

आन्दोलन को सफल बनाने के लिए प्रथमत: आन्दोलनकारियों को आशावादी होना जरूरी है।

उसी तरह आन्दोलन को सफल बनाने के लिए सरकारी अधिकारियों का समर्थन, देखनेवालों की सहानुभूति और आन्दोलनकारियों का लगाव की भी बहुत आवश्यकता होती है।

उसके साथ-साथ, संगठन या आन्दोलन के लिए संसाधन की आवश्यकता को नकारा नहीं जा सकता है। अगर आन्दोलनकारी निर्धन है और वह संगठन की सदस्यता शुल्क आदि पर निर्भर है, तो संगठन की बहुत बड़ी शक्ति छोटी-छोटी रकम जमा करने पर खर्च होगी। दूसरी ओर अगर किसी धनी व्यक्ति या संस्था से चंदा स्वीकार करते हैं, तो उसमें कुछ शर्तें आने की सम्भावना रहती है।

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१९. कार्यकर्ताओं की तैयारी

जि:
डाक्टर साहब, आन्दोलन के विषय में इतना कुछ जान लिया। चलिए न सड़क आन्दोलन करते हैं!

डॉ:
अरे, आप तो फिर से शुरु हो गए। आन्दोलन से पहले हमें जरूरी है: तैयारी, तैयारी, तैयारी। और सड़क आन्दोलन किस लिए? सड़क आन्दोलन करके क्या करेंगे? स्वायत्त मधेश तक की माँग भी तो हम सब ने पहले ही पूरी करवा चुके, समझौते में स्वायत्त मधेश लिखा हुआ है, तो फिर आन्दोलन क्यों? समानुपातिक समावेशी की बात भी समझौते में है, पर क्या हुआ? ३००० मधेशी को भी सेना में भेज पाए? तो फिर उन्हीं के आगे माँग रखने चलें, उन्हीं से समझौता करने चलें? वह तो कम-से-कम ५०–६० वर्ष से हो रहा है। अब आन्दोलन होगा केवल आजादी के लिए, और वह तब होगा जब हम पूरी तरह तैयार होंगे। उसके लिए पहले हमें स्वयं को काबिल बनाना होगा, सिस्टम को बदलने से पहले हमें खुद को बदलना होगा। गुलामी मानसिकता बदलनी होगी, खुद को तैयार करना होगा। आजाद होने से पहले आजादी रखने के लिए हमें क्षमता का विकास करना होगा।

जि:
हम मधेश के लिए अपनी जान देने के लिए तैयार हैं, इससे ज्यादा क्या तैयार हों?

डॉ:
मुझे बताइए, अपने नेता या कार्यकर्ताओं को आप कितने देश लाबिंग के लिए भेज सकेंगे? UN के कितने कार्यक्रमों में न्यूयार्क या जेनेभा जाकर आप भाग ले सकेंगे? कितने देशों के विदेश विभागों से आप सम्पर्क स्थापित कर उनका समर्थन हासिल कर सकेंगे? कितने वर्षों तक हम आन्दोलन को जारी रख पाएँगे? क्योंकि अगर आजादी चाहिए तो वर्षों तक आन्दोलन जारी रह सकता है। आन्दोलन के क्रम में कितने क्षेत्रों में आप अपनी उद्धार टोली को भेज सकेंगे?

आन्दोलन की तैयारी के विषय में आप केवल तीन प्रश्न ही पुछिए। कितने महीने बिना काम किए मधेश के मज़दूर और किसान आन्दोलन पर उतर सकते हैं? कितने महीने मधेशी कर्मचारी नेपाल सरकार से वेतन लिए बिना आजादी आन्दोलन में उतरते रहेंगे? मधेशी लोग अपनी निजी सम्पत्ति या आमदनी के कितने प्रतिशत आन्दोलन में लगाने के लिए तैयार हैं? इन सबका जवाब कम-से-कम २५–३० होना चाहिए।

याद रहे हम आजादी की लड़ाई लड़ रहे हैं, नेपाल की सत्ता और मंत्री-मंडल में हिस्सेदारी की नहीं कि दो महीने आन्दोलन किया, फिर वार्ता किया, मंत्री और सांसद बनना पक्का और

आन्दोलन खत्म। हम अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए आन्दोलन कर रहे हैं, और उससे पहले हमें साबित करना होगा कि हम उसके काबिल है, हम हर क्षेत्र में सक्षम हैं, नहीं तो आन्दोलन सफल होने के बाद भी हम मुहँ के बल गिरेंगे।

इसलिए हमें यह भी सोचना होगा कि आजादी आन्दोलन सफल होने के बाद क्या हम प्रभावकारी ट्रांजिशन कर पाएँगे, उसके लिए हमारे पास जनशक्ति और तैयारी हैं? संसद के एक समानुपातिक सूची तैयार करने में तो बबाल खड़ा हो जाता है तो बिना तैयारी के मधेश के पूरे संयन्त्र खड़ा कर पाएँगे—प्रशासन, सरकार, मंत्रालय, निकाय, सेना और पुलिस? यह सारी बातें विचार करनी होगी। यह सब बातें हम सोचते नहीं, और खाली उछलते रहते हैं कि चलो सड़क आन्दोलन करें!

जि:
तो आन्दोलन करें ही नहीं?

डॉ:
नहीं, ऐसी बात नहीं है। आन्दोलन तो होता रहेगा, विचार का प्रचार-प्रसार करना, क्या वह आन्दोलन नहीं है? लोगों को शिक्षित बनाना, क्या वह आन्दोलन नहीं है? दजेह प्रथा और छूवाछूत जैसे कुरीतियों का खत्म करना, क्या वह आन्दोलन नहीं हैं? किसानों को खाद-बीज और फसल क्षतिपूर्ति के लिए या पुलिस द्वारा मधेशियों पर हुए अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाना, ऐसे आन्दोलन भी होते रहेंगे। यानि कि सामाजिक और मुद्दा आधारित आन्दोलन होते रहेंगे, पर व्यापक राजनैतिक परिवर्तन के मुद्दे को लेकर तत्काल ही बिना बृहत् तैयारी के आन्दोलन करना उचित नहीं।

जि:
तो इन सामाजिक और मुद्दा आधारित आन्दोलन के लिए तैयारी में क्या-क्या सीखना है?

डॉ:
सामाजिक और मुद्दा आधारित छोटे-छोटे आन्दोलन तत्काल करने के लिए भी कार्यकर्ताओं और नेताओं को कुछ चीजें तुरन्त सीख लेनी चाहिए। जैसे प्रेस-विज्ञप्ति, अपील, न्यूज स्टोरी, सहमति पत्र, एजेन्डा, माइन्यूट आदि लिखने के लिए सिखें। लोगों को अपनी बातें समझाना, लोगों को जुटाना और एक करना, सभा-सम्मेलनों का संचालन और उद्‍घोष करना, उसमें अपनी बातें रखना, भाषण करना, अन्तर्वार्ता देना, प्रेस कन्फेरेन्स करना, मध्यस्थता करना, विवाद मिलाना—ये सारी कलाएँ बहुत आवश्यक है। उसके साथ-साथ अपना चरित्र, आचरण और व्यक्तित्व बनाएँ। जुलूस और सभा के सफल व्यवस्थापन के लिए भी अपनी कार्यक्षमता का विकास करें।

जि:
ये सारी कलाएँ सीखने के लिए क्या करें, किताब पढ़ें?

डॉ:
इन सब का तकनीकी पक्ष जानने के लिए किताब पढ़ सकते हैं, कोई तालिम भी ले सकते हैं, स्वयं भी मनन करके सीख सकते हैं। कोई अच्छा उदाहरण अपने सामने रखकर उसे विवेचना करते हुए उससे भी सीख सकते हैं। पर केवल सैद्धान्तिक ज्ञान हासिल करना पर्याप्त नहीं होता।

सीखी हुई चीजों को तत्काल उपयोग में लाइए, कार्यक्षेत्र में जाकर उन्हें परखिए। फिल्ड वर्क के जरिए कार्यकर्ताओं को कम-से-कम ऐसी बातें सिखनी चाहिए—

  1. लोगों को संगठित करना। कोई एक समसामयिक मुद्दा लें, उनके विषय में जानकारी प्राप्त करें, पृष्ठभूमि अध्ययन करें, मुद्दा कोरेडिकलाज करें, लोगों में प्रचार-प्रसार करें और गाँव या टोल में बैठक या भेटघाट करके लोगों को संगठित करें। ऐसे मुद्दा बाढ़-पीड़ितों के विषय में हो सकता है, किसान की फसल क्षतिपूर्ति के विषय में हो सकता है, कोई मानवअधिकार उल्लंघन या पुलिस द्वारा ज़्यादती की घटना हो सकती है।
  2. सर्वदलीय या गाँव/टोल की बैठकों में सहभागी होना, औपचारिक वक्तव्य या भाषण देना
  3. कोणसभा करना, आमसभा में सहभागी होना, सार्वजनिक भाषण देना
  4. एफएम रेडियो, टीवी चैनल और पत्रकारों से सम्पर्क स्थापित करना; पत्रकार सम्मेलन करना, अन्तर्वार्ता देना
  5. प्रेस-विज्ञप्ति लिखना और प्रकाशित करना (इमेल या फ्याक्स करके या प्रेस सम्मेलन के जरिए), मानवअधिकारवादी संस्थाओं तथा अन्तरराष्ट्रीय एजेन्सियों को पत्र या अपील भेजना (जैसे इन्सेक, थर्डएलायन्स, UNHCR आदि को)
  6. स्थानीय उद्धार टोली, प्रहरी प्रशासन, जिला प्रशासन कार्यालय आदि से सम्पर्क बनाना, उनसे माँगे पूरी करवाना, समझौता करना
  7. विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन और व्यवस्थापन के लिए भूमिका निर्वाह करना
  8. अर्थ संकलन (फंड रेजिंग) के लिए विभिन्न कार्यक्रम चलाना
  9. संगठन के विस्तार के लिए सदस्य बनाना आदि

जि:
और कुछ?

डॉ:
आजकल इन्टरनेट का युग है, मधेशी कार्यकर्ताओं को उसे भी प्रभावकारी तरीकों से उपयोग करना होगा और वहाँ भी अपना प्रभाव कायम करना होगा। उसके लिए आवश्यक कम्प्यूटर ज्ञान हासिल करें। जैसे फेसबुक और ट्वीटर लगायत के सामाजिक संजाल पर एक्टिविज़म करने, ब्लग लिखने, मास इमेल करने और गूगल पर डक्युमेन्ट शेयर तथा कोलाबरेशन करने का काम सिखें। उसके साथ-साथ कुछ कार्यकर्ताओं को डोमेन रजिस्टर करने, वेबसाइट चलाने, FTP और डेटाबेस अपडेट करने का ज्ञान भी होना चाहिए। देवनागरी टाइपिंग और थोड़ा-बहुत ग्राफिक्स का ज्ञान भी आवश्यक है।

जि:
इन्टरनेट पर हो या गाँव के किसानों के बीच, अपना विचार रखने में सदैव कठिनाई होती है। एक पर काम करता है तो दूसरों पर नहीं। आखिर लोगों को समझाने के लिए क्या करूँ?

डॉ:
किसानों को उनके अनुभव और सरोकार की बातों के जरिए समझाएँ; खेत, खाद, बीज, सिंचाई, फसल के लिए उपयुक्त मूल्य और बाजार आदि के मुद्दों को लेकर। सरकारी कर्मचारियों को भी उन्हीं के अनुभव की बातें बताएँ। वैदेशिक काम पर गए युवाओं को उनकी सरोकार की ही बात बताएँ। अपने अनुभव के भीतर रहने पर उन्हें मतलब रहेगा, आप उनसे अच्छी तरह जुड़ पाएँगे और वे आपकी बातें अच्छी तरह समझ सकेंगे। शब्द और उदाहरण का चयन, व्याख्या की गहराई आदि श्रोता के स्तर अनुरूप होना जरूरी है, क्योंकि अगर वे समझ नहीं पाए तो बड़े-बड़े शब्द प्रयोग करना व्यर्थ है।

जि:
कभी कभी भाषण देना पड़ता है तो घबरा जाता हूँ, सब कुछ भूल जाता हूँ। इससे कैसे निपटूँ?

डॉ:
इसमें भी सबसे पहली बात है तैयारी। भाषण देने जाने से पहले दूसरों के भाषण देखकर सीखें। बूँदा-बूँदा बनाकर मुख्य-शब्दों (की-वर्ड) को क्रम में मिलाकर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखें, ताकि भूलने पर याद दिलाने के काम आए। औपचारिक सम्मेलनों में लिखित भाषण ही पढ़ना चाहिए, पर आमसभा के भाषणों में पूरा पढ़ना अच्छा नहीं है, केवल प्वाइंटस् लिखकर रखें। एक के बाद दूसरा प्वाइंट अच्छी तरह अपने आप आता है कि नहीं देखें, और उसी अनुसार मिलाएँ। जाने से पहले खूब अभ्यास करें; जो उच्चारण करने में कठिनाई हो, उस पर ठीक ढंग से कार्य कर लें; मुद्रा और हावभाव (जेस्चर) के साथ रिहर्सल करें; सफल होंगे ऐसी परिकल्पना करें। उसके साथ-साथ, एक सामान्य भाषण सदैव तैयार रखें, जो हर जगह काम दे।

जि:
भाषण देते वक्त क्या-क्या ख्याल रखें?

डॉ:
सबसे पहले श्रोता का ध्यान तानें। आत्मविश्वास से पेश हों; मित्रतापूर्ण भाव रखें, दूरी वाली अनुभूति नहीं। बोल्ड और कन्फिडेन्ट भीतरी आवाज से बोलें। अपने श्रोता से नजर मिलाते हुए, नज़दीकी अनुभव करते हुए, उनसे घुलकर अपनी बात आत्मीयता से पेश करें। ऐसा लगे कि वो समझ रहा हो न कि खाली अपनी तरफ से बस बोल दें और चले आएँ। जनता के पक्ष में, उन्हें तारीफ करते हुए, उनका आदर करते हुए और उन्हें सबसे शक्तिशाली होने की याद दिलाते हुए बोलें।

जि:
इन सब तैयारी के लिए अध्ययनशीलता कितनी जरूरी है?

डॉ:
विशाल योजना, दूरदृष्टि (भिजन) और दूर तक की योजना के लिए अध्ययनशीलता और बौद्धिकता बहुत ही जरूरी है। इतिहास, भूगोल, मानव-सभ्यता, समाज, कला, संस्कृति आदि पर खोज करने, और लेख और किताब लिखने जैसी कामों में सक्षम कार्यकर्ताओं को लगना चाहिए। मधेश के विषय में खोज करने के साथ-साथ कार्यकर्ताओं को विश्व का इतिहास, राजनीति और घटनाओं का विश्‍लेशन भी करते रहना चाहिए।

कार्यकर्ता और नेता दोनों पढ़ने की आदत डालें, और पढ़कर मनन करें, उसका उपयोग करें। खाली पढ़ें नहीं। चाहे विश्व का इतिहास और राजनीति हो, गांधी या मंडेला लगायत के आत्मकथा हों, या नेपाल में ही २००७ साल से लेकर २०६४ साल तक के आन्दोलन हों, उन सबसे बहुत कुछ सीखने को मिलता है, उन पर मनन करते हुए पढ़ने की संस्कृति का विकास करें।

अपने आन्दोलन या कार्य में कोई समस्या आने पर विचार करें—ऐसी समस्या हमें ही पहली बार पड़ा है? क्या गांधीजी को नहीं पड़ी? दूसरे महान नेताओं को नहीं पड़ी? दूसरे आन्दोलनों में नहीं हुई? उन्होंने उन समस्याओं का किस तरह से सामना किया? इस तरह से मनन करने से बहुत जवाब मिल जाते हैं, बहुत रास्ते निकल आते हैं।

जि:
लेकिन बिना पढ़े ही तो इतने लोग मन्त्री हो जाते हैं, तो फिर पढ़े क्यों?

डॉ:
बिना पढ़े लोग सांसद, मंत्री और प्रधानमंत्री हो सकते हैं, पर भिजनरी राजनेता नहीं। भारत आजादी आन्दोलन के १० अग्र नेताओं के नाम बताएँ, आप को सभी एक से एक योग्य और दक्ष लोग मिलेंगे, विद्वान लोग मिलेंगे, क्यों? गांधी, नेहरू, अंबेदकर, जीन्ना, सरदार पटेल, गोखले, सुभाष चन्द्र बोस—सभी विद्वान और लेखक थे। नेपालियों में ही उदाहरण देखेंगे तो भी वी.पी. कोइराला, गणेशमान, पुष्पलाल, मदन भण्डारी, प्रचण्ड, बाबुराम जैसे सारे संस्थापक और अग्रणी नेता विद्वान और दूरदृष्टि वाले लोग हैं।

आज चीन की तरक्की की बहुत ही तारीफ होती है; उनके ९ शीर्ष सरकारी अधिकारियों/नेताओं में ८ इन्जिनियर या वैज्ञानिक ही हैं। ज्ञान से तरक्की होती है, यह बात देखी हुई है; विकसित राष्ट्र कहीं भी अशिक्षित राष्ट्र नहीं रहा है।

इसलिए अध्ययन की आदत डालनी ही होगी, और योग्य मधेशियों को राजनीति में आना होगा। आज अधिकांश मधेशी लोग ५०० रुपये की मछली हर हप्ते खरीदकर खाते हैं, पर ५०० रुपये की, सिलेवस से बाहर की, किताब शायद ही वर्ष में भी खरीदते हैं। उस सोच को बदलना होगा।

जि:
क्या पढ़ें?

