स्वराज जनचेतना अभियान

स्वराज जनचेतना अभियान

स्लाइड को फ्लेक्स प्रिन्ट करके नीचे की बातों को हो सके तो स्थानीय भाषा में समझाएँ। उपलब्ध हो तो, एक जगह के लिए, १ कपी मधेश स्वराज, १ कपी वीर मधेशी,  और १ कपी स्वराज DVD छोड दें। जो लोग जुडना चाहते हो, उनका विवरण फारम पर ले लें और उसमें जो ज्यादा सक्रिय दिखाई दें (या संयोजक बनने लायक हो), उसके नाम को किसी चिन्ह से मार्क कर दें। नामावली फारम को mleadtrain@gmail.com पर ईमेल करके भेज सकते हैं या जिला संयोजकों को हस्तान्तरण कर सकते हैं।

 

स्लाइड  – १: मधेश का इतिहास


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  • मानव की उत्पत्ति से लेकर मानव-विकास तक, मधेश की भूमि पर हुई। प्रमाण के रुप में १ करोड १० लाख वर्ष पुराने रामापिथेकस (रामनरवानर) का अवशेष मधेश के बुटवल से मिला है; अभी बुटवल में रामापिथेकस पार्क भी मौजूद है। इसलिए मधेशी या उनके पूर्वज लाखों वर्षों से मधेश में रहते आए हैं।
  • प्राचीन काल में मधेश को ‘मध्यदेश’ या ‘मज्झिमदेश’ कहा जाता था
  • मध्यदेश के विदेह (जनकपुर), विराटनगर, कपिलवस्तु और सिम्रौनगढ (बारा) सभ्यता प्रख्यात रहा है
  • राजा इक्ष्वाकु और जनक से लेकर सम्राट अशोक, सलहेश, हरिसिंहदेव और लोहांगसेन जैसे महान राजा-महाराजाओं ने मधेश में राज्य किया
  • लोहांगसेन आधुनिक मधेश एकीकरण के नायक हैं, जिनका राज्यारोहण ईस्वी १५५३ में हुआ था। उन्होंने पश्चिम से लेकर पूर्व तक मधेश के सारे भूभागों का एकीकरण किया था।
  • भारत में अंग्रेजों का राज होने के समय में मधेश में सेन वंश के राजाओं का अलग राज्य था, मधेश अलग देश था।

स्लाइड २: मधेश नेपाल में कैसे आया ?

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  • भारत में अंग्रेजों का राज उदय होने के बाद मधेश में भी अंग्रेजों का प्रभाव कायम हुआ। पर मधेश के राजा कायम ही रहे, उसे हटाया नहीं गया। वे मधेशी राजा मुगल सम्राट और अंग्रेजों को नजराना या वार्षिक कर (लगान) देकर मधेश में राज किया करते थे।
  • पर सन् १८१६ में (यानि आज से २०० वर्ष पहले) अंग्रेजों ने वार्षिक २ लाख रुपये के बदले में कोशी नदी से लेकर राप्‍ती नदी तक के मधेश के भूभाग नेपाल के राजा को सौंप दिया। यह बात सन् १८१६ की संधी में प्रमाण के रुप में मौजूद है।
  • उसी तरह राप्‍ती नदी से लेकर महाकाली नदी तक के मधेश के भूभाग अंग्रेजों ने नेपाल के राजा को सन् १८६० में (यानि केवल १५० वर्ष पहले) उपहार के रुप में दान दे दिया, क्योंकि नेपाल ने अंग्रेजों को भारत में सिपाही विद्रोह को दबाने के लिए सैनिक सहायता की थी।
  • इस तरह से सन् १८१६ और १८६० की संधियों के द्वारा, मधेशिकों की मंजूरी लिए बिना ही, मधेश को नेपाल में जबरन जोड दिया गया और तब से मधेश नेपाल का उपनिवेश बन गया, नेपाली साम्राज्य का हिस्सा बन गया। ‘उपनिवेश’ का मतलब होता है विदेशी/फिरंगी सेना और शासक बाहर की जगह से आकर राज करना। मधेश के पास अपनी सेना नहीं है, उसका अपना प्रशासन नहीं है, उसका अपना शासन नहीं है। मधेश में ९५% से ज्यादा सेना मधेश के बाहर से आकर कब्जा जमाई हुई है और मधेशियों पर शासन कर रही है। अभी मधेश देश स्वतन्त्र नहीं, परतन्त्र है। जिस तरह किसी दिन भारत में अंग्रेजों का शासन था, उसी तरह मधेश में अभी बाहर से आए फिरंगी नेपालियों का शासन है, मधेश अभी गुलाम बनकर रह गया है। इसलिए मधेश को आजाद करना होगा, पुन: अलग स्वतन्त्र देश बनाना होगा।

स्लाइड ३ : स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन और डा. सी. के. राउत

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  • मधेश देश को फिर से आजाद करने और उसपर मधेशियों का अपना ही शासन कायम करने के लिए ‘स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन’ अर्थात् Alliance for Independent Madhesh (AIM) ने ‘आजादी आन्दोलन’ शुरु किया है।
  • इस गठबन्धन का नेतृत्व डा. सी. के. राउत कर रहे हैं। डा. सी. के. राउत सप्‍तरी जिले के महदेवा गाँव में पैदा हुए, वहीं पले-बडे। उन्होंने नेपाल की त्रिभुवन यूनिवर्सिटी, जापान की टोकियो यूनिवर्सिटी और बेलायत की क्यामब्रिज यूनिवर्सिटी से शिक्षा हासिल की है। उन्होंने क्यामब्रिज यूनिवर्सिटी से PhD किया है। वे युवा इन्जिनियर पुरस्कार, महेन्द्र विद्याभूषण, कुलरत्‍न गोल्डमेडल, ट्रफिमेन्‍कफ एकाडेमिक एचिभमेन्ट अवार्ड जैसे सम्मानों से विभूषित हैं।
  • डा. सी. के. राउत अमेरिका में वैज्ञानिक के रूप में कार्यरत थे। वे २०६८ साल में अपने पद से राजीनामा देकर सब कुछ त्याग करके मधेश की सेवा के लिए लौट गए। उसके उपरान्त डा. सी. के. राउत मधेश को आजाद करने मधेश स्वराज आन्दोलन चला रहे हैं। वे बुद्ध, गांधी और मंडेला के पथ का अनुशरण करते हुए शान्तिपूर्ण अहिंसात्मक मार्ग से मधेश देश को आजाद करने में लगे हुए हैं।

स्लाइड ४ : किताब और डक्यूमेन्टरी

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  • डा. सी. के. राउत ने ‘वैराग से बचाव तक (डिनायल टू डिफेन्स)’,  ‘वीर मधेशी’,  ‘मधेश का इतिहास, ‘मधेश स्वराज’ किताबें लिखी हैं। उन्होंने ‘Black Buddhas’ डक्यूमेन्टरी भी बनाई है।
  • उसके साथ-साथ ‘मधेश स्वराज आन्दोलन’ से सम्बन्धित अन्य डक्यूमेन्टरी, विडियो और अडियो (गीत) भी उपलब्ध है। आप इन्टरनेट पर ckraut.com या madhesh.com पर जाकर वह किताब, गीत और विडियो डाउनलोड कर सकते हैं। डा. सी. के. राउत से जुडने के लिए, उनका नियमित संदेश पढने के लिए या उनसे सवाल करने के लिए फेसबुक पर facebook.com/drckraut पेज पर जा सकते हैं, वहाँ पर Like कर सकते हैं।

 

 

स्वतंत्र मधेश देश ही क्यों चाहिए, दूसरा समाधान क्यों नहीं ?