डॉ:
गांधीजी लगायत दूसरे बड़े राजनेताओं और आन्दोलन से सम्बन्धित किताब पढ़ें। मधेश का इतिहास पढ़ें, मधेश की सामाजिक और आर्थिक स्थिति पर विचार करें, मधेश की अद्यावधिक घटनाओं से परिचित रहें। अपने आपको सूचित रखें, पत्र-पत्रिकाएँ पढ़ें। भ्रमण करें, देखें, अनुभव करें।

जि:
अनुभव करें?

डॉ:
कुछ बातें होती है जिसमें किताब से ज्यादा प्रभावकारी अनुभव करना हो सकता है, व्यवहार द्वारा सीखना हो सकता है।

जैसे मानव स्वभाव का अध्ययन, मानवीय सम्बन्ध, नेतृत्वकला, व्यवस्थापन आदि बातें अनुभव के द्वारा सीखकर भी बहुत लोग इसमें माहिर होते हैं।

परन्तु इसका मतलब ये नहीं है कि हर कुछ अनुभव से सीखा जा सकता है, क्योंकि समय और इंद्रिय की सीमा में रहते हुए हर कुछ अनुभव करना सम्भव नहीं होता। जैसा कहेंगे कि विद्युतीय फील्ड या मैक्सवेल के सूत्र आप अनुभव करके ही सीख लेंगे, तो वह व्यवहारिक नहीं है। उसके लिए तो पहले पढ़ना ही पड़ेगा न! और जो बातें अनुभव से सीखी भी जा सकती हों, उनमें भी हर चीज खुद अनुभव करने के बजाय दूसरों के अनुभवों से भी कुछ सीख सकते हैं। अगर कार बनाना हो तो अब शुरु से फिर एक‍-एक चीज आविष्कार करना कोई मायना नहीं रखता।

जि:
ठीक है, डाक्टर साहब, ये तो हुई आन्दोलन के लिए तैयारी की बातें। पर तत्काल आन्दोलन के लिए कुछ आइडिया?

डॉ:
आप मधेश में आम आदमियों के साथ समय गुजारिए, आपको हर पल आन्दोलन के लिए मुद्दे मिलते रहेंगे, औपनिवेशिक शासन होते ही ऐसे हैं। फिर भी आन्दोलन के लिए कुछ बातें बताता हूँ—

  • नेपालियों/पहाडियों की फ़ैक्टरियों के उत्पादन कम प्रयोग करना या बहिष्कार करना
  • मोटरसाइकिल और कार मत खरीदना (नेपाल सरकार को भारी टैक्स रकम न देने के लिए)
  • बीज और खाद आपूर्ति, फसल क्षतिपूर्ति या सिंचाई को लेकर आन्दोलन
  • प्रवासी मज़दूर या वैदेशिक रोजगार आन्दोलन (उनसे भारी कर उठाने पर भी उन्हें राहत और उचित संरक्षण नहीं देने के लिए; विदेश में जरूरत पड़ने पर मदद नहीं करने के लिए)
  • सिडिओ, एसपी, पुलिस और प्रशासन की ज़्यादती के विरूद्ध आन्दोलन
  • सीमा-क्षेत्र यातना विरूद्ध आन्दोलन
  • नेपाली पत्रपत्रिका, रेडियो और टीवी कार्यक्रम बहिष्कार आन्दोलन
  • काठ, रोड़ा, गिट्टी आदि तस्करी विरूद्ध आन्दोलन, चुरिया संरक्षण आन्दोलन
  • राज्य पुनर्संरचना विरूद्ध आन्दोलन (मधेश में बहुप्रदेश रखने की योजना विरूद्ध)
  • संविधान विरोध आन्दोलन (मधेशियों की पहचान न देने के लिए)
  • कूटनीतिज्ञों की गाड़ी या टोली पर बन्देज (काठमांडू केन्द्रित कार्यशैली और मधेश की उपेक्षा करने के लिए)
  • काठमांडू केन्द्रित एनजीओ विरोध आन्दोलन (काठमांडू केन्द्रित होकर मधेश के नाम रकम निकासा करके मधेश में अधिकांश विकृति और परनिर्भरता फैलाने के लिए)

ऐसे कई आन्दोलन हो सकते हैं।

जि:
यानि सरकार की अन्यायपूर्ण नीति के खिलाफ लड़ते रहें?

डॉ:
नेपाली राज के विरोध में ही नहीं, हमारे भीतर रहे कमी-कमजोरियों के खिलाफ तो हमें उससे भी ज्यादा जोर से आन्दोलन करना चाहिए। हमें अपने विकास के लिए, अपनी उन्नति के लिए भी आन्दोलन करना चाहिए, जैसे—

  • शिक्षा के लिए आन्दोलन
  • स्वयंसेवा अभियान
  • सामाजिक जागरण अभियान
  • मधेश लौटो आन्दोलन
  • दजेह प्रथा विरूद्ध आन्दोलन
  • वैवाहिक फ़िज़ूलखर्ची बन्द आन्दोलन
  • शराब और जुआ विरूद्ध आन्दोलन
  • छूवाछूत और भेदभाव उन्मूलन आन्दोलन
  • महिला अधिकार आन्दोलन
  • मधेशी भाषा और वेश आन्दोलन
  • मधेश खेलकूद विकास आन्दोलन (जैसे मधेश प्रीमीयर लीग गठन करके अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर मधेश की टीमों को खेलाने के लिए)

[GO TO CONTENTS]

भाग ४: बाधा

२०. गैर-कानूनी!

जि:
हम आजादी के लिए लड़ें, यह बात ठीक है। पर क्या यह गैर-कानूनी नहीं है? है तो फिर हम कैसे गैर-कानूनी काम करें?

डॉ:
कौन सा आन्दोलन गैर-कानूनी नहीं था? क्या सारे हड़ताल और बन्द कानूनी थे, कर्फ्यू को उल्लंघन कर के होते रहे आन्दोलन कानूनी थे?

२०४६ साल से पहले राजनैतिक पार्टियों पर भी प्रतिबंध था, पार्टियाँ आमसभा तक नहीं कर सकती थीं। वह गैर-कानूनी था। आमसभा करने पर नेपाल सरकार पार्टी के नेताओं को गिरफ्तार करके सजा देती थी। २०६२–६३ साल से पहले गणतन्त्र के लिए आवाज उठाना गैर-कानूनी था, पत्रिकाओं में गणतन्त्र के लिए लेख लिखने पर भी जेल भेज दी जाती थी, तो क्या लोगों ने गणतन्त्र के लिए आवाज नहीं उठाई और गणतन्त्र लाने के लिए आन्दोलन नहीं किया? उसी तरह आज मधेशी के विरुद्ध में नेपाली राज है, मधेशियों की आजादी सभा और आन्दोलन पर उनका विरोध होना स्वाभाविक है।

जि:
तो क्या हम सरकार के सारे नियम-कानून तोड़ते रहें, हम गैर-कानूनी काम करते रहें?

डॉ:
आपको याद रखना है कि नियम और कानून न्यायपूर्ण और अन्यायपूर्ण हो सकते हैं, उचित और अनुचित हो सकते हैं। हम न्यायपूर्ण कानून को मानेंगे, पर अन्यायपूर्ण कानून के खिलाफ में विद्रोह करेंगे और हम चोरी-छूपे नहीं करेंगे। क्योंकि हम गलत नहीं हैं तो चोरी-छूपे क्यों? खुले आम घोषणा करके करेंगे कि देखो तुम्हारा यह कानून हमारे प्रति अन्याय है और हम इसको नहीं मानते, देखो यह हमारा अधिकार है और हम इसे ले रहे हैं।

और परिवर्तन तो हर क्षेत्र में खिलाफ जाने से ही हुआ है, चाहे वह विज्ञान में हो, समाज में हो या राज्य में। अगर विज्ञान में भी आप मान लेंगे कि जो कुछ है वही सही ही है तो कभी नया नियम नहीं आएगा, कभी नई जानकारी नहीं मिलेगी। राज्य में भी मान लेंगे कि सरकार जो भी कुछ आदेश देती है, उसे मान लेना ही सही है, तो संसार में कभी कोई राजनैतिक परिवर्तन नहीं आया होता।

और क्या अगर नेपाली कानून में लिखा रहेगा कि मधेशियों की हत्या करना माफ़ है तो हम मधेशियों की हत्या करेंगे? अगर ऐसा कानून है तो ऐसे कानून को हम तोडेंगे, एक बार नहीं बार-बार तोडेंगे। और अभी भी तो हत्या ही हो रही है मधेशियों का। ऐसा प्रतीत होता है कि नेपाली पुलिस को मधेशियों की हत्या के लिए, उन पर जुर्म करने के लिए छूट ही दे दी गई है। निर्दोष मधेशियों को मारने के बाद पुलिस अफ़सर का प्रोमोशन हुआ है, आइजीपी बन गए हैं। तो हम क्या ऐसे कानून को मानकर बैठें? हरगिज नहीं, राज्य के कानून मानने से पहले सत्य को मानना हमारा धर्म है, अपनी अन्तरात्मा की सुनना हमारा धर्म है। हम सत्य और अन्तरात्मा को बन्धक बनाकर नहीं जी सकते, कोई भी नहीं जी सकता।

जि:
पर आजादी के लिए नेपाली राज से लड़ने पर राजद्रोह का आरोप लग सकता है, जेल भी तो हो सकती है?

डॉ:
नेपाल की ही बात करें तो बता दिजिए कौन से संस्थापक या बड़े नेता को राज्य की तरफ से मुद्दा नहीं लगा और जेल नहीं हुई? क्या वी.पी. कोइराला, कृष्ण प्रसाद भट्टराई, पुष्पलाल, मनमोहन, गजेन्द्रबाबू और रामराजा प्रसाद सिंह को मुद्दा नहीं लगा, वे जेल नहीं गए? भारत की बात करें तो क्या गांधी, नेहरू और पटेल को राज्य का मुद्दा नहीं लगा और वे जेल नहीं गए? कौन से संस्थापक नेता जिन्होंने कुछ महत्वपूर्ण राजनैतिक परिवर्तन लाना चाहा, उनको राज्य के विरोध का सामना नहीं करना पड़ा?

इसलिए हम बस यह सोचें कि वह सुनहरा मौका होता है अपने आन्दोलन में निखार लाने के लिए। सरकार के ऐसे कदम मुद्दा की शक्ति साबित करने के लिए मोहर लगा देते हैं। हाँ, बस सरकार की कार्रवाई और गिरफ्तारी ठीक समय पर हो, अपनी ओर से तैयार रहने के बाद हो तो सरकार के द्वारा की जाने वाली कार्रवाई और गिरफ्तारी से बेहतर लाभ उठाया जा सकता है।

जि:
फिर भी गोप्य रूप से लगेंगे तो अच्छा होगा न?

डॉ:
हम सब कौन से क्रिमिनल काम में लगे हैं या कहाँ बन्दुक उठाकर लोगों को मारने चले हैं कि हम छुप-छुप कर लगें? हम सब सत्य चीज के लिए सही और शान्तिपूर्ण तरीके से आवाज उठा रहे हैं, इसमें छुपाने वाली बात क्या है? यह तो दिखाने की बात है, बीच सड़क पर खुले आम चिल्लाने की बात है, यह सारे आम गौरव करने की बात है कि देखो भाई मुझे गुलामी मंजूर नहीं, मुझे नेपाली उपनिवेश मंजूर नहीं और हमें आजादी चाहिए। यह हमारी स्वतन्त्रता है, और पूरे विश्व अभिव्यक्ति की इस स्वतन्त्रता और अपने अधिकार एवं आजादी के लिए शान्तिपूर्ण तरीके से उठाई गई आवाज को जायज मानते हैं, उल्टा सराहना करते हैं तो हम लुकछिप कर क्यों लगें?

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२१. खतरा!

जि:
पर आजादी आन्दोलन में लगने से जान को भी तो खतरा है?

डॉ:
देखिए, यह खतरा से भी ज्यादा डर है। यह हम तथ्य के द्वारा देख सकते हैं कि हमारा डर कितना बेबुनियाद है। केवल सन् 2009/10 में नेपाल में सड़क दुर्घटना से 1734 लोगों की मृत्यु हुई, पर राजनैतिक कारण से कितने लोगों की मृत्यु हुई? विश्व स्वास्थ्य संगठन के तथ्यांक के अनुसार इस साल धुम्रपान के कारण नेपाल में १७००० लोगों की मृत्यु हुई यानि हर रोज ४६ आदमियों की मृत्यु हुई, राजनैतिक कारण से कितने लोगों की मृत्यु हुई? पिछले साढ़े ३ वर्ष में नेपाल से वैदेशिक रोजगार में जानेवालों में १३५७ लोगों की मृत्यु हुई यानि हर दिन एक से ज्यादा। तो क्या खतरनाक है? राजनैतिक आन्दोलन करना या सिगरेट पीना या घर से बाहर सड़क पर निकलना या वैदेशिक रोजगार पर जाना?

जि:
जब तथ्य यह है तो फिर हमारे अन्दर डर क्यों है? क्यों लोग कहते हैं कि राजनीति बहुत खतरनाक है?

डॉ:
यह डर हरेक शासकवर्ग अपने शासन कायम रखने के लिए जनता में पैदा करता है। क्योंकि यह शासकवर्ग की काबिलियत नहीं, बल्कि हमारे मन का डर ही है, जो उसे मालिक और हमें गुलाम बना दिया है।

आप भारत के आजादी आन्दोलन को ही लिजिए। हमें भगत सिंह जैसे शहीदों के नाम ज्यादा याद दिलाया जाता है। क्या आजादी आन्दोलन के दौरान केवल विद्रोही आवाज उठाने वाले भगतसिंह और उनके साथी ही मारे गए थे? जो लोग आजादी आन्दोलन में हिस्सा भी नहीं ले रहे थे, अपने घर में ही चुप चाप बैठे थे, उन ‘निर्दोषों’ में से कितने मारे गए थे? इसका आँकड़ा है किसी के पास? ऐसे लाखों लोग मारे गए थे जिनका राजनीति या आन्दोलन से कुछ लेना देना नहीं था। उस हिसाब से तो खतरा यहाँ उलटा घर में बैठने में है, आजादी आन्दोलन करने में नहीं।

पर राज्य जो है वह भगतसिंह जैसे राजद्रोह करने वालों की मृत्यु या फाँसी का प्रचार ज्यादा करता है, ताकि दूसरे लोग उस तरीके से राज्य का विद्रोह न करे और शासक अपनी पकड़ जमाए रखे। मारे तो सैनिक भी जाते हैं पर उनके नाम से सड़क का नामाकरण नहीं होता और पार्क नहीं बनता क्योंकि अगर लोगों के मन में सेना में भर्ती होने का डर पैदा हो गया तो लोग भर्ती होना ही छोड़ देंगे। पर राजनैतिक बंदियों को जब मृत्यु दी जाती है, तो सरेआम दी जाती है ताकि लोगों के मन में डर पैदा हो और लोग राज्य का विद्रोह न करे। पर वह केवल डर है, तथ्य तो आप देख ही चुके हैं कि सड़क पर निकलना या धुम्रपान करना राजनीति से हजारों गुणा खतरनाक है।

जि:
लेकिन फिर भी अपनी सुरक्षा का प्रबन्ध करके आन्दोलन करना पड़ा न?

डॉ:
देखिए अगर कोई मारना ही चाहेगा तो सुरक्षा प्रबन्ध किस हद तक बचा पाएगा। जब पूरे देश की सुरक्षा और इनटेलिजेन्स प्रणाली भी इन्दिरा गांधी, राजीव गांधी और जॉन. एफ. केनेडी तक को भी बचा नहीं सकती, तो दूसरों की बात ही क्या है? ऐसी कोई सुरक्षा प्रणाली नहीं होती, केवल हमारे मन के भीतर रहे डर को हटाना पड़ेगा।

जि:
इस डर या खतरा को हटाने का उपाय?