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  • फिरंगी नेपाली सेना और पुलिस को मधेश से वापस करने के लिए, और उसकी जगह पर मधेशी सेना और पुलिस बनाने के लिए। यह तभी ही हो सकता है जब मधेश आजाद होगा, अन्यथा नहीं। और जब तक मधेश की अपनी सेना नहीं होती है, तब तक कोई संविधान, कोई नियम-कानून, कोई शासन-व्यवस्था, कुछ भी मायना नहीं रखता; चाहे संविधान में जितना भी अधिकार लिखवा लें, कोई अर्थ नहीं रखता। फिरंगी नेपाली सेना को लगाकर पाया हुआ सारे अधिकार को पल भर में नेपाली शासक छीन सकते हैं। अभी मधेश में ९५% से ज्यादा सेना मधेश के बाहर से आकर कब्जा जमाकर बैठी हुई है, पूरी की पूरी नेपाली सशस्त्र पुलिस हमारे घर-दरवाजे पर बन्दुक लेकर खडी हैं। मधेश को मुक्त करने के लिए उन फिरंगी नेपाली सेना और पुलिस को वापस करना ही होगा, और मधेशी सेना और पुलिस बनानी ही पडेगी। इससे लाखों मधेशियों को नौकरी भी मिलेगी।
  • पहाडियों द्वारा हो रहे मधेश का कब्जा रोकने के लिए। मधेश के अस्तित्व के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक है फिरंगी नेपालियों का मधेश में आकर कब्जा जमाना, मधेश की जमीन हडपकर यहाँ पर बस जाना। इस तरह से नेपाली लोग पूरे मधेश पर कब्जा जमाना चाहते हैं; झापा, चितवन और कंचनपुर जैसे जिलों में तो पहाडी लोग पूरी तरह कब्जा जमा ही चुके हैं और वहाँ पर मधेशियों की हालत क्या है, आप देख सकते हैं। आज से ६० वर्ष पहले मधेश में केवल ६% पहाडी लोग थे, पर आज ३६% हो गए। अगर इसे अब भी नहीं रोका गया, तो पूरे मधेश पर पहाडी लोग कब्जा जमा डालेंगे, और मधेशियों को मधेश से ही भागना पडेगा, शरणार्थी होना पडेगा। और पहाडियों के इस आप्रवासन को तभी ही रोका जा सकता है, जब मधेश आजाद होगा, अन्यथा नहीं।
  • मधेश की नौकरी मधेशबासियों को ही देने के लिए: नेपाली साम्राज्य में मधेशियों को नौकरी मिलना नामुमकिन सा हो गया है। नेपाली शासक मधेशियों को कोई नौकरी नहीं देना चाहते हैं, मधेश में भी पहाडी ही कर्मचारी, सिडिओ, एसपी को रखते हैं। तो मधेश की नौकरी मधेशबासियों को ही देने के लिए मधेश को आजाद करना ही होगा, अन्यथा मधेश के बाहर से लाकर पहाडियों को ही नौकरी दिया जाता रहेगा, और बेचारे मधेशी लोग बेरोजगार दरदर भटकते रहेंगे। खाली मधेश प्रदेश बन जाने से यह सम्भव नहीं होगा, उसमें तो ओखलढुंगा या डोल्पा से आकर पहाडी लोग ही मधेश के मुख्यमंत्री भी बन सकेंगे; सिडिओ, एसपी, कर्मचारी भी पहाड से ही आकर बनेंगे।
  • नागरिकता, सुरक्षा और विदेश नीति अपने हाथों में लेने के लिए: मधेशियों के लिए नागरिकता, सुरक्षा और विदेश नीति बहुत ही महत्वपूर्ण रहा है और उसको पूर्णत: अपने हाथों में लेने के लिए मधेश को आजाद करना ही होगा। अन्यथा नागरिकता देने या खारिज करने का अधिकार, विदेश या सुरक्षा नीति बनाने का अधिकार सदैव नेपाली शासकों के हाथों में ही रहेगा, और नेपाली शासक मधेशियों को नागरिकता विहीन करके, मधेश में सेना और सशस्त्र पुलिस लगाकर दमन करके, सीमाक्षेत्र में अपनी मनमानी से नीति लगाके मधेशियों को अनागरिक, राज्यविहीन और शरणार्थी बनाते रहेंगे।
  • अपना साधन-स्रोत, खानी, राजस्व, पैसा, वैदेशिक अनुदान, लगानी आदि पर पूर्ण अधिकार कायम करने के लिए और अपने विकास में लगाने के लिए: मधेश के साधन-स्रोत, खानी, राजस्व, पैसा, वैदेशिक अनुदान, लगानी आदि पर पूर्ण अधिकार कायम करने के लिए और अपने विकास में लगाने के लिए मधेश को आजाद करना ही होगा, तभी ही उन चीजों पर मधेशियों का पूर्ण नियन्त्रण हो सकता है। अन्यथा उन चीजों पर नेपाली शासक अपना आधिपत्य जमाए रखेगा, और सारे साधन-स्रोत, राजस्व, वैदेशिक अनुदान, पैसा पहाड की ओर ले जाता रहेगा, पहाड के लिए खर्च करता रहेगा।
  • स्थायी रूप से अधिकार पाने के लिए: चाहे कोई भी अधिकार हो, स्थायी रुप से पाने के लिए मधेश को आजाद करना ही होगा। अन्यथा जो अधिकार पहले मिल भी चुका रहता है, वह भी नेपाली शासक मौका मिलते ही छीन लेता है। यहाँ तक की वितरण की हुई नागरिकता को भी हजारों की संख्या में खारेज कर देता है, तो दूसरी चीजों की बात ही क्या! संविधान या सम्झौता में मधेशियों का अधिकार स्पष्ट लिखे रहने के बाबजूद भी मौका मिलते ही नेपाली शासक उसको उलटा देता है। इसलिए स्थायी समाधान की ओर जाना ही होगा, भूलभूलैया में अब नहीं रह सकते। अगर हमारे हाथ नेपाली फिरंगियों ने बाँध दिया है, तो हमें इनसे बार-बार भीख मांगने की बजाय, कुछ खाने के लिए दे दो कहके बार-बार इनके पैर पकडकर गिडगिडाने की वजाय, अपना हाथ हमें खोलना होगा। वही स्थायी समाधान है, उनसे भीख मांग-मांग कर, उनकी कृपा पर हम कब तक जी सकते हैं ?
  • गुलामी से मुक्ति और आत्मसम्मान के लिए: आखिर कब तक हम गुलाम की तरह नेपाली राज में जीते रहेंगे, कब तक दूसरे-तीसरे दर्जे के नागरिक बने रहेंगे ? उससे मुक्ति पाने के लिए मधेश को आजाद करना ही होगा, अपने आत्मसम्मान के लिए भी मधेश को आजाद करना ही होगा। गुलामी की जंजीर को तोडना ही होगा।