डॉ:
एकता। एकता, सबसे बड़ी चीज है उस डर को भगाने का, खतरा से निपटने का और सफलता भी हासिल करने का।

आप देखेंगे कि अकेले शायद बहुत लोगों को सरकार के विरुद्ध आवाज उठाने में डर लगता है, पर अगर दस हजार लोगों के जुलूस में वे शामिल हो तो वही आदमी जोर-जोर से नारे लगाते हैं, झंडा जलाते हैं, एक पर एक बहादूरी दिखा जाते हैं। तब डर बाँकी नहीं रहता। तब सरकार से खतरा का एहसास भी नहीं रहता, क्योंकि तब सरकार क्या करेगी? जब दस हजार आदमी उठ पडेंगे तो नेपाल सरकार क्या करेगी, सभी को मार देगी? क्या सभी को जेल में डाल देगी? कब तक? तो जब केवल दस हजार आदमी ऐसा कर सकते हैं तो मधेशी तो सवा करोड़ है, बस जरूरत है साथ आने की, साथ खड़े होने की, साथ चलने की। तब किसी से कोई डर भी नहीं होगा और हम अपने मकसद भी आसानी से हासिल कर सकेंगे।

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२२. लोग, समय और पैसा कहाँ?

जि:
पर आदमी है कहाँ आन्दोलन में लगने के लिए?

डॉ:
आदमी हैं, चेतना नहीं है। उसे अभी नाव का छेद दिखाई नहीं दिया है और इसलिए वे सो रहे हैं। उन्हें घर में लगी आग दिखाई नहीं दी है, इसलिए अपने घर में वे मस्त सो रहे हैं। उनको वह नाव का छेद दिखाना होगा, वह आग दिखानी होगी। लोगों को समझाना होगा कि नेपाली राज ही हर जगह नियन्त्रण करता है, और वह उनके जीवन से जुड़े अनुभवों के द्वारा दिखाना होगा। और जब सोए हुए गाँव वालों को मालूम हो जाता है कि उनके घर में या पड़ोस में आग लगी है, तो क्या होता है? तुरन्त सभी जमा हो जाते हैं, और लग जाते हैं आग बुझाने। उसी तरह जब राजनैतिक चेतना आ जाएगी तो लोग अपने आप एकत्रित होने लगेंगे।

और दूसरी बात, यह गिनिए कि आपके साथ कितने आदमी आ गए, यह नहीं कि कौन नहीं आए। यह गिनिए कि कितने आदमी सहमत हो गए, यह मत गिनिए कि कौन सहमत नहीं हुए। कहीं भी सारे आदमी सहमत नहीं होते। भारत के भी आजादी आन्दोलन में बहुत लोग ऐसे थे जो अंग्रेजों के राज कायम रखना ही चाहते थे। तो मतभेद हुए लोग रहेंगे ही, जो लोग जागृत हो गए हैं और आपके साथ हैं, उन्हें लेकर आप आन्दोलन के लिए निकलें, उन पर विश्वास रखिए। गांधीजी ने भी कहा है कि मुट्ठी भर संकल्पवान लोग, जिनकी अपने लक्ष्य में दृढ़ आस्था है, इतिहास की धारा को बदल सकते हैं।

आप ऐसे संकल्पवान लोग, सक्षम लोग, जागृत लोग के साथ चलें जो कठिनाइयों में भी अपनी राह नहीं छोड़ते। ऐसे लोग जब चलने लगते हैं तो हजारों लोग अपने आप पीछे आने लगते हैं। और बहुत लोगों के मन में तो तीव्र इच्छा रहती है निकलने की, पर वे निकलते नहीं; वे खास वक्त के इन्तजार में रहते हैं, वे घर के कोने से छुपकर देखते रहते हैं कि कारवाँ आया कि नहीं, और जैसे ही कारवाँ दिखाई देता है, वे भी शामिल हो जाते हैं। इसलिए वह नेतृत्व आपको देना होगा, लोगों की कमी नहीं होगी, जैसा कि शायर मजरूह सुल्तानपुरी ने कहा है—मै अकेला ही चला था जानिबे मंज़िल मगर, लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया।

इसके साथ-साथ, मधेश से बाहर, काठमांडू या विदेश में बस गए मधेशियों को भी चाहिए कि वे वापस लौट आए। मधेश को आज उनकी सख़्त जरूरत है, वे लोग पढ़े-लिखे सक्षम लोग हैं जिनको मधेश की मिट्टी ने पैदा किया, आज वक्त आ गया है कि वे उस मिट्टी के लिए कुछ करें।

जि:
वे कर ही रहें है न? अमेरिका, यूरोप या काठमांडू में रहकर वे मधेश का उत्थान ही तो कर रहे हैं?

डॉ:
जब नेपालियों का अमेरिका में रहना ब्रेनड्रेन है, तो मधेशियों का काठमांडू में रहना क्या है? जब सक्षम नेपालियों का अमेरिका या विलायत पलायन करने से नेपाल का नुक्सान होता है, तो सक्षम मधेशियों का काठमांडू पलायन करने से मधेश का क्या होता है?

जि:
तो आप मानते हैं कि उनकी वापसी मधेश के हित में है?

डॉ:
हाँ, यही मधेश के और उन लोगों के हित में भी है। जो मधेशी काठमांडू, अमेरिका या यूरोप में रहते हैं, वे अगर मधेश वापस आ जाएँ, तो मधेश का कायापलट रातोंरात हो सकता है। क्योंकि योग्य, समृद्ध, उत्साही और कुछ कर सकने वाले मधेशियों की बहुत बड़ी संख्या काठमांडू में हैं और उनकी वापसी से मधेश में आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, राजनैतिक सारी गतिविधियाँ एकाएक बढ़ जाएँगी, एक तरह से क्रान्ति ही आ जाएगी।

अभी उदाहरण के लिए शिक्षा क्षेत्र ही देखें, पढ़ने वाले मधेशी, पढ़ाने वाले मधेशी, जगह प्रदूषित काठमांडू और मेहनत मजदूरी की सारी कमाई, दूसरों के हाथों में, दूसरों की जगहों पर।

जि:
पर वापस आने के लिए यहाँ अवसर भी तो होना चाहिए?

डॉ:
देखिए, यह एक पुरानी दुविधा है: आदमी नहीं तो अवसर नहीं, अवसर नहीं तो आदमी नहीं। पर उस चक्र को तोड़ने के लिए आदमी को ही पहला कदम उठाना पड़ता है, और थोड़ा धीरज रखना होता है—उसके बाद अवसर और कैरियर तो खुद-व-खुद पीछे-पीछे घूमते हैं।

ऐसी बात नहीं है कि काठमांडू में अवसर या रोजगार की खान है; वहाँ पर अवसर है क्योंकि वहाँ ज्यादा लोग जाते हैं। अगर वे

सारे लोग मधेश में ही ठहर जाएँ, तो वे सारे अवसर, रोजगार, आय और समृद्धि मधेश में ही होंगे।

जैसा कि अगर मधेश के विद्यार्थी एसएससी देकर काठमांडू न भाग जाएँ, तो यहीं पर एक से एक कोचिंग सेन्टर, प्लस-टू और कॉलेज खुलेंगे। ऐसा हुआ तो हमारे शिक्षक, लेक्चरर और प्रोफेसरों को क्यों काठमांडू में माथा रगड़ने पडेंगे?

उसी तरह, अगर मधेशी लोग अपना खेत-खलिहान बेचकर या दुबई-कतार से कमाकर लाए पैसे लेकर काठमांडू में घर बनाने के लिए न जाएँ,

तो उतने में मधेश में घर भी बनेंगे, एक घरेलू उद्योग भी खुलेंगे और मज़दूर तथा बेरोजगारों को काम भी मिलेगा। अगर मधेश के उद्यमी यहीं पर फ़ैक्टरी खोलते हैं, यहीं व्यापार करते हैं तो रोजगार के सारे अवसर यहीं पर रहेंगे।

अगर अच्छे-अच्छे डाक्टर मधेश में ही ठहर जाएँ, तो यहीं अच्छे अस्पताल खुलेंगे, बीमार लोग यहीं पर जाँच कराएंगे, मधेशी

डाक्टरों को अवसर तलाश करने के लिए काठमांडू के नर्सिंग होम क्यों जाने पडेंगे?

अगर लोग पत्र-पत्रिका या किताब छपवाने के लिए काठमांडू न जाएँ, तो एक से एक बेहतरीन प्रेस मधेश में ही खुलते जाएंगे।

अगर हाई लाइफ-स्टाइल वाले मधेशी लोग मधेश में ही ठहरते हैं, तो यहाँ के शहरों में अपने-आप आधुनिक मॉल खुलते जाएंगे, आधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध होती जाएँगी।

यानी पहले डिमान्ड क्रीएट होना चाहिए, उसके लिए मधेशियों को मधेश में ठहरना या वापस आना चाहिए, उसके बाद अवसर और कैरिअर तो अपने आप आएँगे। पर जरा धीरज से काम लेना होगा।

जि:
इतने में तो हमारे जीवन ही गुजर जाएँगे!

डॉ:
सम्भव है, पर सोचिए कम-से-कम आपके बच्चों के जीवन तो सँवर जाएँगे! आपके बच्चों को तो काठमांडू माथा रगड़ने नहीं जाने पड़ेंगे, आप को वृद्धावस्था में ही सही अच्छे अस्पताल की सुविधा मधेश में ही मिल जाएगी, आपके बच्चों को तो काम करने दुबई-कतार नहीं जाने पड़ेगा।

जि:
पर लोग आ भी जाएँ या जो लोग मधेश में हैं वे भी समय कहाँ देते हैं, आन्दोलन के लिए, सामाजिक परिवर्तन के लिए? आखिर हम सब को भी तो अपना काम रहता है, नौकरी रहती है।

डॉ:
कितना काम किजिएगा? अगर आपके शाम का खाना तय है, तो २४ घंटे में ४ घंटे आप मधेश की सेवा, अपने समाज की सेवा में ज़रूर लगाएँ। २४ घंटे में ८ घंटा काम, ८ घंटा आराम और ८ घंटा सेवा होनी ही चाहिए; उस सेवा में ४ घंटा परिवार के लिए और ४ घंटा समाज के लिए। यानि मधेश की सेवा के लिए, २४ में ४ घंटे ज़रूर लगाएँ। अगर आप अपने समय को ८ घंटा काम, ८ घंटा आराम और ८ घंटा सेवा करके नहीं बाँट रहे हैं और दिन रात काम-काम कर रहे हैं तो आपका जीवन सन्तुलित और सार्थक नहीं हो सकता, और जिन्दगी के किसी-न-किसी मोड़ पर आपको इस बात का बहुत पछतावा रहेगा, परन्तु तब आप कुछ करने के काबिल नहीं होंगे। क्योंकि तभी आपके पास पैसा और समय तो पर्याप्त रहेगा, पर स्वास्थ्य और शक्ति नहीं।

अगर शाम के खाने में आपको मुश्किल है तो आप अपने खाना की व्यवस्था में लगें, क्योंकि उस स्थिति में आप अपना जीवन बचाकर ही निश्चित रूप से समाज की सेवा ही कर रहे हैं। आपके लिए वही आन्दोलन का हिस्सा है।

जि:
अभी पहले कैरियर बना लेते हैं, काम कर लेते हैं, खूब पैसा कमा लेते हैं, सेवा के लिए तो उम्र पड़ी ही है न!

डॉ:
क्या आप गारंटी के साथ कह सकते हैं कि कल आप जीवित ही रहेंगे? आप मर-मर के अच्छी तरह खाए-पिए और सोए बिना दिन-रात पैसा कमाकर इकठ्ठा करने में तो लगे हैं, पर क्या आप गारंटी के साथ कह सकते हैं कि उसे भोग करने एक वर्ष बाद आप जीवित ही रहेंगे? इसलिए काम, आराम और सेवा निरन्तर साथ-साथ चलना चाहिए। जो लोग यह कहते हैं कि पहले ये कर लूँ फिर वो करूँगा, पहले एक करोड़ कमा लेता हूँ फिर समाज सेवा करूँगा, वे कभी करते नहीं। वह मानसिकता होती ही ऐसी है।

जि:
तो क्या करूँ, अपनी नौकरी छोड़ दूँ और सेवा में लग जाऊँ?

डॉ:
अगर आपकी अभिरूची और सारे समय सेवा में ही लगाने की इच्छा हो और आप अपना जीवन वहन कर सकते हैं तो। अन्यथा यह जरूरी नहीं कि आप नौकरी छोड़ दें, बल्कि यह जरूरी है कि नौकरी करते हुए भी आप सेवा के लिए नियमित रूप से समय और साधन-स्रोत जुटाते रहें। क्योंकि वही वहनीय अर्थात् सस्टेनेबल योजना हो सकेगी, जो दीर्धकाल तक चल सकेगी।

दूसरी बात, आप जहाँ हैं वहीं से भी सिखिए; जिस सरकारी या गैर-सरकारी कार्यालय में कार्यरत हैं, जिस पार्टी या संघ-संस्था से जुड़े हैं, वहीं भी अपने क्षेत्र के काम को अनुशासित और प्रभावकारी तवर से करने के लिए सिखिए। किसी कम्पनी या फ़ैक्टरी में हैं तो वहीं से फैक्ट्री स्थापना करने और चलाने के लिए सिखिए। क्योंकि आजादी का मतलब केवल झंडा फहराना नहीं होता, हर आयाम में हमें स्वतन्त्र होना पड़ेगा, आत्मनिर्भर बनना पड़ेगा, परतन्त्र नहीं। और उसके लिए

योग्यता और क्षमता विकास करना अत्यावश्यक है, वह आप अपनी वर्तमान नौकरी या व्यवसाय में रहते हुए भी कर सकते हैं। और वहीं से अपने साधन-स्रोत, दक्षता और समय देकर आन्दोलन का हिस्सा बने रहें।

जि:
पर अपना साधन-स्रोत, दक्षता या समय देने के लिए किस लोग या संस्था पर विश्वास करें? यहाँ पर लेने वाले तो हजारों हैं, कोई यह कहकर अर्थ संकलन करता है तो कोई वह, पर अन्तत: जाकर कोई व्यक्ति सब खा जाता है!

डॉ:
आपको किसी पर विश्वास नहीं रह गया है तो भी कोई बात नहीं, आप खुद ही जिम्मेवार होकर अपने साधन-स्रोत का सदुपयोग कर सकते हैं। पैसा दान करने के बदले खुद ही जागृति अभियान के लिए कोई किताब छपवाकर बाँटें, खुद ही किसी साक्षरता अभियान या नेतृत्व विकास की ट्रेनिंग के कार्यक्रमों का आयोजन करें, खुद ही मधेश पर कोई रिसर्च करवाएँ, खुद ही किसी गरीब विद्यार्थी को कॉलेज या स्कूल में दाखिला दिलवा दें आदि।

जि:
सबके पास पैसा तो नहीं होता है। वे किस तरह से मदद करेंगे?

डॉ:
कोई बात नहीं, अगर आपके पास पैसा नहीं पर समय है तो आप समय लगाएँ। यह और भी महत्वपूर्ण है। जाकर किसी टोल या गाँव में मधेश के इतिहास, संस्कृति और स्थिति पर जनजागरण फैलाएँ।

जि:
उस तरह के राजनैतिक कामों में मन नहीं लगता।

डॉ:
महिलाओं को जमा करके पढ़ाएँ। विद्यार्थियों को आवश्यक ट्यूशन ही पढ़ाएँ। किसी वृद्ध की सेवा ही करें। कृषि सम्बन्धी चेतना

फैलाएँ—कीटनाशक, हारमोन या जीएम बीज से क्या हानि होती है, अन्त में किसान किस चक्र-व्यूह में फँस जाते हैं और किस तरह आत्महत्या

करने पर मजबूर हो जाते हैं, यही समझाएँ। स्वास्थ्य और सरसफाई सम्बन्धी चेतना ही फैलाएँ। ऐसे अनेकों सामाजिक कार्य हो सकते हैं, बस एक बार इच्छा प्रगाढ़ हो गई तो कई राहें आपको मिल जाएँगी।

जि:
फिर भी पैसा तो चाहिए न, उन कामों के लिए? पहले पूरे गाँव के लोग जमा होते थे, बात-विचार करते थे, पर आज दस आदमियों को जमा करने जाता हूँ तो बिना भत्ता, फ्री बैग, डायरी और नाश्ता दिए जमा नहीं होते। एनजीओ और सरकारी योजनाओं ने वह हालात खड़ी कर दी है, स्वयंसेवा को भी जागीर बना दी गई है। यहाँ तक कि गाँव के युवाओं को सुबह दौड़ने को कहूँ तो भी कहता कि भैया कितना पैसा मिलेगा, किस प्रोजेक्ट से चल रहा है यह काम? तो उस जगह पर आप बिना पैसे कैसे कोई काम करेंगे?