 

ऊपर की ये बातें खाली मधेश प्रदेश बन जाने से समाधान कदापि नहीं हो सकेगा, स्वतन्त्र मधेश अलग देश बनने से ही हो सकेगा, इसलिए मधेशियों को ‘आजाद मधेश’ के लिए ही लडना होगा।

 

 

अन्य प्रश्‍न

 

 

मधेश को कैसे आजाद करें ?

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मधेश आजादी के कई तरीके हो सकते हैं:

१) पहला तरीका ये है कि विशाल आन्दोलन के मार्फत् १-सूत्रीय मांग रखी जाय कि स्वतंत्र मधेश के लिए जनमत-संग्रह हो। उस जनमत-संग्रह में मधेशी जनता को केवल यह चुनना है कि मधेश आजाद देश बनें कि नहीं (किसी नेता, पार्टी, गठबन्धन को वोट नहीं देना है बल्कि सिर्फ यह कहना है कि आपको आजादी चाहिए कि नहीं)। उस जनमत-संग्रह में ५०% से ज्यादा मत लाने पर स्वत: मधेश आजाद हो जाएगा, और उसे अंतरराष्ट्रीय मान्यता भी आसानी से हासिल होकर मधेश देश स्थापित होगा। उसके बाद वहाँ पर अपना मधेश संसद और सरकार गठन करके मधेश देश चलाना शुरु कर सकते हैं। इसके लिए, अभी के वर्तमान मधेश आन्दोलन को भी मोडा जा सकता है — इस आन्दोलन की मांग ही केवल १-सूत्रीय बनाकर आगे बढें तो; यानि केवल १ मांग होनी चाहिए: स्वतंत्र मधेश के लिए जनमत -संग्रह हो।

 

२) दूसरा तरीका है, नेपाल के संसद में जितने भी मधेश के सांसद है, वे राजीनामा देकर अंतरिम मधेश संसद और सरकार गठन करें और मधेश स्वतंत्रता का उद्‍घोष करें (Declaration of Independence जारी करें)। प्रतिनिधि पहले से जननिर्वाचित होने के कारण इसे अंतरराष्ट्रीय मान्यता सीधे प्राप्‍त हो सकता है, नहीं तो प्रतिरक्षा आन्दोलन करके स्थायित्व के लिए जनमत-संग्रह तक जाना पड़ सकता है। बाधा इसमें यह है कि मधेशी नेता और सांसद किस तरह नेपाल के संसद की कुर्सी को प्यार करते हैं और उससे किस तरह चिपके रहना चाहते हैं, वह आपने प्रधानमंत्री के निर्वाचन में देख ही लिया; तो उन्हें वह कुर्सी छोडकर आने के लिए जनता और आन्दोलनकारी ही दबाब दें तो ही यह हो सकता है।

 

३) तीसरा तरीका है, मधेश में अपना ही निर्वाचन कराके मधेश संसद और सरकार का गठन करना। उसके बाद स्वतन्त्रता का उद्‍घोष करके अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाना। फायदा इसमें यह है कि मधेश में अलग निर्वाचन कराना ही अपने-आप में मधेश देश को स्थापित करने का एक अहम् ‘स्टेप’ है, उसके अलावा संसद और सरकार जननिर्वाचित होने के कारण उसे अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिलना आसान होगा।

 

सवाल यह है कि क्या मधेश में हम अपना ही निर्वाचन करा सकते हैं, उकसे लिए सक्षम हैं, नेपाल सरकार करने देगी ? इसका उत्तर है, हाँ। वर्तमान मधेश आन्दोलन के क्रम में ही देखिए: मधेशी जनता ने लगभग मधेश को कब्जा करके ही रखा है न ? न कोई सरकारी कार्यालय चल रहा है, न यातायात साधन, न भंसार। तो मधेशी जनता इस हद तक मधेश को अपने नियन्त्रण में लेकर रखा है। जब पूरा भंसार पर कब्जा करके मधेशी जनता बैठ सकती है, २-२ महीने पूरा मधेश को ठप्प कर सकती है, तो गांव-गांव में चुनाव कराना कौन सी बडी बात है, कौन उसे रोक पाएगा ? अभी के माहौल में ही अगर गांव-गांव में चुनाव कराएँ तो नेपाल सरकार कितना रोक सकती है ? दूसरी बात, कुछ जगह पर नेपाल सरकार निर्वाचन को भाँड भी दे, तो कोई फर्क नहीं पडता। वहाँ पर पुन: चुनाव करवा सकते हैं, ये तो नहीं है कि एक ही दिन में हरेक जगह निर्वाचन सफल कराना ही पडता है। तो हम स्वतंत्र मधेश का निर्वाचन करा सकते हैं। पर उसके लिए अपनी तैयारी चाहिए: स्वतंत्र मधेश के निर्वाचन आयोग से लेकर गांव-गांव के स्तर तक निर्वाचन कराने के लिए कर्मचारी, स्वयंसेवक आदि; उसके लिए आवश्यक बक्सा, गाडी जैसे भौतिक सामग्री की भी व्यवस्था करनी होगी। परन्तु यह बिल्कुल ही सम्भव है।

 

४) चौथा तरीका है १०ओं लाख की संख्या में मधेशी जनता सडक पर उतरकर वहीं से मधेश संसद और सरकार की घोषणा कर दें, और स्वतंत्रता का उद्‍घोष कर दें। १०ओं लाख जनता की उपस्थिति ही मधेश स्वतंत्रता का जनमत और मधेश सरकार के लिए समर्थन है, इसलिए उसे अंतरराष्ट्रीय समर्थन सीधे भी मिल सकता है। नहीं तो आन्दोलन जारी रखकर, औपचारिक जनमत-संग्रह करके स्वतन्त्र मधेश को संस्थागत किया जाएगा।

इसके अलावा भी कई तरीके हो सकते हैं।

 

क्या यह सम्भव है, कहीं हो रहा है ?

 देश का आजाद होना और बनना कोई दुर्लभ और असम्भव कार्य नहीं है—वैसा केवल शासकवर्ग शासित लोगों को निरुत्साहित करने के लिए कहते हैं। केवल सन् १९९० के बाद भी ३० से ज्यादा नए देश बने हैं। सन् २००० के बाद भी पूर्वी टिमोर, मोन्टेनेग्रो, सर्बिया, कोसोभो और दक्षिण सुडान बने हैं, और निकट भविष्य में स्कटलैन्ड, काटालोनिया, क्यूबेक और सोमालिलैन्ड लगायत के दर्जनों नए देश बनने की कगार पर है। आज से ७० वर्ष पहले UN में केवल ५१ देश था, आज १९३ देश हैं ! तो यह असम्भव कैसा ?

 

वैसे हरेक मालिक अपने दास (नौकरों) के दिमाग में यही बात डाल देते हैं कि तुम गुलामी से मुक्त नहीं हो सकते, बहुत खतरा है, तुम्हें कोई काम पे नहीं रखेगा, तुम अपना जीवन निर्वाह नहीं कर सकोगे, भूखे मर जाओगे, ताकि वह गुलाम डर के मारे उसी मालिक की नौकरी पुष्तो-पुष्ता करता रहे। उसी तरह नेपाली शासकों ने हमारे दिमाग में वह भ्रम डाल दिया है, ताकि हम नेपाल में गुलाम बनकर जीते रहें, आजादी के लिए कोशिस ही न करें। हमें उस भ्रम को चीर कर आजादी की ओर बढना होगा, जो कि बहुत ही निकट है।

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क्या यह शांतिपूर्ण मार्ग से ही सम्भव होगा ?

 

बहुत सारे लोग शांतिपूर्ण मार्ग पर शक करते हैं, उन्हें विश्वास नहीं हो पाता कि अहिंसा में इतनी ताकत हो सकती है — बन्दुक, तोप और मिशायल से ज्यादा। इसके लिए हम कुछ डेटा देखें:

सन् १९०० के बाद हुए ३२३ महत्वपूर्ण राजनैतिक आन्दोलन पर समीक्षा करते हुए एक शोधपत्र में निष्कर्ष निकाला गया था कि शांतिपूर्ण आन्दोलन का सफलता दर ५३% रहा,  और पूर्ण असफलता केवल २०% जबकि हिंसात्मक आन्दोलन की सफलता २३% और पूर्ण असफलता दर ६०% रहा।

सत्य यह होते हुए भी जब लोग आक्रोश में आते हैं तो कहने लगते हैं ऐसे शांतिपूर्ण तरीके से थोडे ही होगा, लात के भूत बातों से थोडे ही मानेगा, अब बन्दुक ही उठाना पडेगा !  वर्तमान मधेश आन्दोलन को भी नेपाली शासक जब बहुत दिनों तक नजरअन्दाज करता रहा, तो बहुत सारे मधेशियों के मुँह से यही सुनने को मिलता था। वे अक्सर तर्क करते थे कि भारत को आजाद करने में गरम दल भी तो थे, सुभाष चंद्र बोस भी तो थे, उनकी आजाद हिंद फौज भी तो थी, तो हम भी चलो बन्दुक उठाते हैं !