डॉ:
अगर पैसा देकर ही आपको किसी को सुबह दौड़ाना है तो वह गलत है, आप उसका हिस्सा कदापि मत बनें। क्योंकि आपने देखा कि सरकारी परियोजना या एनजीओ द्वारा पैसा, बैग और भत्ता दे-देकर बैठक करने की रीत बसा देने से हमारी कितनी सामाजिक नुक्सानी हुई है। वह बात एक भयंकर कुरीति बन गई है, जो व्यापक भ्रष्टाचार के रूप में फैल गई है। तो कम-से-कम आप उस तरह की गलत प्रवृत्ति बसाने के कार्य में शामिल न हों।

और उस तरह की गलत प्रवृत्ति को हमें ही परिवर्तन करना होगा। और वह उसीको मानकर नहीं, बल्कि निस्वार्थ रूप से काम करके ही बदला जा सकता है, उसके लिए कोई जादू की छड़ी नहीं है। जो स्वयंसेवा की भावना बिलकुल ग़ायब हो गई है, उसे हम स्वयंसेवा करके ही पुन: वापस ला सकते हैं।

जि:
पर आन्दोलन करने के लिए पैसा तो चाहिए ही न, वह कहाँ से लाएँगे?

डॉ:
हमारे दिमाग आज इस तरह से भ्रष्ट कर दिया गया है कि आन्दोलन को भी हम नौकरी मान बैठते हैं कि कोई पैसा देगा, काम देगा, तब हम करेंगे और उसके बदले में हमें आर्थिक लाभ होता रहेगा आदि।

अगर सफल हो चुके आन्दोलन भी दूसरों से पैसा लेने के अभियोग में बदनाम हो जाते हैं, तो हम बाहर से पैसा आने की अपेक्षा क्यों कर रहे हैं? हम यह आश क्यों लगा रहे हैं कि कहीं ऊपर से पैसा टपकेगा और तब हम आन्दोलन करेंगे?

आन्दोलन में सदैव पैसा की कठिनाइयाँ रहती ही है, इसलिए वह आन्दोलन है, नहीं तो वह INGO का एक प्रोजेक्ट होता या किसी कम्पनी की नौकरी होती।

पैसा की कमी किस आन्दोलन में नहीं हुई? किस आन्दोलन में पैसा प्रचुर उपलब्ध था, रखा हुआ था? भारत का आजादी आन्दोलन देखिए या नेपाल के ही राणा-शासन विरुद्ध के आन्दोलन देखिए, या माओवादी आन्दोलन देखिए। पैसा की कमी तो राजा-महाराजाओं को भी रहती है, सुपरपावर देश अमेरिका को भी है, और उसे भी एक पर एक जुगाड़ करते रहना पड़ता है, तो हमारे लिए यह कौन सी अनोखी समस्या है? आज भी अमेरिका में राष्ट्रपति उम्मीदवार खड़े होते हैं तो उन्हें भी चंदा बटोरना पड़ता है; आज भारत में ही बीजेपी या कांग्रेस ने प्रधानमंत्री के उम्मीदवार खड़े किए हैं तो उनके लिए भी बड़े-बड़े फंड रेजिंग कार्यक्रम हो रहे हैं, तो यह समस्या केवल हमें है ऐसी बात नहीं है।

बस हमारी सोच बुलंद होनी चाहिए, हिम्मत रखनी चाहिए, कोशिस करने पर आर्थिक कमी भी पूरी होती जाएगी। मधेश तो पूरे नेपाली राज को खिलाता रहा है, तो उसे अपनी ही आजादी के लिए साधन-स्रोत नहीं जुटेंगे? अभी कोई मधेशी आन्दोलन के लिए पैसा नहीं दे रहा है तो निराश होने की कोई बात नहीं है। जिस दिन मधेशियों को मालूम हो जाएगा कि वे जिस नाव पर मझधार में बैठे हैं उसमें छेद हो गया है और नाव में पानी भरना शुरु हो गया है, तो वे अपने सोने के थाल भी निकालकर देंगे, उस छेद को बन्द करने के लिए। सोने के थाल ही नहीं, अपनी कमर की डोर भी आपको खोलकर दे देंगे, पर उसके लिए वह नाव का छेद उन्हें दिखाना जरूरी है, उनमें चेतना आना आवश्यक है, उनमें जागृति आवश्यक है।

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२३. नंगों के देश में धोबी!

जि:
जब मधेश में जागरण ही नहीं है, तो वहाँ पर आप अभी क्या करेंगे? नंगों के देश में धोबी का क्या काम?

डॉ:
नंगों के देश में धोबी के लिए ज्यादा काम है, क्योंकि वहाँ है आमूल परिवर्तन करने का सुनहरा मौका। वहाँ पहले आप लोगों को कपड़ा पहनना सिखा सकते हैं, और तब धोबी के लिए काम ही काम। लीडर का काम ही वही होता है, जहाँ कोई पहुँचा नहीं है, वहाँ के लिए वह भिजन देता है, वहाँ स्थिति पैदा करता है, साधन-स्रोत जमा करता है और लक्ष्य हासिल करता है।

क्योंकि मधेश में आज जागरण नहीं है इसलिए वहाँ सच्चे नेतृत्व और कार्यकर्ताओं की ज्यादा जरूरत है। अगर वे खुद पढ़ सकते, खुद जान सकते, खुद नेपाली राज के षड्यन्त्र को पहचान सकते, तो आज अन्धकार की यह स्थिति आती ही क्यों? इसलिए यह हमारे लिए सुनहरा मौका है कि हम वहाँ एक दीपक जलाकर जाएँ।

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२४. आशाएँ, आलोचना और प्रतिरोध

जि:
पर राजनैतिक काम में लगने से लोग अच्छी नजर से देखते नहीं। राजनीति मतलब झूठ बोलना, शराब पीना, मार पीट करना, गुंडा पालना, ठेका-पट्टा में धांधली करना, घूसखोरी और भ्रष्टाचार करना—ऐसे कामों के रूप में राजनीति को माना जाता है, साफ-सुथरे लोगों का काम नहीं। इस बीच में हम कुछ अच्छा करने भी जाते हैं, अपना सब कुछ छोड़कर निस्वार्थ भाव से समाज की सेवा में लग भी जाते हैं, तो लोग कुछ न कुछ आरोप लगाते ही रहते हैं। कोई अच्छा थोड़े ही कहता है? कहता है पैसा कमाने के लिए लगा, पद लालच से लगा या कोई काम नहीं है इसलिए गफ हाँकते फिर रहा है, और वह सब भी कुछ नहीं चलने पर कहता है कि दिमाग ही गड़बड़ हो गया है। तो ऐसे में साफ-सुथरे आदमी राजनीति में कैसे लगें?

डॉ:
देखिए अगर कचरा को साफ करना है तो उससे मुहँ मोड़ नहीं सकते, उसमें हाथ डालना ही पड़ेगा और हाथ तो गंदा होगा ही।

पर आप सच्चे मन से समाज के उत्थान में लगे हैं तो आपको इन सब आलोचनाओं की परवाह करने की जरूरत नहीं है। आपको परवाह होगी भी नहीं, जब आपके पास निस्वार्थ भाव रहेगा, क्योंकि लोग भले समझे-न-समझे, आपको तो कम-से-कम मालूम रहेगा कि आप निस्वार्थ भाव से समाज सेवा में लगे हैं।

और इस दुनियाँ में किसकी आलोचना नहीं हुई? मर्यादापुरुषोत्तम राम पर भी अनेकों लांछनाएँ लगीं, कृष्ण को भी सैकड़ों बार उनके मुहँ पर ही लोगों ने गालियाँ दीं, बुद्ध को लोग भँडुवा कहके गाली देते थे और क्राइष्ट को तो शूली पर ही लटकाया गया। तो यहाँ छोड़ा किसको? गांधी, मंडेला और दलाई लामा, सबके आलोचक हैं, उनके नाम पर आलोचना की कई किताबें छपी हुई हैं। वी. पी. कोइराला हो या मनमोहन अधिकारी, गजेन्द्र बाबू हो या रामराजा प्रसाद सिंह, सभी की खिंचाई होती है, तो आलोचना से डरकर वे राजनीति छोड़ देते?

जहाँ एक ओर बाइबल, कुरान और गीता को पवित्र ग्रन्थ कहा जाता है, ईश्वर के ही मुखारविन्दु से निकले शब्द माने जाते हैं, वहीं उन पर लाखों कमेन्ट किए जाते हैं, मज़ाक उड़ाया जाता है, उनकी प्रतियाँ जलाई जाती है, तो दूसरों के कमेन्ट से हम क्यों डरें?

आपने एक कहानी सुनी होगी। एक बार एक धोबी का गधा कुएँ में गिर जाता है। उससे चिढ़े हुए मुहल्ले के लोग उसे कुएँ में ही मिट्टी डालकर ढक देने की बात सोचते हैं। उसको ढकने के लिए लोग ऊपर से कुएँ में गधे पर कूड़ा-करकट गिराने लगते हैं। पर जैसे कूड़ा-करकट गधे के शरीर पर गिरता है, वह उसे झाड़ लेता है। झड़े हुए कूड़ा-करकट से सतह ऊँची होती जाती है, और गधा उस पर पैर रखके ऊपर की ओर निकलते जाता है। अन्तत: गधा उसी कूड़ा-करकट की सतह पर पैर टेकते हुए बाहर निकलने में सफल होता है।

उसी तरह अगर आप पर कोई कूड़ा-करकट फेंकता है, आपकी आलोचना करता है, तो आप उस आलोचना को झाड़ लिजिए और उसको उल्टा ऊपर बढ़ने का सहारा बनाइए।

जि:
फिर भी आलोचना होने पर दिल तो दुखता है न?

डॉ:
देखिए कहा जाता है अगर आप की आलोचना नहीं हो रही है, इसका मतलब है आप ज्यादा कुछ कर नहीं रहे हैं। आप उस हिसाब से सोचिए, उतना बुरा नहीं लगेगा।

जि:
कई लोग तो कहते हैं कि मैं इन्जिनियर हूँ तो मुझे राजनीति से क्या लेना देना? मैं अपना काम करूँ, उसीमें अच्छा करूँ।

डॉ:
देखिए, नितिश कुमार भी इन्जिनियर है, केजरीवाल भी इन्जिनियर ही है, ऐसे लोगों ने भी अगर एक स्टील कम्पनी में ही काम करने की ठान ली होती, तो ऐसे चमत्कारिक दिन आज देखने को नहीं मिला होता। चीन के ९ शीर्ष सरकारी अधिकारियों में ८ इन्जिनियर या वैज्ञानिक हैं, और लगभग वही अनुपात चीन के अन्य सरकारी संरचनाओं में भी देखने को मिलता है। चीन के राष्ट्रपति हु जिंताओ हाइड्रोलिक इन्जिनियर हैं, प्रधानमंत्री वेन जिआबो भी जिओमेकानिकल इन्जिनियर हैं।1

अगर आपकी पृष्ठभूमि इंजिनियर, डाक्टर, वकील, चार्टर एकाउन्टेन्ट, लेक्चरर, शिक्षक या कोई टेक्निकल क्षेत्र है, तो यह अच्छी ही बात है, क्योंकि अपनी शिक्षा को पूरा करने के दौरान या अपने कार्य सम्पादन करने के दौरान आपने बहुत सारी महत्वपूर्ण दक्षताएँ हासिल की होगीं, जो राजनैतिक संगठन चलाने या राज्य संचालन के दौरान भी उपयोगी साबित होती हैं। ऐसे प्रोफेशनल लोग केवल बातें नहीं बनाते, काम करने-करवाने के आदी भी होते हैं, और यह अच्छी बात है।

जि:
मानिए मैं मेकानिकल इन्जिनियर हूँ, तो इससे राजनैतिक आन्दोलन चलाने में कैसे उपयोगी होगा?

डॉ:
मेकानिकल इन्जिनियर होने से आप केवल पाटपूर्जा ठीक करना ही नहीं जानते, बल्कि रिपोर्ट तैयार करने, अपनी टीम का नेतृत्व करने, काम समय पर करवाने और प्लानिंग करने जैसे बहुत सारी बातें आप करते रहते हैं। उसी तरह अगर कोई डाक्टर है, तो इसका मतलब खाली सर्जरी करने या बीमारी जाँच करने की ही कला उसके पास नहीं होती, उसके पास लोगों से जुड़ने की, उनकी बातें समझने की, उन्हें समझाने की, सर्जरी के लिए सब-कुछ ठीक-ठाक तैयार और दुरुस्त रखने की कला भी होती है। आप अगर अपनी जिम्मेवारी वहाँ पर अच्छे ढंग से निभा रहे हैं, तो बहुत सम्भव है कि राजनैतिक क्षेत्र में भी आप अपनी जिम्मेवारी को उतने ही साफ-सुथरे तरीके से निभाने में कामयाब होंगे।

जि:
अच्छा। परन्तु समाज के उत्थान या राजनीति में लगे रहने पर भी, कई बार लोग चिढ़ाते रहते हैं कि क्या किया, कुछ उपलब्धि तो नहीं, तो मन करता है अभी जाकर कुछ कर दूँ!

डॉ:
देखिए, आजादी आन्दोलन कोई फैशन शो नहीं होता कि आप स्पोट-लाईट में रहकर रैम्प-वाक दिखाते रहें। यह लोगों को भी समझना चाहिए और आप को भी। आप अपना काम करते रहिए, बाहर में जानकारी देना या न देना, यह आपकी रणनीति और योजना पर निर्भर करता है। तो जरूरी नहीं है कि हर दिन आप फेशबुक पर पोस्ट करते रहे कि आपने ये किया या वो किया, या मीडिया में छाए रहे कि आप बहुत कुछ कर रहे हैं।

दूसरी बात, अगर कोई आपको उकसाता या चिढ़ाता है, तो उनके प्रयोजन को पहले पहचानिए। उकसाने या चिढ़ाने या चुनौती देने का काम लोग अनेकों प्रयोजन के खातिर करते हैं। उन्हें पहचानकर उसी अनुरूप सावधानी अपनाएँ। क्योंकि उकसाने के पिछे खतरनाक मकसद भी हो सकता है। आपकी योजनाओं का भंडाफोर करके उसके विषय में आपसे जानकारी ले लेना, आपको दूसरी ओर व्यस्त रखकर या झुकाकर आपके समय और योजना को नष्ट करना, आपको उकसाकर आपसे विवादास्पद अभिव्यक्ति लेना या आपकी योजना से बाहर कोई काम करने पर मजबूर करना, आपको बदनाम करना, आपकी चरित्र-हत्या करना—ऐसे कई प्रयोजन हो सकते हैं। इसलिए किसी के द्वारा उकसाने या चुनौती देने पर, सावधानी से सोचें, उनके वश में न आएँ।

और, कुछ लोग होते हैं जो दूसरों को आग में कुदने के लिए उकसाते रहते हैं पर खुद दूर रहते हैं। ऐसे लोग खुद तो कुछ जिम्मेवारी लेते नहीं पर दूसरों को गाली देते रहते हैं कि क्या किया। अपना कुछ समय देना नहीं चाहते पर पुछते हैं कि कब होगा। अपने साधन-स्रोत नहीं लगाते और हिसाब माँगते रहते हैं। अपनी प्रतिबद्धता नहीं दिखाते और खाली कहते है ये होना चाहिए, वो होना चाहिए। इन लोगों की बातों में पड़ने की जरूरत नहीं है, बल्कि आप अपनी योजना के मुताबिक काम करें। प्रोएक्टीव होकर चलें, रिएक्टिव होकर नहीं।

जि:
मतलब, ऐसे लोग मिलने पर बस इग्‍नोर कर दें?

डॉ:
पूरे इग्‍नोर तो नहीं, ऐसे लोग मिलने पर उन्हें भी आगे आने के लिए बोलें, उन्हें भी जिम्मेवारी वहन करने के लिए बोलें, और कोई कार्यभार सौंपें। अगर वे केवल बात बनाने वाले और खींचतान करने वाले लोगों में से हैं, तो वे दोबारा शायद दिखाई नहीं देंगे। अगर उनमें कुछ लगन है तो वे भी आन्दोलन का हिस्सा बन जाएँगे और सवाल करने वाले पक्ष में नहीं रह जाएँगे।

1. यह सन् २०११ के डेटा है। चीन के वर्तमान राष्ट्रपति शी जिनपिंग केमिकल इन्जिनियर हैं।
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२५. सामाजिक असहजता

जि:
एक और बात, डाक्टर साहब। मेरे बहुत सारे दोस्त नेपाली/पहाड़ी हैं। वे लोग मेरी बहुत इज्जत करते हैं। उनके आगे मैं मधेश और मधेशी के लिए आवाज उठाने के लिए झिझकता रहता हूँ, बड़ी असहजता महसूस होती है।

डॉ:
देखिए अगर आप सत्य के साथ हैं तो आपको कभी भी हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए, बल्कि गौरव महसूस होना चाहिए कि आप सत्य का पक्ष लेकर खड़े हैं। हाँ, पर इसका मतलब ये नहीं है कि आप नेपाली मित्रों या लोगों से नफरत करने लगें, बल्कि उनके लिए आदर बनाए रखें। आखिर कौरव पक्ष में लड़ने पर भी भीष्म पितामह के लिए पाण्डवों के मन में घृणा तो नहीं थी। आखिर मामला मुद्दा का है, प्रवृत्ति का है, व्यक्तियों का नहीं, और हर कोई अपना धर्म निर्वाह कर रहा है। इसलिए इस बात का ध्यान रहे कि अपने अधिकार और आजादी पाने के दौरान नेपाली लोगों के साथ भी आपसे कोई अन्याय न हो।

सत्य का पक्षधर होने पर खास बात यह होती है कि आप अपने नेपाली मित्रों को भी उसमें साथ देने के लिए बेझिझक कह सकते हैं।

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२६. भारत का भूत!