पर याद रहें हम उस समय की घटना को आज की विश्व-परिस्थिति से बिल्कुल तुलना नहीं कर सकते और हुबहु लागू नहीं कर सकते। सुवास चन्द्र बोस के समय में United Nations था ? NATO जैसे संगठन था? उस समय में विश्व आज की तरह आतंकवाद के खिलाफ जंग छेडने के लिए एकत्रित था ? इसलिए उस समय अगर आजादी के लिए बन्दुक उठाई गई, तो आज भी हम नहीं उठा सकते। सिकन्दर या सम्राट अशोक घोडे पर चढकर ही विश्व-विजय के लिए निकले, तो उसका मतलब यह नहीं है कि आज भी हम घोडा पर सबार होकर ही युद्ध करने निकल जाएँ।

आज पूरे विश्व हिंसा के खिलाफ में, आतंकबाद के खिलाफ में एक हैं। चाहे किसी भी कारण से आप बन्दुक उठाएँ, विश्व कारण नहीं देखने लगता हैं, सिर्फ आपको आतंकवादी मानता है, और परस्पर विरोधी देश भी मिलकर आपको परास्त करने में लग जाते हैं। इसलिए पहले के दिनों में हिंसा के मार्ग से थोडा-बहुत कुछ सफलता मिलती भी हो, पर आज के समय में वह नामुमकिन सा हो गया है।

और शोध से भी यही देखने को मिलता है। ग्राफ में देखें कि जब सन् १९४० के दशक में वाकई में हिंसात्मक मार्ग से ज्यादा सफलता मिलने की सम्भावना रहती थी, पर पिछले दशकों में हिंसात्मक मार्ग से सफलता दर केवल १०% के करीब है, जबकि शांतिपूर्ण मार्ग द्वारा सफलता दर ७०% के करीब ! तो सफलता के लिए कौन सा रास्ता हमें चुनना होगा ?

तो हम केवल भावना में न बहें, आक्रोश में निर्णय न लें। तथ्य पर विचार करें, संयमता से काम करें। शांतिपूर्ण मार्ग से मधेश की आजादी सुनिश्चित है।

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(Chenoweth, E., & Stephan, M. J. Why civil resistance works: The strategic logic of nonviolent conflict. Columbia University Press, 2011)

 

(मधेश स्वराज किताब से)

शान्तिपूर्ण और अहिंसात्मक मार्ग द्वारा बहुत सारे देशों को स्वतन्त्रता मिली है, भारत और दक्षिण अफ्रिका जैसे उदाहरण हमारे सामने है। आधुनिक समय में जहाँ पर आजादी के लिए सशस्त्र युद्ध भी हुआ, वहाँ भी शायद ही कभी विद्रोहियों को पूर्ण विजय मिली, और वहाँ पर भी अन्तत: शान्तिपूर्ण मार्ग द्वारा ही समस्या का समाधान किया गया, अन्त में टेबल पर से या जनमत संग्रह से ही बात को सुलझाया गया। और सन् २००१ के ९/११ की घटना के बाद तो विश्व का रूख ही पलट गया है, और आज के विश्व में सशस्त्र मार्ग द्वारा ज्यादा देर तक टिका ही नहीं जा सकता, विजय पाना तो दूर की बात है।

जहाँ पर हिंसा द्वारा जीत हासिल भी हुई, वहाँ थोड़ी देर बाद ही सही, अन्तत: सरकार एक या दूसरे तरीकों से परिस्थिति को काबू कर ही लेती है। तमिलों ने श्रीलंका के एक भू-खण्ड पर कब्ज़ा कर ही लिया था, नेपाल में माओवादियों ने भी एक तरह से जीत ही हासिल कर ली थी, पर अन्तत: क्या हुआ? तो आज जहाँ आतंकवाद के नाम पर पूरे विश्व की शक्तियाँ एक होकर दम लगाती हैं, तो उसमें भले ही नेक उद्देश्य के लिए कोई हिंसा का इस्तेमाल करता हो, पर उसे भी सरकारें नहीं छोड़तीं। ऐसे में अहिंसात्मक मार्ग विकल्पहीन सा हो गया है।

 

इसलिए आज के दिन में शान्तिपूर्ण और अहिंसात्मक मार्ग ही सब से उत्तम और सफलता देने वाला मार्ग है। इस राह पर अन्तरराष्ट्रीय समर्थन भी आसानी से प्राप्‍त किया जा सकता है और इसके द्वारा विजय निश्चित है।

दूसरी बात, सशस्त्र आन्दोलन से मधेश का भला नहीं हो सकता, थोड़ी सी हुई सशस्त्र गतिविधियों का नतीजा आप देख सकते हैं। सरकार को बहाना मिल जाता है, मधेशियों पर ज़ुल्म करने के लिए, ‘सुरक्षा’ के नाम पर एक पर एक विधेयक और ‘सुरक्षा योजना’ लाने के लिए, मधेश में हजारों सशस्त्र प्रहरी तैनात करने के लिए, दर्जनों सशस्त्र प्रहरी और सैनिक कैम्प खोलने के लिए, मधेशियों पर अत्याचार करने के लिए। सशस्त्र संघर्ष की राह अफ्रिका में हुए हिंसात्मक संघर्ष, और गरीबी तथा हिंसा से भरे समाज, की ओर ले जाती है, जो मधेश के हित में कदापि नहीं है।

उसके अलावा, सशस्त्र आन्दोलन के लिए भले ही कुछ जुनून भरे लोग आ जाएँ, पर बहुसंख्यक मधेशी जनता इसके लिए आगे आना नहीं चाहेगी। इसलिए अधिक से अधिक समर्थन पाने के लिए भी हमें सशस्त्र आन्दोलन से दूर रहना होगा।

 

प्रश्न: कहाँ पर अहिंसात्मक आन्दोलन ने अपनी भूमिका निभाई है?

डॉ: आपको दूर जाने की जरूरत नहीं है, भारत हमारे लिए सबसे बड़ा उदाहरण है। उसी तरह, मंडेला का उदाहरण भी हमारे सामने है। कहें तो सन् १९६६ से १९९९ तक में शांतिपूर्ण नागरिक आन्दोलनों ने निरंकुश शासन को हटाने की ६७ घटनाओं में से ५० में मुख्य भूमिका निभाई है।

 

मधेश को आजाद करने के लिए हम क्या करें ?

जहाँ हैं वहीं, लोगों में आजादी के लिए चेतना फैलाएँ, लोगों को प्रशिक्षण दें कि आजादी ही क्यों चाहिए, और संगठन (समिति और सदस्य) बनाएँ। ‘संघम् महाबलम्’ – अर्थात् संगठन में ही सबसे बडी शक्ति है, वही मधेश को आजाद कर सकता है। जिस दिन वह संगठन निर्माण हो जाएगा (मान लें १० लाख प्रशिक्षित सदस्य बन जाएगा), प्रशिक्षण और आधारभूत तैयारी सम्पन्न हो जाएगी, उसी दिन आजादी का उद्‍घोष किया जाएगा।

(अन्य प्रश्‍नों के जवाब के लिए ‘मधेश स्वराज’ किताब देखें, फेसबुक पोस्ट भी देखते रहें: http://facebook.com/drckraut )

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