जि:
क्या भारत साथ देगा? सदैव सुनता आया हूँ कि भारत स्वतन्त्र मधेश नहीं होने देगा। भारत तो सदैव नेपाली शासकों का साथ देता रहा है और मधेशियों को उनके अन्दर रहने के लिए मजबूर करता आया है।

डॉ:
क्या कोई दूसरा देश निर्णय करेगा मधेशियों का भविष्य? क्या कोई दूसरा देश मधेशियों को कहेगा कि तुम सब गुलाम बने रहो और मधेशी गुलाम बने रहेंगे? क्या दूसरा देश कहेगा कि मधेशी अपनी माँ-बहन को नेपाली सेना को देते रहें तो मधेशी देते रहेंगे? भारत कौन होता है मधेशियों का भविष्य निर्धारण करने वाला?

मधेशी खुद अपना भविष्य बनाएँगे। जनता से बढ़कर दुनियाँ में कोई ताकत नहीं होती, यह इतिहास ने बार-बार दिखाया है। रावण पैदा होते हैं, कंश पैदा होते हैं, नेपोलियन और हिटलर पैदा होते हैं, कुछ क्षण के लिए लगता है जनता कभी जीत नहीं पाएगी। पर

तानाशाह चाहे कितने भी बलवान क्यों न हो, साम्राज्य कितने भी ताक़तवर क्यों न हो, अन्त में ढ़लता जरूर है। इतिहास गवाह है, सदा सत्य की विजय हुई है। मधेशी के खिलाफ पूरे विश्व के सुपरपावर भी लग जाएँगे, तो भी जीत अन्तत: मधेशियों की ही होगी क्योंकि मधेशी सत्य के लिए लड़ रहे हैं, अपनी आजादी के लिए लड़ रहे हैं।

और रही बात भारत की, तो भारत तो एक एयरपोर्ट तक ठीक ढंग से चला नहीं पाता, अपने कश्मीर में भी कई बार भारतीय झंडा तक लहरा नहीं सकता, चीनी सेना उसके सीमा के भीतर मीलों घुसकर चुनौती दे देती है और वह कुछ बोल नहीं पाता, वह मधेशियों को क्या निर्देश देगा? यह तो मधेशी नेता लोग खुद है कि भारत को अपने सर पर बिठाकर रखते आए हैं और ढो रहे हैं।

पर भारत का डर मुख्य रूप से केवल नेपाली शासकों द्वारा फैलाया गया प्रोपागाण्डा है। जिस तरह से फिल्मी डायलॉग होते हैं न कि ‘सो जा बेटा, नहीं तो गब्बर आ जाएगा’ उसी तरह के डायलॉग हैं ये। यह डायलॉग नेपाली शासक, कभी कभी मधेशी बुद्धिजीवियों के मुँह के जरिए भी, इस्तेमाल करते रहते हैं, मधेशियों को सुलाने के लिए, मधेशियों को गुलामी में रखने के लिए। क्योंकि वे जानते हैं जिस दिन मधेशी लोग जाग जाएँगे, उस दिन नेपाल और भारत के शासकों का कुछ चलने वाला नहीं है।

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२७. फूट डालो, राज करो

जि:
अच्छा। मधेशियों को गुलाम बनाए रखने के लिए और किस तरह के चाल चलते हैं नेपाली शासक?

डॉ:
‘डिभायड एंड रूल’ यानि ‘फूट डालो और राज करो’—यह बहुत ही पुरानी और प्रभावकारी रणनीति रही है, शासकों के लिए। और मधेशियों पर राज करने के लिए नेपाली शासक इसे बार-बार उपयोग करते रहते हैं। कभी किसी को मिथिला राज्य के नाम पर उछाल देते हैं, तो कभी किसी को थरूहट के नाम पर।

और यह विभाजन भी नेपाली मीडिया, टीवी चैनल, पत्र-पत्रिकाओं और बुद्धिजीवियों द्वारा फैलाया गया प्रोपागाण्डा है। बहुत ही कम गिने-चुने थारू नेता हैं जो नेपाली शासकवर्ग की बातों पर झुकाव डाले हुए हैं, पर उन्हें मीडिया में जगह दी जाती है, उनसे व्यापक प्रचार-प्रसार कराया जाता है। पर धीरे-धीरे ही सही, उन थारू नेताओं को भी यह बात अब साफ ही हो गई है। जिस समय अखण्ड सुदूरपश्चिम आन्दोलन हुआ, उन नेताओं को समझ में आ गया कि मामला क्या है। थारू लोगों पर हप्तों तक जिस तरह से नेपाली लोग, पुलिस और प्रशासन के आड़ पर, आक्रमण करते रहे, जिस तरह से नेपाली मीडिया और मानवअधिकार संस्थाएँ थारुओं पर होते रहे आक्रमणों को अनदेखा करती रहीं, जिस तरह से थारू संग्रहालय में आग लगा दी गई, जिस तरह से थारू नेताओं को अस्पताल में घूसकर नेपाली पुलिस ने पिटाई की, उससे उन्हें बहुत कुछ ज्ञात हो गया। थारू लोग बहुत हद तक ये भूल गए थे कि उनकी जमीन छीनकर उन्हें अपनी ही भूमि पर कमैया, कमलरी और दास बनाने वाले वही नेपाली लोग थे, पर उस घटना ने उन्हें बहुत कुछ समझा दिया।

जि:
पर शासकवर्ग थारू को मधेशियों से अलग साबित करने की कोशिस करते हैं, उसका क्या?

डॉ:
देखिए सत्य को भला कौन मिटा सकता है? थारू लोग सदैव मधेश के गौरवशाली सपूत रहे हैं। किसी के कहने से क्या होता है? कहने के लिए तो कोई मुझे ककशियन (गोरा यूरोपियन) कह देगा, तो क्या मैं ककशियन हो जाऊँगा? जो सच है, वह है।

थारुओं की उत्पत्ति की बात करते हैं तो थारू विद्वानों ने अनेक सिद्धान्त दिए हैं। थारू लोग स्वयं को इक्ष्वाकु वंश के होने की बात मानते हैं, अर्थात् थारू लोग मध्यदेश के राजा ओकाका और ओकाकामुखा के वंशज होने का दावा करते हैं। वे बुद्ध और सम्राट अशोक को थारुओं की संतान मानते हैं। अब बुद्ध खुद अपना जन्म ‘मज्झिमदेश’ अर्थात् मधेश में होने की बात बताते हैं, और अशोक मगधदेश का सम्राट ठहरे। तो उस हिसाब से तो थारू मधेशी हो ही गए। उसी तरह कुछ विद्वान थारुओं की उत्पत्ति ‘थार’ मरूभूमि या राजस्थान से होने की बात करते हैं, जो कि बृहत् मध्यदेश में ही आते हैं। इस तरह से हर सिद्धान्त के अनुसार थारुओं की उत्पत्ति मध्यदेश अर्थात् मधेश से जुड़ी है, तो वे मधेशी कैसे नहीं हुए? भौगोलिक रूप में वे मधेश में रहते आए हैं, नेपाल में तो पिछले १५०–२०० वर्ष पहले न आए? आखिर बाँके, बर्दिया, कैलाली और कंचनपुर जिले तो १५० वर्ष पहले तक भी अवध के अधीन में ही थे। तो भौगोलिक आधार पर भी वे मधेशी ही हुए। उनकी भाषा मध्यदेशीय भाषा मैथिली, भोजपुरी, अवधि आदि के समीप है। उनके पर्व-त्यौहारों में जितिया, सामाचकेवा, माघी (नेमान), डिहिबारपूजा और होरी जैसे पर्व आते हैं। उनके पहनावे में धोती या साड़ी-ब्लाउज आते हैं। उनके गर-गहने में हसुली और पाइठ जैसी चीजें आती हैं। उनके खानपान में भूसवा, बगिया और घोंघी जैसे अनुपम मधेशी परिकार आते हैं। उनकी कला संस्कृति में मोख, माइट, चका, फुल-बुट्टा, कोठी, जबरा आदि आते हैं। तो हर हिसाब से—ऐतिहासिक, भौगोलिक, भाषिक, सांस्कृतिक (घर, पहनावा, खाना-पीना, रहनसहन, गर-गहना, पर्व-त्यौहार) आधार पर—वे मधेशी ही हुए न? आज नेपालियों की गुलामी करने की मानसिकता वाले कुछ एनजीओकर्मिओं के कहने से क्या होता है? इतिहास के पन्ने पलटाकर देखिए, थारू लोग मधेश के लिए अपनी जान निछावर करते आए हैं, अपना खून देते आए हैं।

मैं तो बस यही कहुँगा, थारू के विषय में हो या अन्य किसी के विषय में, नेपाली शासक या उनके पुतला बने एक-दो लोगों की बातों से हमें नहीं बहकना चाहिए, आखिर रामवरण यादव जैसे लोग हर जगह, हर समुदाय में निकलते रहेंगे। हमें नेपाली शासकों की ‘फूट डालो और राज करो’ नीति को पहचान करके सावधान रहना चाहिए।

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२८. बक्से में बंद सोच

जि:
आपने रामवरण यादव जैसे लोगों की मानसिकता की बात की। आखिर ऐसा क्यों होता है? ऐसे लोग क्यों नहीं सोच पाते?

डॉ:
ऐसी मानसिकता निर्माण करने के लिए हमारी शिक्षा ही जिम्मेवार है। अपने स्वार्थ पूरा करने के लिए नेपाली शासक हमें स्कूल में ऐसी-ऐसी चीजें रटा देते हैं कि हम उससे बाहर होकर कभी सोचते ही नहीं हैं। बस हमारी सोच एक बक्से के अन्दर कैद रह जाती है। हम कोई सवाल नहीं करते। हमें रटा दिया जाता है कि ‘हामी नेपाली’ और हम कभी सवाल नहीं करते कि हमारा राष्ट्र, इतिहास, भू-भाग, भाषा, संस्कृति और वेषभूषा सभी अलग, फिर हमारी राष्ट्रीयता कैसे नेपाली? नेपाल के लिए बन्दुक उठाकर सीमा पर मरने जाओ तो ठीक, मधेश की रक्षा करो तो गलत! ऐसी ग़लतफहमी डाल दी जाती हैं हमारे अन्दर।

हम शासकों की मूल्य-मान्यताएँ और नियम-कानून अन्धे होकर गले लगाते रहते हैं। स्कूल में शासकवर्ग हमें ईंट बनाकर ढालते हैं, पकाते हैं, ताकि उन्हें जोड़कर वे अपना आलीशान बंगला बना सके। हम बस रोबोट बनकर रह जाते हैं, शासकों के हाथों का पुतला। यही कारण है कि रामवरण यादव प्रवृत्ति मधेशियों में दिखाई देती है।

सच तो ये है कि हम नेपाली हैं ही नहीं। हम वर्तमान में नेपाली साम्राज्य के नागरिक जरूर हैं जिस तरह विलायती राज में भारतीय लोग विलायती साम्राज्य के नागरिक थे, पर नेपाली हमारी राष्ट्रीयता नहीं। मधेश हमारा राष्ट्र है और मधेशी हमारी राष्ट्रीयता। यह हमें समझना होगा, खुद सीखना होगा और लोगों को भी सीखाना होगा।

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२९. सीखते भी कहाँ हैं?

जि:
पर सीखते भी कहाँ हैं?

डॉ:
सच कहा आपने। जब तक लोगों में इच्छा न हो, आप किसी को कुछ सीखा नहीं सकते। ऐसे लोगों के पास अक्सर ‘मैं ही जानता हूँ’ या ‘मैं पहले से ही जानता हूँ’ या ‘मैं ज्यादा जानता हूँ’ या ‘मैं जो जानता हूँ, वही सच है’ तरह की सोच होती है। ऐसे लोगों से बहस करना बेकार होगा। उनमें पहले प्रेरणा जगाएँ, उनको आवश्यकता अनुभव कराएँ, उनमें इच्छा जगाएँ। उन्हें खुद भी अनुभव करने दें। जब उन्हें आवश्यकता महसूस हो जाएगी, तब वे खुद आपके पास दौड़ते आएँगे, कौतुहलता से सवाल करने आएँगे।

जि:
तो क्या जो लोग सवाल करते हैं, वे सीख सकते हैं?

डॉ:
सवाल भी आदमी बहुत प्रयोजनों से करते हैं, उसे पहले पहचानें।

जानने के लिए कर रहे हैं, या जानकर बहस करने के लिए कर रहे हैं,

या आपको नीचा दिखाने के लिए कर रहे हैं, या अपने-आपको ओवर-स्मार्ट दिखाने के लिए कर रहे हैं, उसे पहचानें और उसी हिसाब से बर्ताव करें। सचमुच जानने के लिए कर रहे हैं तो जवाब देने पर लाभ होगा, अन्यथा उनसे उलझेंगे तो आप ही उल्टे उनके जाल में फँस जाएँगे।

जि:
और समझाने के क्रम में कई बार तो लोग बहुत ही अनादरतापूर्ण व्यवहार करते हैं। उसका क्या?

डॉ:
हाँ, उसके लिए पहले अपना लक्षित समूह देख लें, लोगों के मन में पहले आदर पैदा करें। उन पर प्रभावित करने के तरीके देखें। उपयुक्त लोगों के साथ-साथ अवसर, समय और स्थान को भी देखें। आप बस पर चढ़ते-उतरते समय खलासी को या किसी कम्पनी के विजनेश मीटिंग में किसी उद्योगपति को कहेंगे कि मैं मधेश राष्ट्र की आजादी के लिए काम करता हूँ, तो अभी वहाँ आपको क्या जवाब मिल सकता है?

जि:
पर एक ही संगठन के अन्दर भी ऐसे होते रहते हैं। हमारे यहाँ जिम्मेवारी लेने के संस्कार का अभाव है, लोग खाली एक-दूसरों पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते रहते हैं। अपना अधिकार क्षेत्र भी नहीं समझते। सभी लोग दूसरों को सुझाव देने में ही लगे रहते हैं। एक टाइपिस्ट एकाउन्टेन्ट के कामों में दख़लअंदाज़ी देता है, एक ड्राइभर प्रोफेशनल कैमरामैन को सिखाने लग जाता है और कैमरामैन ड्राइभर को, ऐसा लगता है सभी लोग हर चीज के एक्सपर्ट हैं, पर वैसे रहते नहीं। उन परिस्थितियों से कैसे निपटा जाए?

डॉ:
देखिए, हमारे समाज का स्तर अभी वही है। ऐसे में धीरज से काम लिजिए। जैसे हमारे आर्थिक-सामाजिक स्तर बढ़ता जाएगा, इन व्यवहार और बर्तावों में लोग उतने ही परिष्कृत और व्यवसायिक बनते जाएँगे। अभी के लिए अगर कोई आपको सुझाव देता है या आलोचना करता है, तो चुप-चाप सुन लें। उसे सकारात्मक भाव से देखें कि वह आपके लिए इतना तो मतलब रखता है।

जि:
पर यहाँ कोई किसी से कम नहीं होता, कोई किसी की बात नहीं मानता, जो जहाँ है वहीं पर गुमान से भरा रहता है, ऐसे में कोई योजना कैसे सफल होगी?

डॉ:
लोगों को सोचना चाहिए कि वे एक मिशन के तहत काम कर रहे हैं और काम छोटा-बड़ा नहीं होता, सब की अपनी अहमियत है। आप किसी व्यक्ति का नहीं, पद के आदेश को मान रहे हैं। आपको अगर कोई आदेश या काम करने का निर्देश दे रहा है, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह आप पर रौब जमा रहा है बल्कि इस तरह से सोचें कि कार्य-योजना उस तरह से माँग कर रही है।

लेकिन हम ऐसे ही हैं, यह बात नहीं है। वही मधेशी लोग अगर किसी नेपाली अफ़सर या मालिक के नीचे काम करते हैं, तब क्या होता है? तब कोई निर्णय खुद नहीं ले सकते। यहाँ तक कि तब अपने नीचे के प्यून से भी पूछ-पूछ कर चलते हैं। क्यों?

बहुत हद तक इसके लिए मधेशियों की दासता की मानसिकता जिम्मेवार है। मधेशी चाहे कितने बड़े हो, वह शासित या दास समूह के होने की बात शासकवर्ग ही नहीं, खुद मधेशी भी मानते हैं। इसलिए मधेशी अगर बड़ा अफ़सर भी हो, तो उनके मातहत के मधेशी कर्मचारी उन्हें अवज्ञा करते रहते हैं पर नेपाली शासकवर्ग के प्यून से भी पूछ-पूछ कर चलते हैं।

इसके लिए मधेशियों को अपना आत्मसम्मान वापस हासिल करना होगा। गुलामी की मानसिकता को दूर करना होगा, और वह आजादी आन्दोलन के जरिए, स्वराज के जरिए ही किया जा सकता है।

जि:
बहुत सारे लोग रूखे स्वभाव और बोली प्रदर्शन करते हैं। कोई बुद्धिजीवी या अग्रज नागरिक को भी मुहँ पर ही उलटा-सीधा जवाब देते हैं, गालीगलौच पर ही उतर आते हैं। उसका क्या?

डॉ:
ये बहुत हद तक अनुशासन का अभाव है, और यह विकृति हमारी संस्कृति बनती जा रही है, जो चिन्ताजनक है। पर यह शिक्षा के माध्यम से धीरे-धीरे हटाया जा सकता है। आप देखेंगे कि शिक्षित समाज में चुनाव के दो कट्टर प्रतिद्वन्द्वी भी एक-दूसरे से सभ्यता से बात करते हैं, मित्रतापूर्ण व्यवहार रखते हैं। पर उस स्थिति में हम सब इस तरह से बर्ताव करते हैं मानो आज के बाद उनसे हमारा कुछ लेना-देना ही नहीं रहेगा। दो सगे भाई भी अगर अलग पार्टियों के हो जाते हैं तो और जमकर खिंचाई होती है, मामला मारपीट तक पहुँच जाता है। यह सब धीरे-धीरे सुधार होगा। हम अपने प्रतिद्वंद्वियों से भी आदरपूर्ण व्यवहार करें, मित्रतापूर्वक बात करें, द्वन्द्व अपनी जगह है। याद रखें, सभी लोग अपने-अपने कर्त्तव्य कर रहे हैं; अगर भीष्म ने कौरव का पक्ष ही लिया है तो उनकी भी अपनी मजबूरी है, उसके लिए अर्जुन या कृष्ण भीष्म को गाली दें, यह कदाचित उपयुक्त नहीं है।

जि:
पर लोग दूसरे नेताओं पर रहे क्रोध हम सब पर उतार देते हैं। जिसके लिए हम जिम्मेवार भी नहीं है, उसके लिए हमें शिकार बनाया जाता है। ऐसे में क्या करें?

डॉ:
विगत के अनुभवों से देखेंगे तो बहुत सम्भव है कि उनका गुस्सा जायज़ है।

आपने तो सुना होगा कि चोट खाए कुत्ते बिजली चमकने पर भी भौंकते हैं।

उन पर सहानुभूति रखें। उनका दृष्टिकोण समझते हुए उनकी देन की तारीफ करें, उनका क्रोध जायज होने की बात बताते हुए शान्त होने पर ही अपनी बात रखें। उनसे सीधे ना उलझें।

जि:
पर लोग विश्वास भी तो नहीं करते हैं!

डॉ:
ठीक वही बात इसमें भी लागू होती है। मधेशी लोग इतनी बार धोखा खा चुके हैं कि विश्वास करना तो उन्हें कठिन होगा ही। मधेशी लोग बार-बार आन्दोलन करते रहे हैं, बार-बार बलिदानी देते रहे हैं, उन्हें बार-बार कहा गया कि उन्हें अधिकार मिल गया, पर उनके साथ सदैव धोखा ही हुआ, तो उनका अविश्वास तो जायज़ ही है।

पर जब वे आजादी आन्दोलन को समझेंगे, तब विश्वास की कमी नहीं होगी। क्योंकि यह आन्दोलन ऐसा नहीं है कि कुछ नेता वार्ता करके आएँगे, सरकार में चले जाएँगे और मामला खत्म हो जाएगा। बल्कि यह हर एक आदमी का आन्दोलन है और आजादी मिलने पर हर एक आदमी को मिलेगी, उस उपलब्धि को हर एक आदमी एहसास कर सकेगा। और जब तक हर मधेशी को आजादी का एहसास नहीं हो जाता, यह आन्दोलन जारी रहेगा। इसलिए इसमें कोई नेता या पार्टी द्वारा धोखा देने की बात नहीं आती।

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भाग ५: विजय

३०. व्यवस्थापन

जि:
डाक्टर साहब, अच्छी बात बताई आपने कार्यकर्ताओं से मिलने जुलने के लिए। पर उन सबसे कैसे काम कराएँ? दिया हुआ काम भी सम्पन्न नहीं हो पाता।

डॉ:
कार्यकर्ताओं को काम लिखकर दें, और हो सके तो आमने-सामने बातचीत करके क्या करना है दोनों लोग उस पर सहमत होकर लिखें। लोग काम कर ही रहा होगा, पूरा कर ही देगा, यह सोचकर नहीं बैठें। काम सौंपने पर उसे समय-समय पर चेक करते रहें और समाप्त करवाएँ।

कार्यकर्ताओं को किसी काम के लिए चयन करने से पहले उनकी अभिरुचि, योग्यता आदि विषयों को लेकर म्याचिंग कर लें। उसके बाद स्पष्ट भाषा में दोनों लोग कार्य के विषय पर पहले सहमत हो जाएँ और उसे लिखित रूप में तय करें, उसके लिए आवश्यक सब-टास्क भी निर्धारित करें, अन्तिम में उसे मूल्यांकन करने का मापदण्ड लिखें, और समय भी निर्धारण कर दें।

उदाहरण के लिए कि ‘जिले में जागरण फैलाएँ’ यह किसी कार्यकर्ता को सौंपे जाने वाला निश्चित काम नहीं हुआ। बल्कि इतनी तारीख तक में अमुक-अमुक गाँवों में कार्यक्रम करना, इतनी तारीख तक में इस-इस गाँवों में कम-से-कम दस सदस्य बनाना, इस तरह की कार्य-योजना होनी चाहिए। कार्य प्रगति को बीच-बीच में चेक भी करते रहना चाहिए। ऐसा नहीं कि कह दिया ६ महीने में १०,००० सदस्य बनाना है, काम सौंप दिया और उसके ६ महीने के बाद ही जाकर ही पूछा, ऐसा नहीं।

जि:
कार्यकर्ताओं को काम सौंपने से पहले ध्यान देने योग्य और कोई बात?

डॉ:
किसी से कुछ काम कराना हो तो उनमें पहले प्रबल इच्छा जगाएँ। आप क्या चाहते हैं, इससे उसे क्या मतलब? वह क्या चाहता है, उसके लिए वह महत्वपूर्ण है, उस पर विचार करें। उसके साथ-साथ, लोगों को अगर यह लगे कि कोई विचार या योजना उसी की है, तो वह ज्यादा दिलचस्पी से, ज्यादा जिम्मेवारी से काम करेगा।

जि:
कार्यकर्ताओं से बेहतर तरीके से काम कराने का कोई उपाय?

डॉ:
कार्यकर्ताओं को टैलेन्ट के आधार पर काम सौंपें। टैलेन्ट वही है जिसमें कार्यकर्ता को अधिकतर रूचि हो, जो वह बार-बार जाने-अन्जाने में भी करता हो या करने की लालसा रखता हो।

कार्यकर्ताओं को लक्ष्य दें, पर नीतिगत दायरे में रहते हुए वह अपने हिसाब से भी कार्य कर सके, उसकी छूट दें। हरेक स्टेप बतलाना और उसे अक्षरश: पालन करवाना आवश्यक नहीं होता। एक बृहत मार्गदर्शन पर काम करने दें, सारी छोटी-छोटी बातें निर्दिष्ट न करें।

कार्यकर्ताओं के सबल पक्षों पर जोड दें; जो वह कर सकता है, उसका सदुपयोग करें। कमजोर पक्षों को बार-बार बीच में न लाएँ, कमजोर पक्ष के लिए कोई सपोर्ट सिस्टम या कोई सहयोगी तलाश करें।

कार्यकर्ताओं के सबल पक्ष या अभिरुचि को देखकर ही संगठन में उनके स्थान को तय करें, केवल पद के लिए नहीं। हरेक क्षेत्र और पद को उतने ही प्रतिष्ठित बनाने की कोशिश करें।

जि:
कार्य सम्पादन के क्रम में कार्यकर्ताओं के लिए संगठन प्रति कोई विशेष जिम्मेवारी?

डॉ:
कार्यकर्ताओं को चाहिए कि चाहे काम कितना भी छोटा या महत्वहीन लगे, फिर भी उसमें पूरी तैयारी और शक्ति लगाएँ। वे अपने संगठन को अपने कार्यों के सम्बन्ध में लगातार सूचित किए रखें; लाभ की बात हो या हानि की, पर सरप्राइज मत रखें ताकि बेहतर ढंग से योजना बनाई जा सके, रेसपोन्स प्लानिंग किया जा सके।

उसके साथ-साथ कार्यकर्ताओं को चाहिए कि जब भी वे बाहर के लोगों से बात करते हैं तो अपने संगठन का सदैव ख्याल करें, क्योंकि लोग आपको संगठन के प्रतिनिधि के रूप में मानकर बात करते हैं। इसलिए सावधान होकर बात करें, किस तरह का झुकाव दिखाना या मन्तव्य देना उचित है, किस हद तक जानकारी देनी उचित है, किस हद तक बचनबद्धता दिखानी उचित है, इन सब बातों पर विचार करें।

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३१. लोक व्यवहार

जि:
यहाँ आप कहते हैं कि लोगों से अच्छे तरीके से बर्ताव करने के लिए, पर नेता, कर्मचारी और एनजीओ वाले, इन सब को देखता हूँ तो खून खौल जाता है। ऐसी-ऐसी गालियाँ देने को जी चाहता है कि क्या कहूँ?

डॉ:
आप इतने नेताओं या कर्मचारियों को गाली दिए हैं तो आपके गाली देने से उनमें से कितने बदल गए? उसी तरह अगर किसी दोस्त या अपने सहकर्मियों की भी आपने जमकर खिंचाई की, तो वे सुधरेंगे तो नहीं पर उनसे आपका सम्बन्ध जरूर बिगड़ जाएगा, अपनी शक्ति और समय जो खर्च होगा वह अलग।

याद रखिए कि भयंकर से भयंकर अपराधी भी अपनी गलती नहीं मानता है, अपने बचाव में उनके पास कुछ न कुछ होता ही है।

तो आप अगर सोचते हैं कि किसी की बुराई करके, निंदा करके या शिकायत करके वह सुधर जाएगा, तो आप गलत है। वैसा करके आप अपना समय, शक्ति, सम्बन्ध और इमेज सभी खराब कर रहे हैं। और आलोचना करेंगे, तो आलोचना ही पाएँगे।

इसलिए जब आपको मधु खाना है, तो मधुमख्खी के छत्ते पर तो कभी पत्थर न फेंकें। इसलिए आलोचना करना छोड़िए। आलोचना करके आप लोगों को दूर भगा देते हैं, और भविष्य में भी सुधरने की या आपको साथ दे सकने की सम्भावना को भी आप नष्ट कर देते हैं।

जि:
ठीक है, आलोचना और निंदा नहीं। पर सही तर्क से उन्हें हरा दें तो, उन्हें गलत साबित कर दें तो?

डॉ:
तर्क से आदमी को हराया जा सकता है, पर उन्हें जीता नहीं जा सकता, उन्हें अपना नहीं बनाया जा सकता है। आप देखेंगे, कि सटीक तर्क से आप किसी की सारी बातों को गलत साबित क्यों न कर दें, और वह आपके सामने गलती भी क्यों न मान लें, पर भीतर ही भीतर उसका मन अपना बचाव तलाश करता रहता है, वह आपके खिलाफ नए प्रमाण, नए तर्क ढूँढता रहता है।

जि:
तर्क से नहीं तो ऐसे लोगों से कैसे निपटें?

डॉ:
पहली बात, आप किसीको कुछ सुनाने से पहले उनकी सुनें। उनका दृष्टिकोण देखें। उनकी सच्ची तारीफ करें, उनके दृष्टिकोण पर सहानुभूति रखें, उन्हें महत्वपूर्ण अनुभव कराएँ। और उसके बाद ही अपनी बातें रखें, यानि जानकारी दें। उसे अपनी बात मानने के लिए मजबूर न करें, उसे केवल जानकारी दें और मनन करने के लिए छोड़ दें। ‘हमें तो ऐसा लगता है, बाकी आप जो चाहें’ इस अन्दाज में बात करें।

जि:
पर अगर कोई गलत है या किसी चीज में कमजोर है, और उसको सुधार करना चाहें तो?

डॉ:
उसके लिए पहले प्रोस्साहित करें, और याद रखें कि वह अपमानित महसूस न करे, उनको लाज रखने दें। थोड़े से भी सुधार या सकारात्मक कार्य की भी सच्ची तारीफ करें। उन्हें हुक्म नहीं दें, बल्कि प्रश्न करें कि ‘ऐसा करने पर अच्छा होगा क्या?’ लोगों को एक अच्छा इमेज दे दें, ताकि वे उस इमेज पर खरा उतरने के लिए कोशिश करते रहें।

जि:
बहुत लोगों तक तो हम पहुँच ही नहीं पाते, खुलकर बात ही नहीं कर पाते, ऐसे में अपनी बात रखने का मौका ही नहीं मिलता। आखिर लोगों के करीब कैसे आएँ?

डॉ:
पहली बात तो लोगों से मुस्कुराकर बात करना शुरु करें, यानि आपके चेहरे पर तो मुस्कुराहट रहे ही पर खुली रूप से बात करने के लिए तत्पर होने का भाव आप के मन में भी हो, क्योंकि वह प्रकट होता रहता है, आपकी आँखों से, आपके हावभाव से। अगर ऐसा रहा तो लोग स्वयं भी आप से बातें करना शुरु कर देंगे। उसके साथ-साथ, लोगों से मित्रतापूर्ण व्यवहार रखें, लोगों के नाम और अभिरुचि याद रखें, उनकी अभिरुचि की बात करें, दूसरे लोगों में सचमुच रूचि लें, समय-समय पर उन्हें याद करते रहें—यही तरीके हैं लोगों के करीब रहने के लिए।

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३२. प्रभाव

जि:
डाक्टर साहब, जैसा कि मैंने पहले भी कहा कि मधेश में कोई किसी के अधीन में रहकर कार्य करना ही नहीं चाहता। हमारे यहाँ काम के अनुशासन का सर्वथा अभाव है। यहाँ तो कोई सुनता भी नहीं है, लोगों पर कुछ प्रभाव ही नहीं पड़ता। ऐसे में लोगों को कैसे मनाएँ?

डॉ:
जिस तरह से एटीएम से पैसा निकालने के लिए पहले खाते में पैसा जमा करके रखना जरूरी होता है, उसी तरह किसी से ‘हाँ’ कहलवाने में भी पहले आपका डिपोजिट होना जरूरी होता है। नहीं तो एटीएम की तरह आपका अनुरोध अस्वीकार होता रहेगा। वह डिपोजिट सम्बन्ध और प्रभाव है। प्रभाव डालने के लिए कुछ फैक्टर्स होते हैं। जैसे लेनी-देनी का सम्बन्ध। अगर आपने किसी की मदद की है, कोई फेवर किया है, तो दूसरों की तुलना में वे आपकी बात सुनने के लिए राजी होंगे, वे आपकी मदद लौटाने के लिए तत्पर रहेंगे। तो किसी पर प्रभाव डालने और उनसे हाँ करवाने के लिए पहले आपको वह श्रेय या प्वाइन्टस् जमा करना होगा, और जितना ज्यादा प्वाइन्टस्, उतना ज्यादा प्रभाव।

उसी तरह अपना प्रस्ताव आमने-सामने बात करके रखें। ऐसे में टालने की सम्भावना कम होती है, सीधे ईमेल या फोन या किसी दूसरे लोगों के जरिए कहने की तुलना में। जैसा कि फोन पर किसीको अपने संगठन का सदस्य बनने के लिए कहेंगे, या आनेवाले कार्यक्रम में कुछ जिम्मेवारी वहन करने के लिए कहेंगे तो वहाँ अस्वीकार करने की सम्भावना ज्यादा है, पर वही बात आप उनसे मिलकर चाय या डिनर पर कहते हैं या उनके घर जाकर कहते हैं तो स्वीकार करने की सम्भावना ज्यादा रहती है।

दूसरी बात, ज्यादा लोग जो करते हैं, लोग वह करने में हिचकिचाते नहीं। वहाँ पर एक ‘मास इफेक्ट’ बन जाता है। जैसा कि आपको अगर किसी अपील पर बहुत लोगों का हस्ताक्षर लेना है। अगर आप अकेले-अकेले जाकर साइन लिजिएगा, तो बहुत लोग सोचेंगे, हिचकिचाएंगे। पर वहीं अगर सामूहिक रूप में बहुत लोग साइन कर रहे होते हैं, तो वहाँ आस-पास खड़े लोग भी साइन करने ‍में हिचकिचाते नहीं। उसी तरह, पहले से हजारों लोगों के साइन अगर किसी लिस्ट पर मौजूद हैं, तो लोग उस पर साइन करने में उतना ज्यादा नहीं झिझकते, और वहाँ पर आपको जवाब ‘हाँ’ ही मिलेगा।

इसके अलावा लोगों को स्वयं से जुड़ी या खुद देखी और परखी गई चीजों पर विश्वास करना आसान होता है। एक ही तरह की पृष्ठभूमि, बराबर मिलना, लम्बे समय से सम्बन्ध—ये सब बातें बहुत मायने रखती हैं। जैसा कि आपके बचपन या कॉलेज के समय के दोस्त जिनसे आजकल भी आप बराबर मिलते हो, वे आपकी बात जल्दी मान लेते हैं, किसी दूसरे लोगों की तुलना में।

आधिकारिकता और सम्मान भी उसी तरह लोगों से ‘हाँ’ करवाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं। अगर हमें कोई पुलिस की वर्दी में आकर लाइसेंस माँगता है तो हम तुरन्त दिखाते हैं, पर साधारण वर्दी में आए एस.पी. को भी अपना लाइसेंस दिखाने से पहले चार बार सोचेंगे, पूछेंगे। एक प्रोफेसर अपने विद्यार्थी को अगर कोई सलाह देता है, तो उसे हतपत वह इग्‍नोर नहीं कर सकता। एक अर्थशास्त्री की सलाह एक बैंकर जल्दी इग्‍नोर नहीं कर सकता। यानि आपकी विशेषज्ञता, शिक्षा, प्रोफेशन या आधिकारिकता भी यह निर्धारण करती है कि लोग आपकी बात सुनेंगे कि नहीं।

उसी तरह अगर कोई अवसर कम हो, या लोगों को यह मालूम हो कि ‘हाँ’ नहीं करने से वे क्या खोएंगे, तो लोग उसे लेने के लिए जल्दी तैयार होंगे। जैसा कि अभी अगर कोई कार्यकर्ता किसी टोली का सदस्य बनने से हिचकिचा रहा है, पर उसे यह मालूम हो जाता है कि उनके क्षेत्र से केवल तीन आदमियों को लिया जाएगा और भविष्य में नए सदस्य उसमें नहीं जा पाएँगे, तो वह उस टोली में रहने के लिए जल्द तैयार हो सकता है।

तो किसी से हाँ करवाने के लिए, पहले इन सारी बातों पर विचार करके अपना प्वाइन्टस् या डिपोजिट आपको बढ़ाना होगा।

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३३. अर्थ संकलन

जि:
अच्छा, ये तो हुईं लोगों को मनवाने की बातें। अब यह बताइए कि किसी कार्य या मिशन के लिए अर्थ संकलन कैसे करें?

डॉ:
अर्थ संकलन करना केवल एक बार का काम नहीं होता, बल्कि यह निरन्तर का काम है। ऐसा नहीं है कि एक बार फंड रेजिंग कर लिया तो हो गया। खास करके हमारे दीर्घकालीन आन्दोलन के लिए यह नियमित और निरन्तर रूप में होना और भी आवश्यक है।

इस हिसाब से हमें नियमित आर्थिक स्रोत पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी है। जैसे कि संगठन के सभी सदस्य अपनी आय का कुछ निश्चित प्रतिशत (जैसे २\% या ५\%) देना, इस तरह के स्रोतों में आता है। जब वे नेपाल सरकार को ३०\% तक टैक्स देते हैं, जिससे बदले में उन्हें अपमान और तिरस्कार के अलावा शायद ही कुछ मिलता है, तो इस पहचान, आत्मसम्मान और आजादी की लड़ाई के लिए मधेशी लोग अपनी आय का कुछ प्रतिशत अवश्य दे सकते हैं, बस उनमें जागृति पैदा करना आवश्यक है।

दूसरी बात, आर्थिक सहायता के लिए केवल रुपया ही नहीं, आवश्यक सामान और श्रम भी लिए जा सकते हैं या किसी काम की जिम्मेवारी सीधे दाता को दी जा सकती है। जैसे १००० प्रति पर्चे छपाने की, १००० प्रति ‘वीर मधेशी’ बालपोथी छपाने की, बैठक या तालिम के लिए जगह की व्यवस्था कर देने की, या किसी यूनिट के कार्यालय खर्च वहन करने की जिम्मेवारी सीधे दाता को दी जा सकती है; इस तरह से वे अपने दान को सीधे सदुपयोग होते हुए देख सकते हैं और उनका विश्वास भी कायम रहेगा। उसी तरह नगद पैसा लेने के बदले बैठक या सभा के लिए खान-पान की व्यवस्था करना, कार्यालय के लिए एक प्रिंटर, दराज या कमरा ही उपलब्ध करा देना—इस तरह से भी लोग सहयोग कर सकते हैं। उसी तरह जो काम हम पैसे देकर किसी और से करवाते हैं, उसमें श्रमदान करके भी लोग हमें मदद कर सकते हैं—जैसे कि अगर हम २०० पेज का कोई दस्तावेज़ बाहर टाइप करवाएँगे तो हमें ४०००–५००० रुपया खर्च करना पड़ेगा, पर वही काम अगर कोई विद्यार्थी या कर्मचारी करने के लिए राजी हो जाता है, तो वह उनके द्वारा ४०००–५००० रुपये दान करने के समान ही है। इस तरह से हमें केवल नगद पैसा संकलन करने पर ही नहीं, बल्कि दूसरे माध्यमों से भी संगठन को लाभान्वित करने का प्रयास करना चाहिए।

उसके अलावा सांस्कृतिक कार्यक्रम, कोचिंग, मेडिकल कैंप, ग्रांट, पिकनिक आदि के जरिए भी हम फंड रेजिंग कर सकते हैं, पर याद रहे केवल उस तरह के कार्यक्रमों की आयोजन करें जिसमें यथासक्य फ़िज़ूलखर्ची न हो।

जि:
पैसा किससे माँगे, कौन देता है?

डॉ:
संगठन के लिए फंड रेजिंग करने के लिए संगठन के कार्यकर्ता और सदस्य के अलावा दूसरे लोग भी मदद कर सकते हैं। स्थानीय आदमी, कर्मचारी, व्यापारी, धनी और परोपकारी दाता लोगों के साथ-साथ सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं के द्वारा भी आर्थिक सहायता मिल सकती है। पर उन सबसे किसी निश्चित कार्य के लिए ही मिलना आसान होता है, और उनसे उसी रूप में सम्पर्क करना होगा। जैसे महिला साक्षरता कार्यक्रम या गाँव में सरसफाई अभियान चलाने के लिए शिक्षा कार्यालय, जिला प्रशासन कार्यालय, जिला विकास या गाँव विकास समिति आदि भी आर्थिक या अन्य सहयोग प्रदान कर सकती है।

पर उनसे बात करने के लिए एक निश्चित छोटा प्रोपोजल होना चाहिए, १–२ पेज का प्रोपोजल चल सकता है; उसमें कार्य के उद्देश्य, लक्षित समूह, कार्य से होने वाले फायदे और विभिन्न चीजों पर होने वाले खर्च स्पष्ट करते हुए अनुमानित बजट आदि खोलने के साथ-साथ उस कार्य से दाता को क्या लाभ होगा या दाता उसमें क्यों दिलचस्पी लें, यह बात भी खोलनी जरूरी होती है। इससे सम्पर्क बनाने में और अपनी बात रखने में भी आसान होता है।

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३४. बुलन्द सोच

जि:
इन सारी बातों को देखता हूँ, मधेश की सामाजिक-आर्थिक स्थिति और चेतना का स्तर देखता हूँ, तो हमारा लक्ष्य बहुत बड़ा लगता है, बहुत दूर लगता है। ऐसे में बहुत लोग संशय भी करते हैं।

डॉ:
देखिए, हमें अपनी सोच को बुलन्द रखना होगा। जब आप सोचेंगे नहीं तो करेंगे कैसे? जब आपने लक्ष्य ही सौ रुपया कमाने का ले लिया, तो आप लखपति कैसे बनेंगे? इतिहास में सारे बड़े लीडरों ने, सारे बड़े आदमियों ने, सारे सफल आदमियों ने, सभी ने तो यही कहा है कि बड़ा सोचो, बड़े सपने देखो, फिर हम उन सफल आदमियों, उन महान आदमियों की बात न सुनकर असफल और गफ की बौछार छोड़ने वाले आदमियों की बातों में क्यों आ जाते हैं? हम क्यों छोटी-छोटी बातों में अपना जीवन उलझाकर नष्ट कर देते हैं? हम क्यों ‘कमाया, खाया और मर गया’ जैसे यान्त्रिक जीवन व्यतीत करने में लग जाते हैं? क्यों हम बस एक ईंट बन कर रह जाते हैं, जो कोई दूसरा आदमी अपने घर की दीवार बनाने के काम में लाता है?

हमको जीना ही है तो क्यों हम कीड़े-मकोड़ों की सोच लेकर जिएँ, क्यों न हम बड़ी सोच लेकर जिएँ? और मंडेला ने भी तो कहा है कि हासिल होने से पहले हर लक्ष्य असम्भव ही लगता है।

और देश का आजाद होना और बनना कोई दुर्लभ और असम्भव कार्य नहीं है—वैसा केवल शासकवर्ग शासित लोगों को निरुत्साहित करने के लिए कहते हैं। केवल सन् १९९० के बाद भी ३० से ज्यादा नए देश बने हैं। सन् २००० के बाद भी पूर्वी टिमोर, मोन्टेनेग्रो, सर्बिया, कोसोभो और दक्षिण सुडान बने हैं, और निकट भविष्य में स्कटलैन्ड, काटालोनिया, क्यूबेक और सोमालिलैन्ड लगायत के दर्जनों नए देश बनने की कगार पर है। तो यह असम्भव कैसा?

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३५. मिशन

जि:
कहने का मतलब हमें अपने जीवन में बड़ा लक्ष्य रखना ही होगा?

डॉ:
हाँ, हम अपने जीवन में मकसद रखें, लक्ष्य रखें, एक मिशन रखें। दुनियाँ बदलने का ज़ज़्बा रखें। खाना-पीना, सोना और बच्चे पैदा करना तो सारे पशु भी करते हैं। पर यहाँ मानव होकर भी हमारे जीवन पशु से भी बदतर है क्योंकि हम गुलाम बने हुए हैं। तो हम उस गुलामी को तोड़ने के लिए जिएँ, समाज के उत्थान के लिए जिएँ। उसी में हमारा भी कल्याण है, संसार का भी कल्याण है, उसी से हमारा अस्तित्व भी बच पाएगा। बस उसे हम अपना मिशन बना लें। पैसे तो लोग दूसरों का ट्वाइलेट साफ करके भी इतना कमा लेते हैं, जितना एक बहुत बड़ा हाकिम भी इमान्दारी से कमा नहीं पाता, उसके पीछे क्या भागना!

जि:
और क्या जरूरी है?

डॉ:
सकारात्मक सोच। आप अगर कोई चीज नहीं करना चाहते हैं, तो गिनकर आप हजारों बहाना बना सकते हैं। ये हो गया, वो हो गया, यह नहीं मिला आदि। पर अगर आपके पास सफल होने के लिए सकारात्मक सोच है, तो आपके मार्ग में हजारों बाधाएँ भी आ जाएँगी, तो आप अपना लक्ष्य हासिल करके ही रहेंगे।

और स्वयं को आप जो समझेंगे, वही बन जाएँगे। यह विचार की शक्ति है। अगर आप हर रोज अपने आप को कमजोर, निराश, असफल और निकम्मा मानते रहेंगे, तो आप वैसे ही बन जाएँगे। पर आप स्वयं को मजबूत और सफल के रूप में सोचते रहेंगे, तो आप धीरे-धीरे पाएँगे कि आपके आचरण और कार्य भी उसी अनुरूप होते जा रहे हैं और आप सफलता की ओर बढ़ रहे हैं।

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३६. प्रतिबद्धता

जि:
पर खाली सोच से तो नहीं होगा न?

डॉ:
हाँ, खाली सोचने से या आइडिया निकालने से नहीं होगा। आपको अपने काम के प्रति प्रतिबद्ध होना होगा, जिम्मेवारी वहन करनी होगी।

जिम्मेवारी वहन किए बिना परिवर्तन की आशा करना संभोग किए बिना संतान की लालसा रखने समान है। खाली दूसरों को आइडिया देते रहने से, खाली ये चाहिए वो चाहिए कहते रहने से, खाली फेसबुक पर बड़ी-बडी डींग हाँकने, लाइक और कमेन्ट करने से और खाली पत्र-पत्रिकाओं में बड़ी-बड़ी बातें बनाने से नहीं होगा, अगर आप जिम्मेवारी वहन करने से भागते हैं। आपको अपने लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्ध होकर आजादी के लिए संघर्ष करना है, और प्रतिबद्ध होकर तलाश करने वालों को यहाँ सब कुछ मिलता है, जैसा कबीर ने कहा है—

जिन ढूढा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठि।

मै बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठि॥

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३७. सहकार्य

जि:
उसके बाद और क्या होना जरूरी है?

डॉ:
सहकार्य। सहकार्य द्वारा हम अभूतपूर्व शक्ति हासिल कर सकते हैं, एक-दूसरे की कमी-कमजोरियों के बदले हम सहारा बन सकते हैं, और एक होकर अपना लक्ष्य हासिल कर सकते हैं। सभी गुण एक ही आदमी में हो, सब कुछ एक ही आदमी को आता हो, सभी कुछ एक आदमी के पास में ही हो, ऐसी बात नहीं है। इसलिए हम सब एकजुट हो जाएँ तो अपने सारे साधन-स्रोत, दक्षता और शक्ति एक जगह हो जाएँगी, और हम मुश्किल से मुश्किल लक्ष्य भी आसानी से पा सकेंगे।

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३८. नेतृत्व

जि:
और कुछ?

डॉ:
नेतृत्व। यहाँ पर अक्सर लोग गिले-शिकवे करते हुए मिलते हैं, पर वह तो हर कोई कर सकता है; आप बैठकर अंधेरे को घंटो तक गालियाँ दे सकते हैं। पर अंधेरे को सरापे नहीं, बस एक दिया जलाएँ। आप लीडर बनें।

लीडर गिले-शिकवे नहीं करते, वे यह नहीं कहते कि पैसा नहीं मिला, लोग जमा नहीं हुए, इसलिए काम नहीं हुआ। जब सब कुछ दे ही देंगे कि यह आदमी हुआ, यह बजट हुआ, यह काम हुआ तो किस बात का लीडर? तब तो वह केवल मैनेजर हो गया।

जि:
तो मैनेजर और लीडर में अन्तर है?

डॉ:
हाँ, बहुत। लीडर के पास केवल लक्ष्य होता है, उस लक्ष्य को पूरा करने के लिए वह रास्ता खुद बना लेता है। लक्ष्य हासिल करने के लिए आवश्यक चीजें वह स्वयं बनाता है या इकट्ठा करता है और लक्ष्य हासिल करता है।

उसका काम नौकरी जैसा नहीं होता। नौकरी में कार्य योजना, बजट, कर्मचारी या मैन-पावर और समय दे दिए जाते हैं कि लो भई यह सब हुआ और यह काम पूरा करो। उस तरह का काम मैनेजर का है और उसे अपना काम करने के लिए वेतन दिया जाता है।

संक्षिप्त में मैनेजर को सारे इनपुट दिए जाते हैं, वह बस प्रोसेस करवाता है और आउटपुट निकालता है। लीडर के पास केवल लक्ष्य होता है, बाकी वह खुद व्यवस्था करता है, योजना बनाता है और लक्ष्य हासिल करता है।

दैनिक जीवन में भी देखेंगे तो पता चलेगा कि मेनेजर अक्सर कोई काम दूसरों से करवाता है, वह दूसरों को निर्देशन देता रहता है। पर लीडर पहले खुद करके भी दिखाता है, केवल दूसरों को आदेश नहीं देता। कोई काम कराना हो तो लीडर खुद भी उसमें शामिल हो कर करता है और आसपास के बाकी लोग भी उसे देखकर उस काम में लग जाते हैं। इसलिए उसे लीडर कहा जाता है।

जि:
कोई उदाहरण?

डॉ:
गांधीजी को सब कुछ किसी ने नहीं दिया कि लो यह पैसा हुआ, यह कार्यकर्ताओं का तनखाह हुआ, यह काम हुआ, इतने समय में करो और करने के लिए तुम्हारा इतना वेतन हुआ। उसी तरह दूसरे क्षेत्रों में देखें—रामदेव बाबा। वही सारी बातें उनमें भी लागू होती हैं। लीडर अपना रास्ता खुद बना लेता है, इसलिए वह लीडर है।

अब ठीक उन्हीं के नज़दीक में देखिए। गांधीजी या रामदेव बाबा या अन्य लीडर की काम-कार्रवाई देखने के लिए मैनेजर भी होते हैं। कार्य को व्यवस्थापन करने की जिम्मेवारी उन्हें सौंपी जाती है, उन्हें बजट दिया जाता है, समय-सीमा दी जाती है और काम करने के लिए उन्हें वेतन भी दिया जाता है। काम तो वे भी लगभग वही करते हैं पर उन्हें लोग लीडरशीप के लिए नहीं जानते क्योंकि वे बस नौकरी कर रहे होते हैं।

और समाज परिवर्तन कौन करता है? लीडर। चाहे वह कोई भी क्षेत्र हो—तकनीकी, राजनैतिक या धार्मिक, कहीं भी। बिल गेट्स, स्टीव जॉब, गांधी, मंडेला, विवेकानंद, बाबा रामदेव सभी लीडर हैं। अगर गांधी और मंडेला को भी कहीं से बजट दिया होता और कहता कि ये लो यह हुआ तुम्हारा काम, यह आन्दोलन का बजट, ये हुए कार्यकर्ता या कर्मचारी और यह हुआ आन्दोलन कराने का तुम्हारा वेतन, तो क्या हम गांधी और मंडेला को लीडर के रूप में जानते?

जि:
लीडर की और कोई खासियत?

डॉ:
लीडर सदैव लोगों को आशा दिखाते हैं, निराशा नहीं। आशा पर ही तो दुनियाँ टिकी हुई है, नहीं तो होने के लिए तो यहाँ किसी पल कुछ भी हो सकता है। जिस समय प्राणी आशा करना छोड़ देता है, उसी समय उसके लिए जीवन खत्म हो जाता है। इसलिए आप भी आशावादी आदमियों के साथ रहें, जो सकारात्मक विचार और ऊर्जा प्रवाहित करते हों।

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३९. बलिदान

जि:
पर लक्ष्य हासिल करने के दौरान सब कुछ ठीक ही हो जाएगा, हमें कुछ खोना नहीं पड़ेगा, ऐसा तो नहीं कह सकते हैं न?

डॉ:
देखिए, अगर आप चाहते हैं कि मुझे लोगों को समझाना और मनाना भी न पड़े, घर-घर जाकर चावल-चंदा जुटाना भी न पड़े,
हड़ताल, बंद, आन्दोलन और उथलपुथल भी न हो, किसीको जेल भी न जाना पड़े, आपके व्यापार में भी कमी न हो, आपका कुछ आर्थिक नुकसान न हो, आपको कुछ बलिदानी भी नहीं देनी पड़े, और घर बैठे-बैठे कोई आदमी प्लेट में स्वतन्त्रता लेकर आपको देने आ जाए, तो क्या उस स्वतन्त्रता में कुछ गौरव होगा? क्या उसमें कोई वीरता होगी? उस तरह की सफलता बस किसी तैराकी द्वारा बिना तैरे ही ओलम्पिक मेडल हासिल करने के समान है।

इसलिए अगर हम आजादी चाहते हैं तो हमें बलिदान देने के लिए भी तैयार रहना ही होगा। हमें कुछ समय देना पड़ेगा, कुछ दिन हमारे काम बन्द हो सकते हैं, हमें कुछ आर्थिक नुकसान हो सकता है, पर हमें जो आजादी मिलेगी, वह उन सबसे बहुत मूल्यवान होगी। ‘भई आज शनिवार है, आज छुट्टी है, चलो आन्दोलन करते हैं’—ऐसा करके आजादी कहीं नहीं मिलती।

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४०. अवसर को पकड़ो

जि:
यानि कि हमें अवसर पर ही कार्य करना होगा?

डॉ:
हाँ, अवसर बहुत बड़ी बात होती है, जैसा गोस्वामी तुलसीदासजी ने कहा है—‘का बरखा जब कृखी सुखाने।’ यानि जब फसल सुख कर मर गई तो वर्षा का क्या काम? हमें अवसर के लिए तैयार रहना चाहिए, अवसर तो हर पल आते जाते रहते हैं, उसे पहचानकर उसे पकड़ना चाहिए।

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४१. आत्मविश्वास

जि:
अन्त में और कुछ?

डॉ:
देखिए, संसार में वह शक्ति मौजूद है जो सत्य को विजय दिलाती है। वह सर्वव्याप्त है, हर प्राणी के अन्दर है। सत्य हमारे साथ है, इसलिए हमारी विजय निश्चित है। सत्य की रक्षा के लिए ईश्वर की अनन्त शक्ति हमारे भीतर है, और उसके द्वारा संसार के हर काम को हम सफल कर सकते हैं। यह विश्वास रखकर हम आगे बढ़ें। हाँ, कभी-कभी हमारे धैर्य की परीक्षा होती है, हमारी दृढ़ता की परीक्षा होती है, पर अन्ततः सत्य सदैव जीतता ही है।

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४२. व्यवहार

डॉ:
तो ठीक है, अब आप बताइए कि आपने क्या सीखा?

जि:
यही कि जीवन क्या है, जीवन का मकसद क्या है, मधेश कैसे नेपाल का उपनिवेश बना हुआ है, कैसे हमारा अस्तित्व संकट में है, कैसे हमें मुक्ति के लिए संघर्ष करना चाहिए, कैसे संगठित होना चाहिए और आन्दोलन करना चाहिए, यही सब कुछ।

डॉ:
हाँ, पर खाली जानकारी रखना या ज्ञान पा लेना पर्याप्त नहीं है, कहें तो वह कुछ भी नहीं है। आप पूरे जीवन में जितनी किताबें पढ़ेंगे, वे एक नाखून जितना बड़ा मेमोरी-कार्ड में रखी जा सकती हैं, जो ३००–४०० रुपये में मिलता है। तो खाली जानकारियों को दिमाग में भर लेने का क्या मोल हुआ? वही ना, ३००–४०० रुपये। इसलिए जब तक हम उस ज्ञान का सदुपयोग नहीं करते, उस ज्ञान को अभ्यास में नहीं लाते, तब तक वह व्यर्थ है। इसलिए शास्त्रों में भी कहा गया है—अनभ्यासेन विषं विद्या, अर्थात् बिना अभ्यास की विद्या विष के समान है।

जानकारियाँ तो किताबों में, इन्टरनेट पर, फेसबुक पर भी बहुत सारी हैं। फिर भी लोग जहीं के तहीं है, क्यों? सभी एक दूसरे को सुनाते हैं, उपदेश देते हैं, खाली बातें करते हैं, पर बहुत ही कम लोग हैं जो उन्हें अपने जीवन में उतारने की कोशिश करते हैं, व्यवहार में उतारने की कोशिश करते हैं। इसलिए वह ज्ञान मानव विकास में सहायक नहीं हो पाता।

इसलिए अगर आप समाज का उत्थान चाहते हैं, तो मन में दृढ़-संकल्प कर लिजिए और पहला कदम तो आप उठा ही लिजिए। और अपने कदमों पर मनन करते हुए आगे बढ़ते रहिए। चरैवेति, चरैवेति!

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४३. तत्काल योजना

जि:
अच्छा, डाक्टर साहब, जाते-जाते एक बार फिर बता दीजिए कि हम तत्काल क्या करें?

डॉ:
पहली बात है तलाश, यानि हम कुछ ऐसे मधेशी स्वयंसेवक और कार्यकर्ताओं की तलाश करें जिसके पास मधेश के लिए जुनून हो, काम करने की योग्यता हो और जो नेतृत्व देने में सक्षम हो। उसके बाद उनको आवश्यक तालिम दी जाएगी और वे बेहतर तरीके से कार्य करने के लिए तैयार होंगे। ऐसे लोग हम खोज सकते हैं, ऐसे लोग हमें सम्पर्क भी कर सकते हैं।

ऐसे कार्यकर्ता तैयार होने पर वे आजादी आन्दोलन के प्रथम चरण से शुरु करेंगे, अर्थात् संजीवन यानि जागृति पैदा करना, जनचेतना फैलाना। केवल इन्टरनेट, पत्र-पत्रिका और रेडियो-टीवी के जरिए ही नहीं, बल्कि गाँव-गाँव और टोल-टोल पहुँचकर, और हर वर्ग के लोगों में, मजदूर और किसान से लेकर उद्योगपति और प्रोफेसर तक, सभी वर्गों में। यह देखने में अति साधारण और मामूली कार्य लगता है, पर सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी भी कार्य के लिए पहले चेतना आवश्यक है, जागृति की जरूरत है। अगर लोग जाग गए, तो बहुत लोग तो खुद भी रास्ता तलाश कर लेंगे, बहुत लोग खुद भी रास्ता बना लेंगे। इसलिए जागृति अभियान को कोई अल्पकालीन मामूली कार्य न समझकर इसमें निरन्तर लगना पड़ेगा।

जैसे लोग जागृत होते जाएँगे, मधेश के मुद्दों को समझते जाएँगे, उसी अनुसार हर जगह छोटा-छोटा संगठन खड़ा करना है, सामाजिक आन्दोलन संगठन (SMO)। सभी भौगोलिक क्षेत्रों (जिला, शहर, गाँव, टोल) और व्यवसायिक क्षेत्रों (किसान, मजदूर, रिक्सा वाला, व्यापारी, डाक्टर, इन्जिनियर, वकील, सरकारी कर्मचारी आदि) में संगठन निर्माण होंगे। कुछ में पहले से मौजूद भी है, उनका भी उपयोग किया जा सकता है, पर जहाँ जहाँ नहीं है वहाँ हम लोगों को संगठित करें और संगठन निर्माण करें। वे संगठन स्थानीय और अपने क्षेत्रों के मुद्दों को निरन्तर रूप में उठाते रहेंगे। इसके साथ-साथ संगठन का विस्तार और महाआन्दोलन की तैयारी भी होती रहेगी।

यानि आप याद रखिए हमारे पाँच-चरण (पाँच ‘स’)—

  1. संजीवन, यानि प्रचार-प्रसार करके लोगों में जागृति पैदा करना,
  2. संगठन, यानि अपनी जगहों पर संगठन बनाना।
  3. संवर्द्धन, यानि विचार-प्रचार, विस्तार, विकास, विप्लव-तैयारी और विशेष-सम्बन्ध (पाँच ‘वि’)।
  4. संघर्ष, यानि महाआन्दोलन
  5. संरक्षण, यानी UN में दर्ता, कूटनैतिक नियोग खोलने/खुलवाने लगायत के काम।

जि:
और संगठन बनाने जाएँ या लोगों को गठबन्धन का सदस्य बनाने जाएँ, तो क्या करें?

डॉ:
पहले लोगों को मधेश राष्ट्र है, इसका अपना गौरवमय इतिहास, भूगोल, संस्कृति, भाषा और वेश है, वह संक्षिप्त में समझाइए।

उसके बाद, ईस्वी १८१६ और १८६० की संधियों के जरिए अंग्रेजों द्वारा मधेश नेपाल को सौंप देने के बाद, मधेश कैसे नेपाल का उपनिवेश बना (१० सूत्र) और यह उपनिवेश किस तरह से बहुत ही कठोर है, वह समझाइए (७ सूत्र)। उसके बाद हमें स्वतन्त्र मधेश ही क्यों चाहिए (३ मुख्य सूत्र), और संघीयता या अन्य दूसरे मार्ग क्यों हमारी कोई समस्या हल नहीं कर सकते (१० सूत्र), वह समझाइए। फिर गठबन्धन के तीन आधार स्तम्भ, योजना और शान्तिपूर्ण मार्ग के विषय में परिचय कराते हुए, लोगों को गठबन्धन का सदस्य बनाएँ। ये सारी बातें अगर कोई बैठक बुलाकर सामूहिक रूप में की जाएँ, तो एक ही बार में बहुत लोगों को सदस्य बनाया जा सकता है। संगठन बनाने के बाद आप गठबन्धन में शामिल होने के लिए सीधे गठबन्धन के पदाधिकारियों से सम्पर्क कर सकते हैं।

स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन

गांधी ने किया, मंडेला ने किया और हम भी कर रहे हैं! आओ, शांतिपूर्ण मार्ग द्वारा मधेश को आजाद करें, नेपाली उपनिवेश का अन्त करें !!

हमारी माँगें

  1. मधेश को सार्वभौम-सम्पन्न स्वतन्त्र देश घोषणा की जाए। नेपाली उपनिवेश का अन्त हो।
  2. मधेशी राजनैतिक पार्टियाँ और नागरिक समाज को मिलाकर अविलम्ब अन्तरिम मधेश संसद और मधेश सरकार का गठन किया जाए, जो मधेश में आगामी निर्वाचन कराने और संविधान बनाने का काम करेगी।
  3. मधेश से नेपाली राज के शासन-संयन्त्र और प्रशासक को वापस लिया जाए। उस जगह पर मधेश सरकार अपना शासन संयन्त्र और प्रशासक रखेगी।
  4. मधेश से नेपाल सरकार सम्पूर्ण कर और राजस्व वसूली अविलम्ब बन्द करे। वह काम मधेश सरकार करेगी।
  5. मधेश के साधन-स्रोत, जल, जमीन और जंगल पर से नेपाल सरकार का आधिपत्य हटाया जाए।
  6. मधेश से नेपाल प्रहरी और सशस्त्र प्रहरी बल हटाकर उनमें से मधेशियों को चुनकर मधेश प्रहरी का अविलम्ब गठन किया जाए।
  7. मधेश से सम्पूर्ण नेपाली सेना हटाकर मधेशी सेना का अविलम्ब गठन किया जाए।
  8. मधेशियों से हरण की गई जमीन को वापस किया जाए, और उसे मधेश सरकार के मातहत में रखा जाए।
  9. मधेश में संयुक्त राष्ट्रसंघ लगायत विश्व के राष्ट्रों के प्रतिनिधि रखने लिए आवश्यक प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाए।

अपना मधेश — आजाद देश !!

आजाद मधेश, जिन्दाबाद !! नेपाली उपनिवेश, मुर्दाबाद !!

गुलामी और रंगभेद, मुर्दाबाद !!

नहीं चलेगा नेपाली राज, मधेश में होगा पूर्ण-स्वराज !!

बड़े बड़े शब्द देखे, बड़े बड़े संसद

बड़े बड़े समझौते किए, पर ठगे गए अब तक

अधिकार नहीं, उल्टा गुलामी मिली

इसलिए रूकना नहीं अब, आजाद न होने तक !

जय मधेश !

स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन मधेश की आजादी चाहने वाले मधेशियों का संगठन है। इसका लक्ष्य बुद्ध, गांधी और मंडेला के अहिंसावादी सिद्धान्तों पर चलते हुए शान्तिपूर्ण मार्ग द्वारा मधेश में नेपाली उपनिवेश, रंगभेद और गुलामी का अन्त करके मधेश को आजाद करना है। मधेश में पले-बड़े और विलायत के कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से पीएच. डी. करके अमेरिका में वैज्ञानिक रह चुके डा. सी. के. राउत इसका नेतृत्व करते हैं।

सन्दर्भ सामग्री

मो. क. गांधी हिन्द स्वराज
आत्मकथा
सी. के. राउत मधेश का इतिहास
वैरागदेखि बचावसम्म
वीर मधेशी
स्वेट मार्डेन अपने को पहचानो
डी. कारनेगी लोक व्यवहार
D. Carnegie The Art of Public Speaking
J. Ruskin Unto This Last
H. D. Thoreau Civil Disobedience
S. R. Covey The 7 Habits Of Highly Effective People (1989)
R. Cialdini Influence, Science and Practice (2000)
K. Blanchard & S. Johnson The One Minute Manager (1982)
M. Buckingham & C. Coffman First, Break All the Rules (1999)
B. Swanson 33 Unwritten Rules of Management
S. Alinsky Rules for Radicals
J. Christiansen Four Stages of Social Movements
C. Tilly From Mobilization to Revolution (1978)
C. Dobson Social Movements: A Summary of What Works
R. Shaw The Activist’s Handbook

इस किताब में वर्णित तकनीकें और प्रयोग किए गए उदाहरण अधिकांश रूप में उपर्युक्त सन्दर्भ साम्रगियों और दूसरे स्रोतों से लिए गए हैं।

लेखक: डॉ. सी. के. राउत

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सप्तरी जिले के महदेवा गाँव में जन्मे डॉ. सी. के. राउत, विलायत के कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से पीएच. डी. किए हुए हैं। वे युवा इन्जिनियर पुरस्कार, महेन्द्र विद्याभूषण, कुलरत्न गोल्डमेडल और ट्रफिमेन्‍कफ एकाडेमिक एचिभमेन्ट अवार्ड जैसे सम्मानों से विभूषित हैं।

डॉ. राउत अमेरिका में वैज्ञानिक के रूप में कार्यरत थे। मधेश की सेवा करने के लिए वे २०६८ साल में अमेरिका से वापस लौट आए। उन्होंने ‘मधेश का इतिहास’, ‘वीर मधेशी’ और ‘वैराग से बचाव तक’ (डिनायल टू डिफेन्स) किताबें भी लिखी हैं। वे ‘स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन’ का नेतृत्व करते हैं।

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